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बिकता मीडिया गिरता स्तर

19 Nov 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

Shyam Narayan Ranga

श्याम नारायण रंगा

समाज सेवा का सबसे अच्छा व लोकप्रिय का एक साधन पत्रकारिता के रूप मे भी प्रतिष्ठित है और बीते पॉच सालों के पत्रकारिता कार्य मे मैने प्रिंट, इलैक्ट्राॅनिक, वेब मीडिया के साथ स्वतंत्र पत्रकारिता की है। इन्ही पॉच वर्षो के कार्यानुभव के आधार पर पत्रकारिता के लेकर अब मेरा एक अलग सा ही नजरिया बनता जा रहा है। अलग इसलिए की मुझे जब ई टीवी राजस्थान से जुडने से पहले एक साक्षात्कार का सामना करना पडा तो उस साक्षात्कार में ई टीवी के तत्कालीन चैनल प्रभारी तारकेश्वरजी मिश्रा ने मुझसे पूछा था कि आप इस क्षेत्र में क्यों आना चाहते हैं तो मैंने अपना नजरिया यह कहते हुए स्पष्ट किया था कि यह समाज के प्रत्येक वर्ग से जुडने का एक अच्छा जरिया है और विभिन्न संस्कृतियों, समाजों के बारे में आप अच्छी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और देश की सेवा करने का यह एक अच्छा जरिया है। मेरा आज भी यह सोचना है कि पत्रकारिता एक जज्बा है और एक जुनून है जिससे आप अपनी ज्ञान की भूख समाज से सीधे संवाद कर शांत कर सकते हैं। लेकिन जब चारों तरफ नजर दौडाते हैं तो वास्तविकता कुछ और ही नजर आती ह। वास्तव में मीडिया और मीडिया से जुडे लोगों ने अपने आप को इतना बडा मान लिया है कि वे समाज से कट से गए हैं और कुछ विशिष्ट बनने की चाह ने पत्रकार को वीआईपी भी समझ चुके है। मीडिया अपने दायित्व से विमुख होता जा रहा है और आज पत्रकारिता शुद्ध रूप से व्यावसाय बन गया है।
वर्तमान में राजस्थान में चुनावी माहौल चल रहा है। मुझे मेरे एक पत्रकार मित्र ने एक उम्मीदवार के मीडिया सेल को संभालने के लिए कहा। मुझे यह काम पेशेवर चरित्र के खिलाफ लगा तो मैंने यह काम करने से मना कर दिया। अगर मै उस उम्मीदवार के लिए काम करता तो शायद मेरा नजरिया पत्रकार का न होकर एक ठेकेदार का हो जाता जिसने अमुक उम्मीदवार के लिए काम करने का ठेका लिया है। खैर व्यावसायिकता के इस दौर में यह कोई बडी बात नहीं है और मेरा इस काम के लिए नकाराना मेरे मित्रों को मूर्खता ही लगेगा। हम चुनाव के इस संदर्भ में ही ले तो यह बात सामने आती है कि वास्तव में अखबारों में उसी उम्मीदवार की खबरे लगती है जिसने खबरें लगवाने के लिए कोई कीमत चुकाई है। इसे विज्ञापन की श्रेणी मे खडा करके इम्पेक्ट न्यूज के नाम से परोसा जा रहा है लेकिन सब जानते हैं कि जो उम्मीदवार यह कीमत नहीं चुकाता है उसे अखबार के किसी कोने में वह स्थान दे दिया जाता है जहाँ सभी की नजरें कम ही जाती है। मैं आपको यह बात एक उदाहरण देकर समझाना चाहगा कि मेरे शहर बीकानेर के एक राष्ट्रीय पार्टी के लोकप्रिय उम्मीदवार ने अपना नामांकन हजारों समर्थकों के साथ दाखिल किया और सारे शहर में यह चर्चा का विषय था कि इतनी भीड लेकर किसी उम्मीदवार ने आज तक अपना पर्चा नहीं भरा है और निश्चय ही भीड कल के अखबार मे देखने को मिलेगी। इस उम्मीदवार के बारे में यह चर्चा है कि वह आने वाले समय में प्रदेश का मुख्यमंत्री भी हो सकता है लेकिन यहाँ के राष्ट्रीय स्तर के अखबारों ने इस खबर को ऐसे लगाया जैसे किसी निर्दलीय ने अकेले जाकर नामांकन दाखिल कर दिया हो तो फिर फोटो लगाने का तो सवाल ही नहीं उठता। अगले ही दिन एक निर्दलीय उम्मीदवार ने अपना नामांकन दाखिल किया और वह उम्मीदवार एक धन्ना सेठ है तो इम्पेक्ट न्यूज के नाम पर वह वो जगह पा गया जिसकी आम आदमी कल्पना ही नहीं कर सकता है। तो इस तरह खबरें बिकने लगी है और पत्रकार की कलम की धार उतनी ही तेज होती है जितनी की उस धार की कीमत चुकायी जा रही हैं।  अब आम आदमी क्या जाने की इम्पेक्ट न्यूज क्या है और बिना दाम की न्यूज क्या। सच्चे, निहित स्वार्थो से परे, निर्भीक, सच्ची, खरी-खरी खबरों को परोसे जाने को लेकर बडे बडे दावे करने वाले इन अखबारों के भरोसे मे रहकर हवाओं का अनुमान लगाने वाले तो यह ही समझते हैं कि शायद इम्पेक्ट न्यूज वालों का जोर ज्यादा है। मीडिया के इस बिकाउपन ने वास्तव में मीडिया के स्तर को गिरा दिया है। वर्तमान में राजस्थान सहित कईं राज्यों में लोकतंत्र का सबसे बडा उत्सव मनाया जा रहा है। जनता अपने पाँच साल के भाग्य का फैसला करेगी। भारत जैसे देश में जहाँ शिक्षा की कमी व अनुभव के चलते अभी लोकतंत्र की समझ का अभाव है जातिगत कट्टरता और क्षेत्रीयता ने लोकतंत्र को प्रभावित कर रखा है। अतः यहाँ मीडिया की जिम्मेदारी ज्यादा बढ जाती है कि वह अपने काम को एक हवन मान कर करें और अपनी पूरी ताकत लगा दे कि जनता अपने सही मत का सही तरीके से प्रयोग कर सके। एक तरफ हम यह बात करते हैं कि राजनीति में स्तर गिर रहा है, वोट खरीदे जा रहे हैं, दारू पिलाकर वोट ले लिए जाते हैं, जाति की धारणा जीत को जय करती है तो ऐसी स्थिति में मीडिया की यह प्रमुख जिम्मेदारी है कि वह इन सब बातों को उजागर करें और जनता को यह बताने का प्रयास करें कि वर्तमान में उसका क्या महत्व है। आज किसी न किसी रूप में मीडिया ने घर घर पहच बनाई है और लोगों को आज भी भरोसा है कि मीडिया में सच छपता है तो ऐसी स्थिति में मीडिया की भरोसे को कायम रखते हुए जिम्मेदारी से अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि मीडिया से जुडे लोग इसे  कमाई के दिनों के तौर पर देखेते हैं और ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन बटोरने का प्रयास करते हैं। इस बारे मे जब इनसे बात की जाती है तो यह सुनने को मिलता है कि अभी को सीजन है अभी नही विज्ञापन नही बटोरने तो कब बटोरेंगें। उम्मीदवारों और पार्टीयों से विज्ञापन बटोरने का काम जोरों पर है और कुछ को तो तनख्वाह व कमीशन के आधार पर ही विशेष नियुक्ति दी जारही है। उम्मीदवार भी जानते हैं कि अगर हमें अखबार में जगह पानी है तो कीमत चुकानी पडेगी और हम पैसा देकर जो चाहे वो छपा लेंगे। और ऐसा हो भी रहा है। ऐसी स्थिति मे पाठक जो कि एक आम मतदाता भी है क्या उम्मीद करे की हम स्वस्थ लोकतंत्र की स्थापना कर पाएंगे। धरातल की हकीकत देखते हैं तो दिल चीख उठता है और लगता है कि जैसे व्यावसायिकता ने मीडिया की ऑंखों पर पट्टी बाँध दी है और उसे पूर्णरूप से बिकाउ बना दिया है। लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ पर वर्तमान में भारी जिम्मेदारी है और उसे चाहिए कि वह इस बोझ को उठाएं ताकि जागरूक पाठकों का विश्वास कायम रह।
अनेकों बार हमे उलट सुनने को मिल जाता है कि एक पत्रकार की क्या औकात होती है इसे तो एक प्लेट नाश्ता और एक कप चाय पिला दो और अगले दिन अखबार देख लो, सब कुछ माफिक मिल जायेगा तो धरातल पर देखकर ऐसा लगता भी है कि उनकी ये उलाहना सही है। हो सकता है कि मेरी यह बात कईं पेशेवर बन्धुओं को बुरी लगे लेकिन जिन्हें बुरी लगती है वे भी जानते हैं कि सच यही है और बुरी लगने का कारण भी यह है कि आखिर यह बात आपने कैसे कह दी। लेकिन दोस्तों वास्तविकता यही है कि आम लोग हमारे बारे में ये बातें करते हैं और हमे ज्यादा दुख इसी बात का होता है। मैं कहना चाहगा की जो व्यक्ति नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है वह नादान है और उसे माफ किया जा सकता है लेकिन जो जानता है कि वह क्या कर रहा है और फिर भी वह गलत करता है तो वह अपराधी है। आखिर यह हालात बने क्यों अगर हम यह सोचें तो ज्यादा अच्छा होगा। अब क्या करे, बेरोजगारी ने भी गली गली में पत्रकार पैदा कर दिये है। एक छोटा सा अखबार निकालते हैं जिसकी पचास प्रतियाँ भी नहीं छपती है लेकिन वो अपने आप को किसी राष्ट्रीय समाचार पत्र के सम्पादक से कम नहीं समझते, सरकारी कागजो में हजारों प्रतियाँ बेच कर वह अपने पत्रकार होने का अहसान पूरे देश पर जमाता है। वास्तव में मीडिया का नजरिया समाज के प्रति बदल गया है। पत्रकारों में सेवा की भावना नहीं रही है और वे अपने आप को किसी आई ए एस अधिकारी से कम और किसी एम पी, एम एल ए से नीचा नहीं देखते। एक पत्रकार की चाह रहती है कि वह किसी लाईन में खडा न हो, उसे घर बैठे ही गैस सिलेण्डर उपलब्ध हो जाए, वह तब किसी अस्पताल में जाए तो डॉक्टर उसे छोडने बाहर आए और जब वह किसी अधिकारी से बात करे तो अधिकरी की घिघ्घी बंध जाए, उसके कहने से उसके साथियों का स्थानान्तरण हो और पुलिस का कोई हवलदार ट्रेफिक नियमों के नाम पर उसे तंग न करे आदि आदि। मेरे कहने का मतलब है कि पत्रकार में सेवा की भावना नहीं रही और वह अपने आप को अभिजात्य वर्ग का समझने लगा है। समाज से दूर रहकर समाज सेवा नहीं की जा सकती और मीडिया की समाज से दूरी ने मीडिया को बिकाउ बना दिया है। टी वी चैनलों का गिरता स्तर आज आप सब के सामने हैं। दिन भर खून खराबा के खबरें, किसी स्टंट के नाम पर सनसनी और किसी ऐसी खबर की चर्चा जिसे आप किसी फिल्म में देखना पसंद करते हैं। वास्तव में मीडिया के ताकतवर होने की चाह ने उसे अंधा बना दिया है। किसी ने कहा कि मीडिया एक हाथी है जिसे खाने के लिए बहुत कुछ चाहिए और जब कुछ नहीं मिलता तो मदमस्त हाथी भूख से आतंक मचाने लगता है और चौबिस घंटों के चैनलों और चौबीस पन्नों के अखबारों की यह मजबूरी है कि वह कुछ न कुछ तो दिखाऍं, कुछ न कुछ तो लिखें और जब कुछ नहीं होता तो खबरें बनाई जाती है और राई का पहाड बनता है। तो मैं पूछना चाहता ह कि क्या यह जरूरी है कि आप चौबीस घंटे खबरें ही दिखाओं और चौबीस पन्नों का अखबार निकालो ही निकालो। समाज में जरूरी है वह ही जरूरी रहे तो अच्छा है गैर जरूरी को जरूरी बनाया जाना उचित नहीं है।
हो सकता है कि मेरा यह लिखा किसी संभ्रांत पत्रकार को पंसद न आए लेकिन यह सच है और सच से मह मोडकर सच को मिटाया नहीं जा सकता। मैं उन पत्रकारों से माफी मांगता ह जो पत्रकारिता को एक मिशन समझते है और इसे पूजते हैं। आज भी समाज में ऐसे पत्रकार हैं जो समाज की सेवा को ही अपना धर्म मानते है और म उन सब को कोटि कोटि नमन करता ह। आज भी ऐसे लोग हैं जिनसे उम्मीद की किरण बाकी है। मैंने यह सारा अपने अनुभव के आधार पर लिखा है।



Comments to this Article
Outstanding article, Rahul Vyas (2008-11-19 22:46:14)
nischit rup se article me likhi gai cheeze patrakarita ke chetra me gaur karne layak hai isme koi shak nahi hai magar kuch laine vyakti visesh ko visesh rup se likhi gai hai jisse yeh article sandeh ke ghereh me aa gaya hai aur aapne vishai (subject) se bhatak chuka hai., Shree Gopal vyas (correspondent Tv) (2008-11-19 23:53:48)
VERY GOOD, DEVENDRA SINGH KASWA (2008-11-20 00:01:30)
Ranga G. aapke man ke udgar pade. sahmat bilkul nahi hu. impect news naam se koi patrakarita ko bech raha hai to ese sarvjanik tor par patrakarita ka bikaupan nahi kahna chahiye. ye ek newspaper ka kahna ho sakta hai. State ke sabse bade news paper rajasthan patrika me ese artical ke saath ADVT. likha aa raha hai. khabar ke saath koi samjota nahi hai. aap ese newspaper ko padhte hi kyo ho jiski fitrat hi bikao rahi hai. PATRAKARITA KHARAB NAHI HAI, BIKAU NAHI HAI, koi akhabar ese ho to uska bahiskar karo. Jo patrakarita ke mulyo ko bachane me jute hai unhe gaali mat nikao. aap ne jinke baare me likha hai unka naam lene me hichak kyo., A journalist (2008-11-20 00:45:08)
Ranga G.,what u have written is correct and true but if u raise this fact association of patrkarita dismiss from membership and u will we punished from that media in the form of layoff.So no one raise this and every one knows every thing what is going on in society.
Thanks a lot to write this article., Lalmani (2008-11-20 10:15:27)
well said shyam.i too agree with u.it all started when news became a product and ownership of newspaper diverted to the corporates instead of real mission based true journalists,editors. they made it an industry which work on the basis of profit. profit from anywhere, profit from any means.anyhow, it provides me immense pleasure that there is someone who dares to show mirror.let us discover true journalism in sacred means.now its time to really salute true but rare journalist and salute to u as well , sanjay purohit (2008-11-20 10:39:32)
wow thats d spirit man actually our country needs such reporter nd this article is best way to encourage them keep it up man u rocking best of luck we r waiting for another such article , Ann-anil (2008-11-20 17:48:45)
प्रिय श्याम नारायण रंगा जी
आप ने आज की पत्रकारिता का वह असली रूप पेश किया है जिसकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है.
पत्रकारिता की वर्तमान दशा पर आपने जो कुछ लिखा है शायद इससे भी ज़्यादा भयावह हो चुकी है वर्तमान पत्रकारिता अखबार के धनाढ्य मालिकों से लेकर छुटभैये पत्रकारों तक सभी आकंठ डूबे हैं इसमें. मगर आप जैसी सोच रखने वाले पत्रकारों की मोजूदगी अपवाद भी है समूह मालिकों में भी संपादक स्तर पर भी ओर छोटे पत्रकारों व लेखकों में भी . ख़ुद आपकी सोच का व्यक्ति इस बात का सुबूत है की पत्रकारिता के पेशे को एक नैतिकता व ज़िम्मेदारी भरा पेशा समझने वाले पत्रकार अभी सक्रिय हैं. मैं आप के जज्बे की कद्र करता हूँ. आप से यह भी निवेदन है की आप यूँ ही लिखते रहें खूब लिखें और बहुत खूब लिखें. खुदा आपकी साफगोई में और इजाफा करे. आमीन. मुझे नहीं पता आप के यह ख़यालात कहाँ तक पहुंचे ओर किस ने क्या महसूस किया मगर मुझे आपके जज़्बात और इतनी साफगोई यकीनन बहुत अच्छी लगी.
आपका शुभचिंतक
तनवीर जाफरी, Tanveer Jafri (2008-11-21 21:24:37)
sahi kaha hai aap ne upar jo bhi likha hai usme , kisi samachar patra ke liye mene jaipur mai 2 mah tak viswas ke aadhar par kam kiya or 20000 /- Rs. tak ka kam bina kisi ana kani ke kadi mehnat ke sath kiya par un logo ne mere viswas ke sath ghat kiya or muje sirf 10000/- Rs hi diye mai ne kuch nahi kaha kyon ki maine bina jane buje hi us samachar patra ke nideshak ki bat par viswas kar liya than N.K.Sing nam tha un sajan purush ka...samaj mai viswas banane ka kam press ka hai par press hi viswas tod de to ke berojgar, ek akela kalak kar kaha jaayega is desh mai....
jai shree krisnaa..
thanks fot this article
, yogendra kumar purohit (2008-11-25 22:33:50)
ranga ji bahut barhiya lekh hai.
wartman ghatiya patrkarita ko aapne nanga karke rakh diya. Aap ke lekh ke samarthhan wa taarif men jab Tanveer Jafri sahab jaise samarpit aor mahan lekhak khare ho jaen iska arth hai ki baat men dam hai., rajdeep singh (2008-12-23 20:56:01)

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