Wednesday, 21 August 2019
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बीकानेर महापौर चुनावः एक विश्लेषण


Shyam N Rangaबीकानेर में नगर निगम के चुनावों का आगाज हो चुका है। वर्तमान में सभी पार्टीयाँ अपनी अपनी तैयारियों में लगी हुई है। मुख्य रूप से मुकाबला काँग्रेस व भारतीय जनता पार्टी के बीच है। इन चुनावों में भी सभी चुनावों की भाँति जातिगत समीकरणों का ही मुख्य आधार रहेगा। जातिगत समीकरण ही किसी की हार व जीत को तय करेंगे। अब हम क्रमशः काँग्रेस व भारतीय जनता पार्टी के बारे में बात करें तो महापौर के चुनाव को लेकर बीकानेर के चुनाव की कुछ स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। 

महापौर के चुनाव में बीकानेर पूर्व व बीकानेर पश्चिम की विधानसभा सीटों को मिलाकर बनाई गई सीट पर चुनाव होगा और इस सीट पर अगर गौर करे तो मुख्यतः ब्राह्मण, मुसलमान, राजपूत व माली समाज की जातियों का वर्चस्व दृष्टिगोचर होता है। इन्हीं जातियों में से दोनों पार्टीयाँ अपने अपने उम्मीदवार तय करेंगी। 
क्रग्रेस की बात करे तो यह बात सामने आती है कि काँग्रेस के पास प्रथम दृष्टि में दूसरी लाईन का ऐसा कोई नेता है ही नहीं जो महापौर के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को कडी टक्कर दे सके। काँग्रेस के पास इस चुनाव में शहर काँग्रेस के अध्यक्ष जनार्दन कल्ला व वरिष्ठ व्यवसायी व काँग्रेसी नेता कन्हैयालाल कल्ला को छोडकर ऐसा कोई नेता नहीं है जो भारतीय जनता पार्टी के किसी भी प्रत्याशी का गंभीरता से मुकाबला कर सके और यह भी स्पष्ट हो चुका है कि कल्ला परिवार से कोई भी सदस्य इन चुनावों में प्रत्याशी नहीं बनेगा यह बात शहर काँग्रेस अध्यक्ष जनार्दन कल्ला प्रेस में स्पष्ट रूप से कह चुके हैं।  हाँ अगर कोई बडे नेता की बात करे तो भवानी शंकर शर्मा उर्फ भवानी भाई जरूर एक चेहरा नजर आता है जो चुनाव तो लड सकता है लेकिन पार्टी को जीत की गारंटी नहीं दे सकता । अगर भवानी शंकर शर्मा चुनाव लडते हैं तो उनके सामने अपनी ही पार्टी के नेताओं के विरोध करने की स्थिति पैदा हो सकती है। भवानी शंकर शर्मा अशोक गहलोत के करीबी माने जाते हैं और प्रदेश कॉ्रगस के उपाध्यक्ष खादी बोर्ड के चैयरमेन, बीकानेर जिला प्रमुख जैसे बडे पदों पर रहे हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि भवानी शंकर शर्मा किसी भी स्थिति में पार्टी श्योर जीत की गारंटी नहीं दे सकते। वर्तमान में चर्चा है कि भवानीशंकर शर्मा चुनाव लड सकते हैं या य कहे कि पार्टी का प्रदेश आलाकमान भवानी भाई को चुनाव लडवा सकता है। दूसरा प्रमुख नाम जो काँग्रेस में उभर कर सामने आ रहा है वह है बाबू जय शंकर जोशी का। बाबू जय शंकर जाशी एक समय मे शहर काँग्रेस अध्यक्ष जनार्दन कल्ला के सबसे करीबी समझे जाते थे लेकिन पिछले विधानसभा चुनावों में टिकट न मिलने से नाराज होने के कारण कुछ दूरियाँ कल्ला गुट व बाबू जय श्ंांकर जोशी के बीच बनी है और यह दूरियाँ आज भी नजर आ रही है। अगर बाबू जय शंकर जोशी को टिकट मिलता है तो इन दूरियों का नुकसान जोशी को हो सकता है। ऐसी स्थिति में बाबू जय शंकर जोशी का चुनाव जीत पाना आसान काम नहीं होगा। वैसे काँग्रेस में महापौर टिकट अगर किसी मुसलमान प्रत्याशी को दिया जाता है तो ऐसी स्थिति में भी काँग्रेस का जीतना मुश्किल ही होगा क्योंकि आजकल चुनाव जातिगत आधार पर लडे जाते हैं और भारतीय जनता पार्टी किसी भी सूरत में किसी मुसलमान को महापौर का प्रत्याशी नहीं बनाएगी। ऐसी स्थिति किसी भी मुसलमान प्रत्याशी के लिए बडी मुशिकल खडी कर सकता है। अगर काँग्रेस किसी माली समाज के व्यक्ति को प्रत्याशी बनाती है तो भी जीत का रास्ता काँग्रेस को नजर नहीं आ रहा है। माली समाज से काँग्रेस के पास चंद्र प्रकाश गहलोत व दुलीचंद गहलोत जैसे नेता है जो जीत को निश्चित करने वाले चेहरे नहीं कहे जा सकते हैं।। अगर काँग्रेस विश्वजीत सिंह हरासर या जीतू रायसर जेसे राजपूत जाति के किसी व्यक्ति को प्रत्याशी बनाती है तो काँग्रेस एक सम्मानजनक स्थिति में इन महापौर के चुनाव का सामना कर सकती है ऐसा कहा जा सकता है। कुल मिलाकर इस महापौर के चुनाव में काँग्रेस के लिए आसान जीत नजर नहीं आ रही है। सबसे बडी बात यह है कि पिछले विघानसभा चुनावों में डॉ बी डी कल्ला करीब अट्ठारह हजार वोटों से बीकानेर पश्चिम विधानसभा सीट से चुनाव हारे थे इसी तरह पूर्व सीट से डॉ तनवीर मालावत अडतीस हजार के करीब मतों से चुनाव में हारे थे। ऐसी स्थिति में काँग्रेस पार्टी करीब छप्पन हजार मतों का बडा फासला केसे जय करेगी यह काँग्रेस के नेताओं के लिए एक पहेली ही बना हुआ है और विधानसभा चुनावों के बाद हालातों में इतना कोई परिवर्तन शहर में नजर नहीं आ रहा है कि काँग्रेस इन चुनावों में जीत दर्ज करवा दे। 
काँग्रेस के पास अगर जीतने का कोई समीकरण है तो वह यह नजर आता है कि काँग्रेस पार्टी किसी ओसवाल समाज के कद्दावर व्यक्ति को अपना प्रत्याशी बनाए और पार्टी गुटबाजी राजनीति के उठकर काम करें तो काँग्रेस पार्टी को जीत मिल सकती है और ऐसी स्थिति में अगर कोई नाम सामने आता है तो वह है घडसाना किसान आंदोलन के दिग्गज नेता बल्लभ कोचर। क्योकि यह बात सर्वविदित है कि मानिकचंद सुराणा ने करीब बीस साल पहले बी डी कल्ला को विधानसभा चुनावों में कडी टक्कर दी थी। 
अब अगर बात भारतीय जनता पार्टी की करें तो स्थिति कुछ इस तरह की है कि भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्त्ता इस उत्साह के साथ मैदान में उतरेगा कि वह बीकानेर की दोनों विघानसभा सीटों पर अपना विधायक रखता है और बी डी कल्ला जेसे कद्दावर नेता को पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा हरा चुकी है। इसी के साथ वर्तमान में भाजपा का ही बीकानेर से सांसद है और बात कार्यकर्त्ताओं के उत्साह को दुगुना करती है। 
अगर भारतीय जनता पार्टी किसी माली समाज के व्यक्ति को महापौर का उम्मीदवार बनाती है तो भाजपा के पूर्व शहर अध्यक्ष गोपाल गहलोत एक मजबूत नाम माना जा रहा है। अगर गोपाल गहलोत के सामने कॉ्रंग्रेस का कोई राजपूत समाज का प्रतिनिधि चुनाव लडता है तो निश्चित तौर पर मुकाबला रोचक हो सकता है। अन्यथा गोपाल गहलोत को भाजपा का जिजाउ उम्मीदवार माना जा सकता है।  वहीं दूसरी तरफ अगर भाजपा किसी राजपूत समाज के प्रतिनिधि को चुनाव में उतारती है तो पूर्व सभापति अखिलेश प्रताप सह व युवा नेता युधिष्ठिर सिंह भाटी के नामों की चर्चा की जा सकती है। अगर अखिलेश प्रताप सिंह चुनाव लडते हैं तो संघ सहित पूरी भाजपा उनके साथ जुट सकती है। लेकिन किसी भी सूरत में इन दोनों नामों को मजबूत प्रत्याशी नहीं कहा जा सकता है। एक स्थिति यह है कि भारतीय जनता पार्टी किसी ब्राह्मण व्यक्ति को प्रत्याशी बनाती है तो पूर्व विधायक नंदलाल व्यास एक मजबूत उम्मीदवार के तौर पर सामने आते है। नंदलाल व्यास के पास कार्यकर्त्ताओं की एक बडी फौज है और पुष्करणा ब्राह्मण समाज बडा समर्थन उन्हें मिल सकता है। इसी के साध नंदलाल व्यास का शहर के गरीब व मजदूर तबके में दबदबा माना जाता है और व्यास के चुनाव लडने की स्थिति में इन सब का खुलकर समर्थन नंदलाल व्यास को प्राप्त हो सकता है। नंदलाल व्यास का मुकाबला अगर कग्रेस में कोई कर सकता है तो शहर काँग्रेस अध्यक्ष अध्यक्ष जनार्दन कल्ला ही है इसके अलावा काँग्रेस के पास नंदलाल व्यास के मुकाबले कोई नेता नही है जो इस महापौर चुनाव में मुकाबला कर सके। नंदलाल व्यास को नुकसान यह हो सकता है कि व्यास संघ के पसंदीदा उम्मीदवार नहीं है और ऐसी स्थिति में संध से जुडे लोगों का निष्किय रहना व्यास को भारी पड सकता है।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि इन महापौर चुनावों में काँग्रेस के मुकाबले भाजपा का पलडा प्रथम दृष्टया भारी नजर आ रहा है। काँग्रेस जहाँ विधानसभा चुनावों में हार कर हताश नजर आ रही है तथा काँग्रेस में गुटबाजी की स्थिति भी दिखाई दे रही है वहीं भारतीय जनता पार्टी एकजुट व जीत के कारण उत्तसाहित दिखाई दे रही है।  चूंकि यह लोकतंत्र है और यहाँ भाग्य जनता तय  करती है न कि अटकलें । ऐसी स्थिति में महापौर के चुनाव का ऊंट किस करवट बैठता है यह आने वाला समय ही बताएगा। लोकतंत्र में जनता जनार्दन है और वही सब अटकलों को धता बता कर परिणामों को प्रभावित करने की ताकत रखती है। 

श्याम नारायण रंगा
पुष्करणा स्टेडियम के पास 
बीकानेर