Home > Article >> Hindu Fast and Festival | भुवनेश्वर का रंगपंचमी मेला ... जहाँ थिरकती हैं फागुनी लोक लहरियाँ
| |
08 Mar 2009 Add comment Mail
Print Write
to Editor |
संदर्भः रंग पंचमी मेलाः 15 मार्च 2009
वागड अंचल में होली केवल एक-दो दिन उत्सव मना लेने की औपचारिकता तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे पखवाडे भर तक फागुन की धूम रहती है और अरावली की पर्वतीय उपत्यकाओं पर फागुनी रसों और लोक रंगों का उन्मुक्त लीला विलास प्रेम और श्रृंगार की भावभूमि पर थिरकता रहता है।
होली पखवाडे के अन्तर्गत समूचे वागड अंचल में फागुनी अन्दाजों भरे परंपरागत लोक नृत्यों, सामूहिक गैर नृत्यों और लोकानुरंजक लोक समारोहों की फिजाएं परवान चढती हैं।
इन्हीं में होली के बाद की पंचमी को वागड में रंग पंचमी के रूप में पूरे उल्लास के साथ मनाने की पर परा सदियों से लोक जीवन में फागुनी रंगों का मनोहारी दिग्दर्शन कराती रही है।
बाँसवाडा-अहमदाबाद मार्ग पर डूंगरपुर जिला मु यालय से 12 किलोमीटर दूर प्राचीन भुवनेश्वर तीर्थ पर रंग पंचमी को लगने वाला मेला वागड के मशहूर होली मेलों में शुमार है। तीन दिन चलने वाले इस मेले में वनांचल की लोक सांस्कृतिक पर पराओं और जनजीवन में समाहित उमंग को सहज ही देखा जा सकता है। इस बार यह मेला 15 मार्च को भरेगा।
वागड अंचल के इस मेले में भगवान शिव के स मुख होली के रंगों और रसों को समर्पित करने के साथ ही मनोकामनाएं पूरी होने की उ मीद में शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है और मनौतियां छोडी जाती हैं। मेलार्थी भुवनेश्वर शिवालय परिसर में विभिन्न देवताओं का दर्शन व पूजन करते हैं और इसके बाद रंगपंचमी का आनंद लेते हैं। भुवनेश्वर तीर्थ की सबसे बडी खासियत यह है कि यहां शिव तो स्वयंभू हैं ही, नन्दी और हनुमानजी महाराज की मूर्तियां भी स्वयंभू हैं। भगवान भुवनेश्वर एवं मन्दिर परिसर में अवस्थित नन्दीगण की किसी ने प्रतिष्ठा नहीं की बल्कि ये स्वयंभू हैं। लोक मान्यता है कि इन दोनों का ही आकार साल-दर-साल बढता जाता है।
इस मेले में डूंगरपुर एवं बांसवाडा जिलों के विभिन्न स्थानों के अलावा दूर-दूर से भी लोग हिस्सा लेते हैं। मेले में धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्ति के बाद मेलार्थियों के समूह मौज-मस्ती और फागुनी माहौल में खोने लगते हैं। गैर, घूमर आदि लोक नृत्यों की ताल देखने लायक होती है।
कई-कई गांवों से ढोल-नगाडों के साथ नृत्यों भरा परिवेश इस तरह हो उठता है जैसे शिव की आराधना में ताण्डव स्तोत्र हो। गैर नृत्यों की मस्ती में रमे हुए मेलार्थी पूरी मस्ती के साथ माहौल को फागुनी लोक लहरियों से गुंजाते रहते ह। आदिवासी स्त्री-पुरुष मेलार्थी अपनी पारंपरिक पोशाक में ढोल-नगाडों, कौण्डियों और लोक वाद्यों के साथ शरीक होते हैं और गुलाल उडाते हुए अपनी ही मौज-मस्ती में मेला रंगों को बहुगुणित करते रहते हैं।
रंगपंचमी को पर्वत की चोटी से भवनाथ की तलहटी तक फागुनी रंगों और लोक जीवन के रसों की सरिताएं रह-रह कर प्रवाहित होने लगती ह। पर्वत शिखरस्थ मंगलेश्वर मन्दिर व बालकनाथ धूंणी पर शुरू होने वाली गैर फागुनी रस बरसाते हुए धीरे-धीरे नीचे सरकने लगती है और मन्दिर के समीप आकर विशाल गैर नृत्यों की मनोकारी फिजाँ में बदल जाती है।
दर्जनों लोक वाद्यों और सैकडों मेलार्थियों द्वारा खेली जाने वाली गैर वहां जमा हजारों लोगों को लोक संस्कृति की इन विलक्षण पर पराओं के मोह पाश में बांधकर उल्लास के सागर में नहला देती है। इसमें कई दर्जन गांवों से फागुनी टोलियां जमा होती हैं जो कई किलोमीटर तक का माहौल फागुनी अन्दाजों पर थिरकाती रहती हैं।
होली मनाने अपने-अपने गांव आने वाले लोग रंग पंचमी के मेले में हिस्सा लेने के बाद ही गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों में अपने काम-धन्धों पर लौटते हैं। वागड की लोक रंगों से भरी होली का उल्लास साल भर तक उनके तन-मन को उल्लसित रखता है।
मेले में हजारों मेलार्थियों की रेलमपेल मची रहती है। ये मेलार्थी अपने आराध्य भगवान भुवनेश्वर के दर्शन-पूजन कर आगामी वर्ष में सुख-समृद्घि की प्रार्थना करते हैं। ल बे मेला बाजार सजते हैं जिनमें भारी भीड बनी रहती है। भुवनेश्वर शिवालय से सटे अहमदाबाद मु य मार्ग पर दोनों तरफ आधे किलोमीटर से भी ज्यादा ल बा मेला बाजार सजता है।
यों तो भुवनेश्वर पर साल भर अनुष्ठानों की गूंज और श्रद्घालुओं की रेलमपेल मची रहती है लेकिन पूरे श्रावण मास, पूर्णिमा और सोमवार को यहां भक्तों का भारी जमघट लगता है। रंग पंचमी के साथ ही महा शिवरात्रि पर भी यहां विशाल मेला भरता है।
- डॉ. दीपक आचार्य |
| |
|
|
 |
Latest Articles | |
»
»
»
»
»
| |
|
|
 |
Jain Calendar Launched at Terapanth Bhawan, Gangasahar | | More Photo |
|
|