Monday, 12 April 2021

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अमेरिकी व पाक सेना के मध्य दरकते रिश्ते


तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

पाकिस्तान को अमेरिका के प्रमुख सहयोगी देशों में से एक माना जाता है। 1971 में भारत व पाकिस्तान के मध्य दो सप्ताह के हुए युद्घ तथा बंग्लादेश के उदय के समय भी अमेरिका व पाकिस्तान के मधुर संबंध उजागर हुए थे। यह और बात है कि श्रीमती इंदिरा गांधी के रूप में भारत के तत्कालीन सबल नेतृत्व ने अमेरिका की परवाह किए बिना पाकिस्तान से निर्णायक युद्घ लडा तथा बंग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में सर्वप्रथम मान्यता प्रदान की। तब से लेकर अब तक अमेरिका पाकिस्तान को आर्थिक व सामरिक स्तर पर हर तरह से सहयोग करता आ रहा है।

अमेरिका में हुए 9/11 के हादसे के बाद अमेरिका व पाकिस्तान के मध्य रिश्ते और प्रगाढ हो गए थे। इसका मुख्य कारण था अमेरिका द्वारा आतंकवाद के विरुद्घ विश्वव्यापी युद्घ छेडने की घोषणा करना तथा तत्कालीन पाक जनरल परवेज मुशर्रफ के नेतृत्व में पाक सेना का अमेरिका को इस मिशन में खुलकर सहयोग दिया जाना। आतंकवाद विरोधी युद्घ की अमेरिका की इस घोषणा में पाकिस्तान अमेरिका का इस हद तक सहयोगी बना कि उसने अमेरिकी गठबंधन सेना द्वारा अफगानिस्तान के तालिबानी शासन को उखाड फेंकने में न केवल अमेरिका के सहयोगी देशों में अपनी अग्रणी भूमिका अदा की बल्कि पाक-अफगान सीमा के निकट पाक क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अड्डा बनाए जाने की भी इजाजत दे डाली। सन् 2002 में अफगानिस्तान की कट्टरपंथी तालिबान सरकार के अपदस्थ होने से लेकर अब तक न सिर्फ पाकिस्तान के भीतर कई अहम् राजनैतिक उतार-चढाव आ चुके हैं बल्कि अफगानिस्तान में भी इस दौरान अनेकों उतार-चढाव देखने को मिल रहे हैं।


उधर पाकिस्तान में जनरल परवेज मुशर्रफ अब मात्र राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ही रह गए हैं। यहां तक कि अब तो उनके राष्ट्रपति पद पर बने रहने की संभावनाएं भी धूमिल होती नजर आ रही हैं। पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ ने अपने वादे के मुताबिक चुनाव भी करवा दिए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री बेगम बेनजीर भुट्टो आतंकवाद की भेंट चढ चुकी हैं। इस समय पाकिस्तान सहित दुनिया की कट्टरपंथी ताकतें परवेज मुशर्रफ को राष्ट्रपति पद पर बैठे हुए कतई देखना नहीं चाहतीं। जबकि नवाज शरीफ व इफ्तिखार चौधरी को परवेज मुशर्रफ से अपना-अपना बदला लेने का इससे अच्छा कोई और अवसर दिखाई नहीं दे रहा है। पाकिस्तान में भ्रष्टाचार का पर्याय समझे जाने वाले आसिफ अली जरदारी एवं नवाज शरीफ इस समय पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार के दो प्रमुख रहनुमा के रूप में उभरकर सामने आए हैं तथा परवेज मुशर्रफ से मात्र अपना राजनैतिक बदला चुकाने के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देते फिर रहे हैं। जाहिर है यह सभी हालात पाकिस्तान के लिए शुभ लक्षण नहीं हैं। इतना ही नहीं बल्कि इस प्रकार की भीतरी राजनैतिक उथल-पुथल के परिणामस्वरूप ही पाकिस्तान, पाक-अफगानिस्तान सीमा तथा अफगानिस्तान में कट्टरपंथी तालिबानों को पुनः मजबूत करने में सहायक हो रहा है।


पाकिस्तान पर वैसे भी काफी लंबे समय से आतंकवादियों को पनाह देने तथा इसे फलने-फूलने के लिए आसान राह हमवार करने का आरोप लगता रहा है। अफगानिस्तान में सत्तारूढ रह चुके तालिबानों ने तो पाकिस्तान में बाकायदा अपना मुख्यालय तक बना रखा था। 2002 में अफगानिस्तान पर हुए नाटो देशों के हमले के समय भी तालिबान प्रवक्ता पाकिस्तान में ही बैठकर अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया को सम्बोधित किया करता था। पाकिस्तान द्वारा तालिबानों को दी जाने वाली सहायता तथा संरक्षण गत् वर्ष उस समय सिर चढ कर बोला था जबकि परवेज मुशर्रफ को ऑप्रेशन लाल मस्जिद तक कराना पडा था। खबर है कि यह कट्टरपंथी शक्तियां एक बार पुनः बडे पैमाने पर पाकिस्तान, पाक-अफगान सीमा तथा अफगानिस्तान में अपनी भरपूर   ताकत के साथ सक्रिय हो चुकी हैं। जाहिर है कट्टरपंथियों की इस सक्रियता के परिणामस्वरूप अमेरिकी सेना को अपने आतंकवाद विरोधी मिशन के तहत काफी कुछ मनमानी किए जाने का भी मौका मिल रहा है।

गत् दस जून को पाक-अफगान सीमा के मोहमंद नामक कबायली इलाके में अमेरिकी वायुसेना द्वारा एक मिसाईल हमला किया गया। जिसमें अमेरिका की अपनी सहयोगी पाकिस्तानी सेना के 11 जवानों की मौके पर ही मौत हो गई। अमेरिकी अथवा अमेरिकी गठबंध सेना द्वारा पाकिस्तानी सेना पर किया गया यह कोई पहला मिसाईल हमला नहीं था। इसके पूर्व भी कई बार अमेरिकी सेना पाक सैनिकों पर मिसाईल दाग चुकी है। और ऐसे प्रत्येक हमले के बाद अमेरिका द्वारा हमले की निंदा किए जाने के औपचारिक शब्द बडे ही कूटनीतिक अंदाज में कह दिए जाते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। पाक प्रधानमंत्री यूसुफ रजा जीलानी ने अमेरिका द्वारा पाकिस्तानी सेना को निशाना बनाकर किए गए इस मिसाईल हमले को गठबंधन सेना व पाकिस्तान के सहयोग की बुनियाद पर गहरी चोट बताया। जबकि सैन्य गठबंधन नाटो के अधिकारियों ने यह कहते हुए इस हमले से अपना पल्ला झाड लिया कि यह गठबंधन सैनिकों का नहीं बल्कि अमेरिकी वायुसैनिकों द्वारा किया गया हमला है।

पाकिस्तान के सीमा क्षेत्र के भीतर हुए इस अमेरिकी मिसाईल हमले पर हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने खेद जताया है तथा पाक सैनिकों की मौत पर दुःख व्यक्त किया है परन्तु अमेरिकी सैन्य विभाग इस कार्रवाई को अपने अधिकार क्षेत्र में की गई कार्रवाई बता रहा है। पैंटागन ने इस हमले को न्यायसंगत ठहराते हुए कहा है कि अमेरिकी सेना द्वारा आत्मरक्षा में यह कार्रवाई की गई थी। बताया जा रहा है कि अफगानिस्तान के निकट पाक सीमा के भीतर हुए इस हमले में 8 तालिबान लडाके भी मारे गए थे। इस हमले के बाद एक बार फिर पाकिस्तान उस संदेह के दायरे में आ गया है जिसके तहत कि उस पर तालिबानों को मदद करने का आरोप लगता रहा है।

अभी कुछ दिन पूर्व ही एक प्रतिष्ठित अमेरिकी संस्था रैंड कॉर्पोरेशन ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें पाकिस्तान पर तालिबान की मदद किए जाने का आरोप लगाया गया है। रैंड कॉर्पोरेशन ने अपनी रिपोर्ट में आरोप लगाया है कि पाकिस्तानी खुफिया तंत्र के लोग तालिबान चरमपंथियों से सांठगांठ रखते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पाक गुप्तचर संस्था आई एस आई के सदस्य अफगानिस्तान के तालिबानी चरमपंथियों को आर्थिक सहायता पहुंचा रहे हैं। यहां तक कि इस रिपोर्ट में आई एस आई के सदस्यों द्वारा सैन्य कार्रवाई में घायल तालिबान चरमपंथियों को चिकित्सा सहायता व साथ ही साथ आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराए जाने का आरोप है। रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तानी सूत्रों द्वारा व्यक्तिगत् स्तर पर तालिबानी लडाकुओं को अफगानिस्तान सेना तथा विदेशी सेनाओं के संबंध में गुप्त रूप से जानकारी दी जाती है, जिसके परिणामस्वरूप कुछ अमेरिकी व नाटो सैन्य अभियान भी प्रभावित हुए हैं। उधर पाकिस्तान सरकार व पाक सेना द्वारा निरंतर ऐसे सभी आरोपों का खंडन किया जाता रहा है तथा इन आरोपों को पाक द्वारा हमेशा ही बेबुनियाद बताया गया है।

प्रश्न यह है कि एक ओर पाकिस्तानी सेना का अमेरिका के आतंकवाद विरोधी विश्वव्यापी अभियान में शामिल होना तथा अमेरिका के सैन्य सहयोगी होने के नाते कट्टरपंथी तालिबानों की नजरों में उनका सबसे बडा दुश्मन होना तो दूसरी ओर उसी पाक सेना का तालिबानों की मदद किए जाने के आरोप में संदेह के दायरे में घिरना तथा एक नहीं बल्कि अनेकों बार ‘धोखे’ से या ‘जानबूझ’ कर अमेरिकी हमलों की चपेट में पाक सैनिकों का आना आखिर किस ओर इशारा करता है। जाहिर है ऐसे हालात में न सिर्फ पाकिस्तानी सेना का मनोबल गिर रहा है तथा उसे आतंकवाद विरोधी मुहिम में दिक्कतों का सामना पेश आ रहा है बल्कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में पाक सैनिकों के मारे जाने पर पाक सेना में भारी रोष भी देखा जा रहा है। संभव है कि ऐसे घटनाक्रम अमेरिकी व पाकिस्तानी सेना के मध्य दरकते रिश्तों का कारक साबित हों परन्तु इतना अवश्य है कि चाहे वह पाकिस्तान की भीतरी उथल-पुथल हो अथवा आतंकवाद विरोधी मुहिम में शामिल सेनाओं का एक दूसरे को संदेहपूर्ण नजरों से देखना। यह सभी हालात आतंकवाद को बढावा देंगे तथा आतंकवाद विरोधी मुहिम को इन परिस्थितियों में गहरा झटका लगने का भी संभावना है। और उपरोक्त सभी हालात मानवता के लिए शुभ संकेत नहीं कहे जा सकते। 


 

तनवीर जाफरी - [email protected]