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May
बीकानेर स्थापना दिवस
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उत्सव हमारी संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्रीयता की अमूल संपदा है व धरोहर है जिन्हें हम युगों-युगों तक अक्षुण्य बनाये रखने का सतत प्रयास करते है। बीकानेर की स्थापना का उत्सव बीकानेर की थाती साम्प्रदायिक सद्भाव, आपसी भाई चारे का उत्सव है। इस उत्सव में हिन्दू, मुस्लिम, सिख व ईसाई सभी धर्म मजहबों के लोग समान भागीदारी निभाते हैं तथा पतंगबाजी कर खुशियां मनाते है वे बिना किसी धर्म, जाति व वर्ग का भेद किए नई मटकी छानते है, खींचडा तथा इमली का रस बनाते हैं।
बीकानेर नगर की स्थापना वर्ष १४८८ को मई माह में राव बीका ने की थी। इस संबंध में एक दोहा भी बहुत लोकप्रिय है ‘पन्द्रह सौ पैतालवें सुद वैशाख सुमेर, थावर बीज थरपियों, बीके बीकानेर‘ ।  अपनी अभूतपूर्व स्थापत्य कला, समृद्धशाली सांस्कृतिक परम्परा, थार के रेगिस्तान तथा समृद्ध साहित्य एवं प्राकृतिक सौन्दर्य, यहां के लोगों की अलमस्ती, खान पान व परम्पराओं की विरासत की थाती देश में ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है।
मरुस्थल के रेतीले टीलों के बीच स्थित बीकानेर नगर ने ५२१ वर्षों में प्रगति के नित नए पादान तय किए है। वर्तमान में बीकानेर में एक प्रमुख शहर की सभी सुविधाएं मौजूद है। स्वर्णिम रेतीले टीलों पर टहलने, नगर के इतिहास, कला व संस्कृति तथा पुरातत्व को जानने के लिए विश्व के अधिकतर देशों से हजारों पर्यटक आ रहे है। बीकानेर के पर्यटन स्थल जितने समृद्ध है उतने राजस्थान के अन्य बहुत कम नगरों में देखने को मिलते है।  छह शताब्दी पुराना देशनोक की करणीमाता का मंदिर स्थापत्य कला के साथ धर्म आस्था और आश्चर्य का भी केन्द्र है। विश्व में अपने आप में यह एक अनूठा मंदिर है जहां चूहे निर्भिकता से घूमते हैं। बीकानेर का जूनागढ का किला, रतन बिहारी, लक्ष्मी नाथ मंदिर, हवेलियां, लालगढ पैलेस, गजनेर पैलेस, कोलायत का कपिल सरोवर, देवीकुंड सागर की छतरियां, नगर के जैन मंदिर सहित अनगिनत पुरावैभव के साथ नए बने मुकाम के गुरु जम्भेश्वर और कतरियासर में बने अग्नि नृत्य के प्रवर्तक जसनाथजी महाराज के मंदिर दर्शनीय बनकर लोकप्रियता के शिखर को छू रहे हैं।

गौरवमय इतिहास को अपने में समेटे हुए बीकानेर नगर राजस्थान के इतिहास में भी अपना अहम् स्थान रखता है। जोधपुर के राजा जोधा के पुत्रा राव बीका के नाम पर ‘बीकाणा‘ और ‘बीकानेर‘ हुआ। इतिहास के अनुसार जोधपुर के प्राचीन दुर्ग में दरबार लगा था, दरबार में राव जोधा के भाई राव कांधल व पुत्रा राव बीका पास में बैठे बतिया रहे थे। सहसा कांधन ने अपने भतीजे राव बीका के कान में कोई ऐसी बात कहीं जिसे सुनकर दोनों चाचा भतीजा आपस में हंस पडे। राव जोधा जब दरबार में अपने भाई कांधल व पुत्रा राव बीका को आपस में हंसी मजाक करते हुए बातें करते हुए देखा तो उन्होंने ताने के रूप में कहा ‘ आज तो चाचा भतीजा आपस में घुलमिलकर ऐसी बातें कर रहे है कि मानो दोनों ही कोई नया नगर बसाएंगे। इस पर राव कांधल ने कहा कि काका भतीजा तो कोई अलग नगर बसानें की बातें नहीं कर रहे थे, परन्तु अब आपने जब गढ बसाने की बात ही हमसे कर दी है तो हम दोनों आपसे एक नया गढ बसाकर ही मिलेंगे। ऐसा कहते हुए कांधलजी ने राव बीकाजी का हाथ पकडा और अपने कुछ मंत्रिायों के साथ लेकर नया नगर बसाने के लिए रवाना हो गए।

कहा जाता है कि राव बीकाजी की करणीमाता पर अटूट आस्था थी। उन्होंने अपने चाचा कांधल के साथ देशनोक में स्तुति वंदना व पूजा अर्चना के बाद करणीमाता से नगर बसाने का आशीर्वाद लिया और नगर की स्थापना कर दी।  राव बीका से लेकर महाराजा करणीसिंह तक कुल २३ राजाओं ने बीकानेर पर शासन करते हुए विकास किया। विकास का दौर आजादी के बाद बडे पैमाने पर चला। महाराजा सार्दुल सिंह व डा. करणी सिंह ने रियासती परम्परा से परे लोकतंत्रा में भी निष्ठा व्यक्त की। डा. करणी सिंह १९५० में बीकानेर की राजगद्दी पर २३ वें महाराजा के रूप में आसीन हुए । वे १९५२ में पहली बार बीकानेर निर्वाचन क्षेत्रा से  निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लोक सभा सदस्य चुने गए तथा उसके बाद चार बार पुनः लोकसभा चुनावों में जीतकर लगातार पांच बार लोक सभा में निर्दलीय सांसद के रूप में विभिन्न मंत्राालयों, समितियों के लिए सेवारत रहे। उन्होंने पांच बार वर्ल्ड ओलम्पिकस सहित अनेक निशानेबाजी की प्रतियोगिताओं में बीकानेर का नाम रोशन किया। टार्गेट शूटिंग स्पोट्र्स में उनकी सेवाओं को देखते हुए उन्हें भारत सरकार द्वारा १९६१ में देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार ‘अर्जुन अवार्ड‘ से सम्मानित कर ‘स्पोट्र्स पर्सनऑफ द इयर‘ घोषित किया गया। 

बीकानेर के अनेक लोगों ने अपनी गायकी व लायकी, कार्य के प्रति निष्ठा समर्पण से अर्जुन, पद्श्री, पदमभूषण जैसे ख्याति नाम अवार्ड अर्जित कर नगर के गौरव को गौरवान्वित किया है।

वर्तमान बीकानेर राज्य ही नहीं पूरे देश में अपनी पहचान बना रहा है। रेल की बडी लाईन होने से यह पूरे भारत से जुड गया है। इन्दिरागांधी नहर परियोजना ने सदियों से प्यासे मरूस्थल  की काया ही पलट दी। जहां एक समय पीने के  पानी को लोग तरसते थे,वहीं आज सिचाई के जरिये भरपुर फसल ले रहे है। नहर के आने से यहां खुशहाली आई है और लोगों का जीवन स्तर ऊंचा हुआ है। 
कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर की स्थापना से काश्तकारों को कृषि के क्षेत्रा में आए बदलाव का भरपुर लाभ मिल रहा है तो यहां इंजीनियरिंग कॉलेज,विश्वविद्यायल,मेडिकल कॉलेज,वेटरनरी कॉलेज तथा प्राइवेट सेक्टर में शिक्षा संस्थान शुरू होने से क्षेत्रा के युवा आत्मनिर्भर बन रहे है। शहरी ढंाचागत विकास योजना में करोड रूपये खर्च हुए है। योजना के तहत शहर में पेयजल समस्या के स्थाई समाधान के जहां प्रयास हुए है वहीं गंदे पानी से भी लोगों को छुटकारा मिला है।  पलाना लिग्नाईट परियोजना के चालू होने से बीकानेर में बिजली के क्षेत्रा में भी आत्म निर्भर बन जाएगा। वर्षो से नासूर बन चुके सूरसागर का साफ किया जा रहा हैं। अब इसमें गन्दा पानी नहीं आयेगा। यह सुन्दर झील के रूप में तबदील होगा। 


अमर सिंह चौहान ,  सूचना एवं जन सम्पर्क अधिकारी , बीकानेर




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