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8
Mar
वागड में रंग-रस बरसते हैं रंगपंचमी को
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संदर्भः रंग पंचमी होली मेलाः 15 मार्च 2009

होली के बाद की पंचमी गुजरात और मध्यप्रदेश की सरहदों से छूते राजस्थान के दक्षिणी सिंहद्वार आदिवासी बहुल वागड अंचल के लिए रंगों और रसों की बारिश का दिन होता है। इस दिन बांसवाडा और डूँगरपुर क्षेत्र में हर कहीं होली और फागुनी मस्ती का ज्वार उमडता है।
रंगपंचमी का दिन नृत्योल्लास का वार्षिक महापर्व होता है जब ग्राम्यांचलों में हर कहीं फागुनी लोक नृत्यों और गैर-डाण्डिया नाच-गान की लोक लहरियों पर पर्वतीय उपत्यकाएँ झूमने लगती हैं।  
डूंगरपुर जिले की बिछीवाडा पंचायत समिति के वैंजा गांव में रंग पंचमी पर नृत्य होता है इसमें जनजाति युवक-युवतियों की भारी भीड उमडती है। रंगपंचमी को ही करावाडा के पास नानोडा गांव में मेला भरता है जिसमें जन सैलाब उमडता है। इस मेले को ‘भादरवी’ कहा जाता है। ढोल-ढमकों व लोक वाद्यों के साथ ग्रामीण आते हैं और गैर मेले का आनन्द लेते हैं।
बांसवाडा जिले के घाटोल कस्बे में रंग पंचमी को दोपहर युवाओं की टोलियां आती हैं। गांव के प्रतिनिधि इनका गुलाल लगाकर स्वागत करते हैं और सम्मानपूर्वक गैर खेलने का निमंत्रण देते हैं। पुराने बस स्टैण्ड पर ढोल थाली, मंजीरों, घण्टी, कुण्डी की ताल पर पाँव में बंधे घुंघरुओं के साथ ग्रामीणों के कई बडे-बडे गैर नृत्य खेलते हैं। इसमें सेठ परम्परा के अनुसार जैन समाज द्वारा भंग का वितरण किया जाता है
गैर नृत्योत्सव से परिपूर्ण इस मेले में ग्रामीण रंगीन परिधान पहने, हाथों में रंगे हुए डण्डे लिये, आंखों पर चश्मा व कानों पर फूल चढाये तथा सिर पर चुनरीदार साफा पहने पूरे फागुनी अन्दाज में शिरकत करते हैं।
फागुन की मौज-मस्ती में रमे हुए ये गैर नर्तक परम्परागत वागडी गीत ‘‘ जीवतडो जीवु रे भाईला समिए पांसम रमु रे, समिए आडा पोडे पडिया कुण मरे कुण जीवे रे...’’ अर्थात अगले वर्ष कौन जीए कौन मरे यह किसको पता है। यदि जिन्दगी रही तो अगले वर्ष फिर रंगपंचमी खेलने आएंगे।
सुरवानिया में रंग पंचमी पर परंपरागत गढ भागने अर्थात् किले को तोडने का आयोजन होता है। गांव के मुख्य चौराहे पर ढोल-ढमकों के साथ ग्रामीण एक दूसरे के हाथ थाम कर गोल घेरा बनाते हैं। इस गोल घेरे में दूसरे दल के लोग मौजूद रहते हैं। कुछ लोग बाहर रह कर हाथ में कपडे से निर्मित चाबुक ‘कोडा’ लिए होते हैं। ये लग गढ तोडने वालों के प्रयासों को नाकाम करने लगते ह। तेज आवाजों और ढोल के नादों पर जब उत्साह पूरे यौवन पर होता है कुछ लोग इस गढ को तोड कर अन्दर घुस जाते हैं।
सागवाडा उप खण्ड मुख्यालय पर कण्डों की राड खेली जाती है। इसमें विभिन्न समूह आमने-सामने कण्डे फेंक कर होली का मजा लेते हैं। ढोल-नगाडों की तान पर ये समूह करीब तीन घण्टे तक कण्डों की राड का लुत्फ लेते हैं। इस साहसिक व आकर्षण भरे खेल को देखने दूर-दूर तक लोगों का जमावडा लगा रहता है। दोपहर से शुरू होने वाली यह राड सांझ ढलने पर ही पूरी होने का नाम लेती है।
सागवाडा की परंपरा के अनुसार इस राड के साथ ही होली का समापन होता है। दोपहर में शुरू होने वाली यह राड सांझ ढलने पर सम्पन्न होती है। इसी प्रकार रंगपंचमी पर डूंगरपुर से 12 किमी दूर भुवनेश्वर धाम पर तीन दिन का मेला भरता है।
 वनांचल में होली पर इसी प्रकार की अनेक रोचक परम्पराओं का दिग्दर्शन होता है। ये परम्पराएं जहां पुरातन लोक संस्कृति की अक्षुण्ण धाराओं को प्रकट करती हैं वहीं मौज-मस्ती के साथ जीवनयापन का संदेश भी संवहित करती हैं।




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