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दर्द ए आस्ट्रेलिया

18 Oct 2007      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

Manish

संदर्भ - रंगभेद टिप्पणी पर बवाल

आस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम ने भारत में एक बार फिर साबित कर दिया कि वह विश्वचैम्पियन टीम है परन्तु इसके अलावा आस्ट्रेलियन टीम ने यह भी साबित किया है कि उसके गरूर को जब भी चुन्नौत्ती मिलती है उसे बर्दाश्त नहीं होती है। रिकी पोंटिग की टीम सीरीज में एक तरफा जीत हासिल नहीं कर पाई और कई अवसरो पर टीम काफी कमजोर दिखाई दी। इस प्रदर्शन आस्ट्रेलियन टीम को भविष्य का संकेत दे दिया और पोंटिग की टीम ने इससे ध्यान हटाने के लिए रंगभेद का मुद्दा उछाल दिया। पोंटिग ने भारतीय दर्शको और खिलाडयां पर रंगभेद का आरोप लगाकर भारतीय क्रिकेट को दबाव में लाने का प्रयास किया हे। लेकिन यह कहीं न कहीं आस्टलिया का दर्द है तो निकल कर बाहर आया है। अपने आप को अजेय मानने वाले आस्ट्रेलियन जब भी अपने आपको असुरक्षित महसूस करते है तो इस तरह के बवाल खडे करते है। इस सीरीज में भारत ने आस्ट्रेलिया को कडी चुन्नौत्ती दी और सपाट जीत दर्ज नही कर पाने का दर्द इस बेवजह का बयानो से निकल कर आया है।
एंड्रयू साईमण्डस के विरूद्ध नस्ल भेदी टिप्पणीयो की बात कर रिकी पोंटिंग ने भारतीय उपमहाद्वीप और आस्टलियन क्रिकेट में रिश्तो में खटास डाली है। आस्ट्रेलियन रंगभेद के विरूद्ध बिलकुल भी गंभीर नहीं है। गत वर्ष मोटी पनेसर ने जब आस्ट्रेलियन दर्शको के विरूद्ध रंगभेद टिप्पणीयो की शिकायत दर्ज करवाई तो आस्ट्रेलियन क्रिकेट ने कार्यवाही करने में असमर्थता जाहिर की। इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका ने भी आस्ट्रेलियनस के विरूद्ध इस प्रकार की शिकायत दर्ज कराई थी जिसे गंभीरता से नहीं लिया गया। अपने आपको महात्मा सिद्ध करने वाले आस्ट्रेलियन खिलाडी साफ हाथो से न्याय मांगने नहीं आये बल्कि उनकी क्रिकेट को मिल रही चुन्नती के दर्द को छिपाने का प्रयास किया है। दरअसल आस्ट्रेलियन क्रिकेट टीम १९९० के दशक से अपने आपको अजेय मानती आयी है और जब भी उन्हे लगा कि उनके सिंहासन को खतरा है तो उससे पहले ही अपने सिहासन को सुरक्षित करने का प्रयास करते है। १९८० के दशक में वेस्टइंडीज की क्रिकेट अपनी तेज गेंदबाजी के कारण क्रिकेट की दुनिया की बादशाह थी जो आस्ट्रेंलियन को गंवरा नहीं था और तेज गेंदबाजी पर आईसीसी के द्वारा कई प्रतिबंध लगवाकर आस्ट्रेलिया ने वेस्टइंडीज की क्रिकेट को गर्त में धकेलने में महत्वूपर्ण भूमिका निभाई आस्ट्रेलिया की आंख भारतीय उपमहाद्वीप के स्पिन आक्रमण पर भी थी। उसने मुरलीधरन कई कई बार जांच कर उसे अपमानित किया और प्रतिबंध भी लगवाने में प्रमुख भूमिका निभाई। आस्ट्रेलियन टीम भारतीय गेंदबाजो पर भी इस तरह के आरोप लगाती रही है। आस्ट्रेलियन टीम का ताजा बवाल भी अपने नीचे सरकती जमीन को बचाने का प्रयास है।
वास्तव में आस्ट्रेलिया एक छोटा देश और लम्बे समय तक इग्लैण्ड का उपनिवेश रहा है। विश्व के महत्वपूर्ण मसलो मे वह अमेरिका और इग्लैण्ड का पिछलग्गू रहा है। इस कारण विश्व में उसे कोई ज्यादा महत्व नहीं मिलता है। क्रिकेट के द्वारा आस्ट्रेलिया की पहचान है। जब भी वह कोई बडी प्रतियोगिता जीतता है तो वह दूसरी टीमो को अपमानित करने का कोई अवसर नहीं छोडता है। पिछले वर्ष चैम्पियंस ट्राफी जीतने पर ट्राफी लेकर उसने मंच से बीसीसीआई के अध्यक्ष शरद पंवार को धक्का देकर अपमानित किया। वह क्रिकेट के सिहासन को आसानी ने नहीं छोडना चाहता। वह हर एक चीज को जड से खत्म कर देना चाहता है जो भविष्य में उसके सिंहासन के लिए खतरा हो सकता है। २० टवन्टी विश्वकप के सेमिफाईनल में अपनी पराजय को उसने अपमान के तौर पर लिया है और उसे भारतीय टीम भवष्यि की चैम्पियन नजर आती है। इस तरह के बवाल कर वह भारतीय क्रिकेट को दबाव में लाना चाहते है। श्रीसंत पर प्रतिबंध की बात करने वाले आस्ट्रेलियन खिलाडी डेनिस लिलि, डेविड बून, एलन बोर्डर और रिकी पोंटिंग की मैदान की हरकतो को नहीं भूलनी चाहिए। आस्ट्रेलियन अंपायरो के विरोध में कई बार टीमें मैदान के बाहर जा चुकी है।
निः सन्देह आस्ट्रेलिया की टीम विश्व की बेहतरीन क्रिकेट टीम में है परन्तु उसका व्यवहार चैम्पियन जैसा नहीं है। मैदान के बाहर वे क्रिकेट की राजनीति करते हे। इससे क्रिकेट समृद्ध नहीं होकर बदनाम होगा। क्रिकेट को बदनाम करने के लिए कभी पाकिस्तान को दोषी माना जाता था परन्तु आज आस्ट्रेलिया ने सभी हदे पार कर दी है। सिंहासन डोलने की आहट से आस्ट्रेलियन क्रिकेट का दर्द बाहर निकल कर रहा है। लगता है खूबसूरत चैम्पियन टीम का यह दर्द ए आस्ट्रेलिया है।

मनीष कुमार जोशी

 



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