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प. दीनदयाल उपाध्याय के विचार में राष्ट्र के विकास में सास्कृतिक राष्ट्रवाद की भुमिका

10 Feb 2009      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

पुण्यतिथि विशेष

Pandit Deen Dayal Upadhyayविलक्षण बुद्धि, सरल व्यक्तित्व एवं न्ातृत्व के अनगिनत गुणों के स्वामी , प. दीनदयाल उपाध्याय जी  की हत्या सिर्फ 52 वर्ष की आयु में 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय के पास रेलगाडी म यात्रा करते समय हुई थी। उनका पार्थिव शरीर मुगलसराय स्टेशन के वार्ड में पडा पाया गया। भारतीय राजनीतिक क्षितीज के  इस प्रकाशमान सूर्य ने भारतवर्ष  में सभ्यतामूलक राजनीतिक विचारधारा  का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिया। अनाकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी दीनदयालजी उच्चकोटि के दार्शनिक थे।किसी प्रकार भौतिक माया-मोह उनको छू तक नहीं सका। वे देश के न तो प्रधानमंत्री थे और ना ही राष्ट्रपति फिर भी दिल्ली में उनके पार्थिव शरीर को अपने अंतिम प्रणाम करने पांच लाख से भी अधिक जनता उमड पडी थी। तेरहवीं के दिन प्रयाग में अस्थि-विसर्जन के समय दो लाख से अधिक लोग अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करने को एकत्रित हुए थे।

जनसंघ के राष्ट्र जीवन-दर्शन के निर्माता दीनदयाल जी का उद्देश्य स्वतंत्रता की पुर्नरंचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्त्व-दृष्टि प्रदान करना था । सास्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्धान्त के निर्माता दीनदयालजी के अनुसार भारतीय राष्ट्रवाद का आधार उसकी संस्कृति है। देश में समतामूलक समाज  बनाने में प्रयासरत् पंडतजी ने भारतवर्ष में, धर्मराज्य जो  एक असाम्प्रदायिक राज्य, उच्च विचार में एक विधान का राज्य की स्थापना कि कामना की थी। उनके अनुसार धर्मराज्य अधिकार की उपेक्षा कर्तव्य पर बल देने वाला राज्य है। पंडतजी के अनुसार मनुष्य के शरीर-बुद्धि-आत्मा सबका विकास हो, तभी मानव का सम्पूर्ण विकास हो सकता है।
 भारतीय समाज आज भ्रमित और कमजोर, बैद्धिक और राजनीतिक नेतृत्व के हाथों में है, जहाँ गैर-भारतीयता को सेक्युलरवाद और राजनीतिक सफलता का पैमाना माना जाता है। आज राष्ट्रीयता की विचारधारा को हलके ढग से लेते हुए हिन्दुत्व मूलक समाजिक और संास्कृतिक  विचारधारा जो वास्तव में भारतीय सनातनी परिकल्पना का आधार है, को ही संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।

 राष्ट्र समान्यतः राज्य या देश से समझा जाता है । राष्ट्र का एक शाश्वत अथवा जीवंत अर्थ है ’एक राज्य में बसने वाले समस्त जनसमूह ‘। सास्कृतिक राष्ट्रवाद इसी शाश्वत अर्थ को दर्शाता है । राष्ट्रवाद राष्ट्र हितों के प्रति समर्पित विचार है, जो एकता, महत्ता और कल्याण का समर्थक है, समस्त भारतीय समुदाय को समता एवं समानता के सिद्धान्तों पर एकीकरण करने का एक सतत् प्रयास है । राष्ट्रवाद समस्त नागरिकों के प्रति समर्पित विचार है जिसमें सवर्ण, दलित, पिछडे, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब सम्मिलित हैं । नागरिकों को एकता के सूत्र में बाँधने एवं एक दूसरे के प्रति सच्ची श्रद्धा समर्पण ही राष्ट्रवाद है।
राष्ट्रवाद का सीधा संबंध विकास से है जो किसी राष्ट्र के अंतिम व्यक्ति के विकास से परिलक्षित होता है।विश्व के आठ बडे विकसित देशों के समूह जी-८ का विचार करे तो इनमें दो ऐस आर्थिक शक्तिय जापान एवं जर्मनी का ज्वलंत उदाहरण हमारे सामने है जिन्होने लगभग हमारे साथ ही अजादी पायी। ये दोनों राष्ट्र समस्त विश्व के समक्ष एक विकसित राष्ट्र हैं एवं इनमें एक समानता है- राष्ट्रवाद।
 जापान और जर्मनी ये दोनों देश द्वितीय विश्वयुद्ध में बुरी तरह तबाह हो गये थे । काम करने वाले स्वस्थ लोग कम ही बचे थे, आर्थिक एवं राजनैतिक दबाव से ग्रसीत थे तथा कर्ज के बोझ से दबे हुए थे। मैं जापान का  उदाहरण आफ समक्ष रखना चाहगा । सांस्कृतिक दृष्टिकोण से जापान और भारतवर्ष में काफी समानताऍं हैं तथा जापान नें पौराणिक काल में हिन्दू जीवनदर्शन से बहुत सारी बातें ग्रहण की है। आजादी के वक्त, जापान कीं प्रति किलो मीटर जनसख्या भारतवर्ष से लगभग दूगनी थी। प्राकृतिक, आर्थिक एवं भौतिक संपदा औरं संसाधनों में वे भारतवर्ष की तुलना में काफी कम ताकतवर थे। दोनों ही देश आज विश्व के समक्ष आर्थिक शक्ति बन कर उभरें है । जापानी राष्ट्रवाद का सजग उदाहरण वह के कार्मिकों एवं मजदूर वर्ग के असंतोष व्यक्त करने के तरीके से उजागर होता है। जापानी लोग कभी हडताल कर अपने कर्मस्थल में ताला नहीं लगवाते परन्तु वे काला फीता बांध कर विरोध प्रकट करते हैं ।माँग पूरी न होने पर वे अपने उच्च अधिकारियों से बातचीत बंद कर देतें हैं, इससे भी बात न बने तो वे अपने कारखानों मे दुगुना तिगुना उत्पाद करने लगते हैं ।यहाँ यह बताना आवश्यक है कि उत्पादन दुगनी प्रतिशत में बढने से माल का उत्पादन निम्न स्तर का होता है, कारखानों की चलपंजी एवं कलपूर्जो का तेजी से ह्रास होता है और बिकवाली पर प्रतिकुल असर पडता है और मिल मालिकों कि मुश्किलें कई गुना बढ जाती हैं । हमारे धार्मिक ग्रथों में यह कहा गया है कि  कलियुग में ‘संघ’ अथवा एकता मे ही शक्ति समाहित है। एक मजबूत एवं उन्नत राष्ट्र के निर्माण के लिए यह परम-आवश्यक है कि इसके नागरिकों में एकता और सद्भावना हो जिससे उन्हें अपनी मातृभूमि से आत्मिक प्रेम और लगाव की भावना उत्पन्न हो, जो जापानियों के बीच मैजूद है।
 राष्ट्रवाद का सिद्धान्त किसी भी वर्ग विशेष की तुष्टीकरण के विरूद्ध है, तथा पूरे राष्ट्र में एक कानून और  सामान नागरिक संहिता की वकालत करती है।
  संस्कृति से किसी व्यक्ति, जाति, राष्ट्र, आदि की वे बातें जो उनके मन, रुचि, आचार-विचार, कला-कौशल और सभ्यता का सूचक होती हैं पर विचार होता है। दो शब्दों में कहें तो यह जीवन जीने की शैली है। भारतीय सरकारी राजपत्र (गजट) इतिहास व संस्कृति संस्करण में यह स्पष्ट वर्णन है कि हिन्दुत्व या हिन्दुइज्म एक ही शब्द है, तथा यह भारतवर्ष  के कला-कौशल, रुचि, आचार-विचार और सभ्यता का सूचक है ।
      भारतीय सस्कृति ने सदियों से इस राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांध कर रखा है । भारतीय संस्कृति के एकतारूपी मंत्र से प्रेरित होकर जापान ने राष्ट्रवाद के सिद्धान्त पर अमल करते हुए, मात्र बीस वर्षोंर् में अपने को विकासशील से विकसित देश की श्रेणी मे दुनिया के सामने ला खडा किया है।  अपने सभी नागरिकों को रोटी , कपडा और मकान के अलावा सम्पूर्ण सामाजिक संरक्षण प्रदान किया है जिसमें सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय तीनों का समावेश है, जबकि हम सामाजिक न्याय रूपी प्रलोभन देकर भी  विगत 60 सालों में अपनी जनता को ऐसी एक भी सुविधा की अल्प पूर्ति तक नहीं  कर पाए हैं।जबकि ,भारतीय संस्कृति को स्वार्थ परक नहीं वरन् परमार्थ के गुणों से पूर्ण माना जाता है। भारतीय लोकतंत्रात्मक गणराज्य का मूल मंत्र ’सर्वे भवन्तू सुखिनः सर्वेसन्तू निरामयः‘ का सृजनात्मक अर्थ ही आज राजनैतिक पार्टीयों द्वारा भुला दिया गया है।
प. दीनदयाल उपाध्याय जी के शब्दों में- ”हमारी भावना और सिद्धांत है कि वह मैले कुचैले, अनपढ सीधे-सादे लोग हमारे नारायण हैं। हमें इसकी पूजा करनी है। यह हमारा सामाजिक एवं मानवधर्म है। जिस दिन हम इनको पक्के सुन्दर सम्य घर बनाकर देंगें, जिस दिन हम इनके  हाथ और पांवों की बिवाईयों को भरेंगे और जिस दिन इनको उद्योगों और धन्धों की शिक्षा देकर इनकी आय को  ऊँचा उठा देगें, उसी दिन हमारा भातृत्वभाव व्यक्त होगा ।“
 आज संास्कृतिक और सभ्यता मूलक विचार और देशभक्त समाज के कमजोर पडने के कारण, राष्ट्र  बाह्य एवं आंतरिक आतंकवाद ( जो जातिवाद, क्षेत्रवाद एवं साम्प्रदायिकतावाद से उत्पन्न हुई है) से बुरी तरह झूलस रहा है। राष्ट्र के आर्थिक एवं लोकतंात्रिक विकास की धीमी रफ्तार का निदान एवं  उसका समाधान भी कहीं न कहीं राष्ट्रवादी  विचारधारा एवं ताकतों के कमजोर पडने से जुडा हुआ है। आज हम सभी नागरिकों एवं जनप्रतिनिधियों का यह नैतिक, समाजिक एवं मौलिक कर्त्तव्य है कि हम आपसी भेदभाव को भुलाकर भारतवर्ष में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति जागृत करने का सामूहिक प्रयास करें। इस संास्कृतिक  राष्ट्रवाद की जागृति से राष्ट्र में शंाति एवं व्यवस्था कायम होगी ,जिससे राष्ट्र को एक आर्थिक शक्ति के रूप में विकसित किया जा सकेगा।

 



वी के सिंह (लेखक बीजेपी की राष्ट्रीय उद्योग ईकाई के कार्यकारी सदस्य है।)

 




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