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विशिष्ट अंदाज है बीकानेर की होली का

09 Mar 2009      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

Shyam Narayan Rangaबसंती बयार के इस फाल्गुन माह में जीवन की एक अलग ही उमंग होती है। जीवन के रंगों को दर्शाता यह महीना अपनी अल्हडता व मस्ती के लिए पूरी दुनिया में विशेष अंदाज में जीया जाता है। भारत में फाल्गुन माह में रंगों का त्यौंहार ’होली‘ अपना विशेष स्थान रखता है। वैसे तो ’ब्रज की लट्ठमार होली‘ पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान रखती है लेकिन राजस्थान के बीकानेर की होली भी अपने अंदर मस्ती, उल्लास के साथ साथ परम्परा के विशिष्ट रंग लिए हुए हैं। आईए डालते हैं एक नजर बीकानेर की होली परः-

होली की शुरूआतः-
बीकानेर में होली का त्यौंहार नौ दिन तक मनाया जाता है। फाल्गुन माह में खेलनी सप्तमी से शुरू हुआ यह त्यौंहार धुलंडी के दिन तक अनवरत जारी रहता है। बीकानेर के शाकद्विपीय ब्राह्मणों के द्वारा खेलनी सप्तमी के दिन मरूनायक चौक में ’थम्ब पूजन‘ के साथ ही होली के त्यौंहार की शुरूआत हो जाती है। चूंकि शाकद्विपीय समाज के लोग बीकानेर के मंदिरों पूजारी है अतः शहर के प्राचीन नागणेची मंदिर में धूमधाम से पूजा की जाती है और माँ को गुलाल अबीर से होली खेलाई जाती है। इस फागोत्सव के बाद पुरूष चंग बजाते हुए व फाग के गीत गाते हुए शहर में प्रवेश करते हैं तथा होली के प्रारम्भ की सूचना देते हैं। अगले ही दिन अष्टमी को शहर  के किकाणी व्यासों के चौक म, लालाणी व्यासों के चौंक में, सुनारों की गुवाड में व अन्य जगहों पर भी थम्ब पूजन कर दिया जाता है और इसी के साथ ही होलकाष्टक प्रारम्भ हो जाते हैं। होलाकाष्टक का पूरा समय मस्ती, उल्लास, अल्हडता के बिताया जाता ह। इन दिनों में विवाह आदि शुभ कार्य वर्जित माने गए है।
होली व रम्मतो का दौरः-
होली के दिनों में होने वाली रम्मतो के कारण ही बीकानेर को रम्मतों का शहर कहा जाता है। होलकाष्टक के दिनों में शहर के प्रत्येक चौक में किसी न किसी रम्मत का आयोजन अवश्य होता है। रम्मत नाटक की एक विद्या है जिसमें पात्र अभिनय करते हैं। रम्मत में पात्रों द्वारा गद्य विद्या में संवाद बोले जात हैं और ख्याल, लावणी, चौमासे गाये जाते हैं। रम्मत में किसी न किसी कथानक का सहारा लेकर भी अभिनय होता है। बीकानेर शहर के बारहगुवाड चौक में फक्कडदाता की रम्मत, हडाऊ मेरी की रम्मत, स्वांगमेरी की रम्मत खेली जाती है। इसी तरह बिस्सों के चौक में भक्त पूरणमल या शहजादी नौटंकी का मंचन होता है। इसी तरह भट्ठडों के चौक में हडाऊ मेरी की रम्मत, आचार्यों के चौक में अमरसिंह राठौड की रम्मत व किकाणी व्यासों के चौक में जमनादास कल्ला की रम्मत का आयोजन होता है। रम्मतों में उमडने वाली भीड से स्वतः अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीकानेर का आम जनमानस कितने गहरे तक अपनी परम्पराओं व रीति रिवाजों से आज भी जुडा हुआ है।
होली व गैर की धूमः-
होली के दिनों में बीकानेर के पुष्करणा ब्राह्मणों, शाकद्विपीय ब्राह्मणों व माहेश्वरी समाज के लोगों द्वारा ’गैर‘ निकाली जाती है। गैर में पुरूष ही शामिल होते हैं और फाग के गीत गाते हुए व चंग बजाते हुए विभिन्न मौहल्लों से निकलते हैं। चंग की थाप पर पारम्परिक गीत गाते हुए ये लोग मस्ती का जबरदस्त माहौल पैदा करते हैं। इन गैरों का रास्ता अपने ही रिश्तेदारों व सगे संबंधियों के घरों के आगे से होता है व इस दौरान होली के दौरान होने वाली छिंटाकसी भी चलती रहती है। सगे संबंधी इन गैरों के रोकने के लिए ’तणी‘ बांधते हैं और इन तणी को तोडकर ही गर आगे जाती है। तणी तोडते वक्त जो नजारा बनता है उससे बरबस ही महाराष्ट्र के ’गोविन्दा आला रे आला‘ की याद आ जाती है व महसूस होता है कि विभिन्न संस्कृतियों का हमारा भारत किस तरह एकता के सूत्र में पिरोया है।
होली व डोलची पानी का खेलः-
बीकानेर की होली का सबसे आकर्षण का केन्द्र होता है पुष्करणा ब्राह्मण समाज के हर्ष व व्यास जाति के बीच खेला जाने वाला डोचली पानी का खेल। ’डोलची‘ चमडे का बना एक ऐसा पात्र है जिसमें पानी भरा जाता है। इस डोलची में भरे पानी को पूरी ताकत के साथ सामने वाले की पीठ पर मारा जाता है। बीकानेर के हर्षों के चौक में हने वाले इस आयोजन को देखने के लिए भारी भीड उमडती है। प्रेम के नीर से भरी यह डोलची जब प्यार से पीठ पर पडती है तो इसकी गज दर्शकों को भी आल्हादित कर देती है। करीब चार सौ साल से चल रहे इस आयोजन के पीछे अपना एक समृद्ध व गौरवशाली इतिहास है जो जातीय संघर्ष के जुडा हुआ है। हर्ष व व्यास जाति के लोग आज भी बडी शिद्दत व ईमानदारी से इस इतिहास को सहेजे हुए हैं। ऐसा ही एक आयोजन बीकानेर के बारहगुवाड चौक में ओझा व छंगाणी जाति के बीच होलिका दहन वाले दिन होता है।
होली व स्वांग की मस्तीः-
होली के अवसर पर बीकानेर में स्वांग बनने की मस्ती का अपना एक अलग ही अंदाज है। गलियों व मौहल्लों में आठ दिनों तक स्वांग बने पुरूषों की धूम रहती है। शहर की गलियों में ब्रह्मा, विष्णु व शिव मिल जाएंगे। फिल्मी हसितयों से लेकर ठेठ देहाती वेशभूषाधारी स्वांग देखकर आप दाँतों तले उंगली दबा लेंगे। पुरूषों में नारी सुलभ सहजता देखकर स्वयं ब्रह्मा भी आश्चर्य कर, ऐसा नजारा देखने को मिलता है। इन स्वांग बने रसियों के लिए शहर के पुष्करणा स्टेडियम में ’फागणिया फुटबॉल‘ के मैच का भी आयोजन होता हैं। इन स्वांगों को मिस बीकाणा के अवार्ड से भी नवाजा जाता है।
होली का दूल्हा विशेष आकर्षणः-
धुलंडी वाले दिन शहर के हर्ष जाति के दूल्हे की बारात निकलती है। विष्णुवेशधारी यह दूल्हा किकाणी व लालाणी व्यास जाति सहित दम्माणी जाति के करीब तेरह से सत्रह घरों में जाता है। यहाँ घर की औरतें पारम्परिक व विधिवत रूप से दूल्हे का स्वागत करती है। बारात का जगह जगह पर चाय, दूध व नाश्ते से स्वागत होता है। इन घरों के आगे घूमकर बिना दूल्हन लिए ही होली का यह दूल्हा अपनी संस्कृति व इतिहास को समृद्ध करने का संदेश देकर वापस लौट आता है। यह आयोजन अपने अन्दर एक समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को समेटे हुए है।
होली का परम्परा व मस्तीः- होलकाष्टक के आठ दिनों तक शहर के लोग पापड नहीं खाते। होलीका दहन के तुरन्त बाद ही शहर में पापड का स्वाद बिखर जाता है। सबसे पहले बीकानेर के राजपरिवार की होली का दहन जूनागढ के आगे होता है इसके बाद शहर के साले की होली व बारहगुवाड चौक में होलीका दहन होता है और सबसे अंत में दम्माणी चौक में होलीका दहन होता है।
होली के दिनों में शहर में भांग की मस्ती भी परवान पर रहती है। भांग के नमकीन व मिठाईयाँ खूब खाई जाती है। इसी के साथ सूखी व गीली भांग का भी दौर रहता है। ऐसा लगता है जैसे भंग की इस तरंग में मानो पूरा शहर ही डूबा हुआ हो ।
धुलंडी वाले दिन शहर में पारम्परिक अश्लीलता अपने चरम पर रहती है। होली की मस्ती में शहर का हर बूढा, नौजवान व बच्चा रंगा होता है। उम्र व पीढयों की सीमाऍं तोडकर धुलंडी के दिन शहर की संस्कृति साझा हो जाती है। दिनभर की मस्ती व उमंग सूर्यास्त के बाद तक जारी रहती है और देर रात जाकर समाप्त होती है।
इस तरह बीकानेर की होली में अल्हडता है, मस्ती है, इतिहास है, संस्कृति है,
गौरव है, रंग है तथा वह सब है जो जीवन मे ऊर्जा देता है। बीकानेर की होली अपने दामन में कईं रंग समेटे है जो इन आठ दिनों में खुलकर बिखरते हैं। इन रंगों में भीगकर सरोबार होने के लिए भारतभर में फैला बीकानेरी अपने शहर में जरूर आता है व पूरी तरह से रंग जाने की कोशिश करता है।

श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’




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