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चार आलसी

15 Jun 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

मिर्थिला में वीरेश्वर नाम के महामंत्री थे। वे स्वभाव से दानी और दयालु थे। वे स्वभाव से दानी और दयालु थे। वे आलसियों और भिखारियों को भोजन देते थे। भोजन पाने वालों में बहुत से ऐसे झूठे आलसी थे जो नकली भिखारी बने हुए थे, फिर भी उन्हें चना मिलता था। दुनिया में कई प्रकार के कम्रहीन मनूष्य होते हैं। उनमें आलसी का नाम सबसे ऊंचा है। भूख की आंच से अंतडयां ऐंठती रहती हैं तो भी वह हाथ-पैर हिलाना नहीं चाहता। मेहनत-मशक्कत का, कोई झमेला नहीं। मीठी नींद पेट की आग को काबू में रहती है। महामंत्री के यहां पेटुओं की भीड प्रतिदिन बढने गली। अहदियों की मौज देखकर, बहुत-सारे चालाक आदमी अपना झूठ-मूठ का आलस्य दिखला कर वहां आने लगे। उन्हें भी भर-पेट खाना मिलने लगा। कुछ ही दिनों में अनाथालय अहदी लोगों से भर गया। आलसियों के पीछे बहुत ज्यादा धन खर्च होने लगा। अनाथालय के अधिकारियों का माथ ठनका। उन्होंने सोचा, मालिक ने अहदियों को अपंग जानकर उनके लिए खाने-पीने की मुफ्त व्यवस्था करवाई। अब जो आलसी नहीं हैं वे भी आलसी बनकर भोजन पाने लगे है। यह हमारी भूल है कि हम उन्हे नहीं हटाते। मालिक का यह नुकसान नाहक हो रहा है। हमें सच्चे अहदियों की जांच करनी चाहिए। झूठ-मूठ के मुफ्तखोरों को निकाल बाहर करना है। सर्दी का मौसम था। रात को अहनाथलय के सभी अहदी सो चुके थे। अधिकारयिों ने उन कुटीरों में आग लगवा दी। जलने के छर से फुर्तीले लोग भाग पूरे आलसी नहीं थे। बस चार आदमी नहीं भागे। वे रजाई ओढकर लेटे थे। शोर-गुल सुनकर उनमें से एक जरा-सा सुगबुगाया। वह रजाई के अंदर से ही बोला- ’यह कैसा हल्ला सुनाई दे रहा हैं? क्या हुआ?‘ मुंह उघाड कर दूसरे ने कहा- ’लगता है, इसी मकान में आग लगी है।‘ तीसरा बोला- ’ओह, आग तो बढती ही जाएगी। अगर भीगे कपडे या चटाई से कोई हम लोगों का ढंक जाता!‘ चौथे ने कहा- ’क्या बक-बक मचा रखी है? चुपचाप पडे क्यों नहीं रहते?‘ ’अहदी-भवन‘ के अधिकारियों को इन चारों के बारे मे बतलाया गया। उनके आदेश से चारों अहदियों को खींच-पकडकर बाहर लाया गया। इस प्रकार उनके प्राणों की रक्षा की गई। आलसियों को महामंत्री के सामने हाजिर किया गया। महामंत्री जी का हुक्म हुआ- ’इनचारों को अब पहले से भी अधिक खाद्य वस्तुएं दी जाएं। शेष नकली आलसियों को बाहर कर दिया गया।

 



Comments to this Article
nice story, ssssdfgh (2011-01-13 08:40:33)

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