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ये क्या हो रहा है ... ?

08 Sep 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

Shyam Narayan Rangaपहले जयपुर फिर अहमदाबाद और फिर सूरत और अब दिल्ली ये क्या हो रहा है भारत की शांति और अस्मिता को आतंकियों की नजर लग गई है। प्रत्येक भारतवासी के दिल में यह बात आ रही है कि आखिर य क्या हो रहा है इस देश का शासन कानून और प्रशासन कर क्या रहा है। अगर एक घटना होती तो यह माना जा सकता था कि किसी भूलवश ऐसा हो गया होगा लेकिन लगातार इस तरह की आतंकी घटनाओं का होना प्रशासन की नाकामी को दर्शाता ही है साथ ही यह भी जताता है कि इस देश की सुरक्षा व्यवस्था में कितनी खामियाँ है। यह इस बात को साबित करता है कि हम लोग आज भी इन घटनाओं के मौन मूक गवाह बनने के अलाबा कुछ नहीं कर पा रहे हैं
हमारा सुरक्षातंत्र पूरी तरह से नाकाम हो रहा है और इतने बडे देश के इतने बडे सुरक्षातंत्र जिस पर प्रतिवर्ष अरबों का खर्चा हो रहा है ना जाने वे लोग कर क्या रहे हैं आज पूरे देश के दिमाग में यही बात आ रही है कि ये हो क्या रहा है । हिन्दुस्तान का दिल कही जाने वाली राजधानी दिल्ली पर हुआ हमला इस बात का प्रतीक है कि आतंकियों के हौसले कितने बुलंद है और हमारा तंत्र इन हौसलों के सामने कितना बौना नजर आ रहा है। समझ नहीं आ रहा कि आखिर ये हो क्या रहा है। शर्म आनी चाहिए इस देश के नेताओं को और अधिकारियों को कि उनकी नाकामी के कारण इस देश की माँओं की कोख उजड रही है, बहनों से भाई छिन रहे हैं और सुहागिनों की माँगे उजड रही है। लाल बहादुर शास्त्री के इस देश में अगर नैतिकता की बात करे तो इन नेताओं और अधिकारियों को कोई अधिकार नहीं है कि अपने पद पर रहे और ज्यादा शर्म की बात तो तब होगी जब कोई इनसे इस्तीफे की माँग करेगा और फिर भी ये लोग अपने पद पर आसीन रहेंगे। इतना होने के बाद यही बात दिमाग में आ रही है कि आखिर ये हो क्या रहा है। लोग हैरान है, निःस्तब्ध है किससे जबाब मांगे किसके आगे रोये और किनको गुनहगार ठहराए, लेकिन ये पूरी दुनिया जानती है कि इस देश के नागरिक का जज्बा कितना ऊंचा है और भारतीयों ने हर मुसीबत का एकजुट होकर निडरता से सामना किया है।
पहले भी हमारे देश ने आतंकवाद के इस दंश को झेला है। पंजाब और कश्मीर सहित आसाम गुजरात और देश के कई भागों ने इस पीडा को अंतर तक झेला है और उसके बाद सब कुछ सामान्य हो गया था और अभी कुछ समय से पुराने दिनों की यादें फिर से ताजा हो रही है। कट्टरपंथी और कुछ फिरकापरस्त लोगों को भारत की शांति व प्रगति से बहुत पीडा होती है भारत की प्रगति इन लोगों को फुटी ऑंख नहीं सुहाती और ये लोग कभी भी यह सहन नहीं कर सकते कि यह देश विश्व की ताकतों में गिना जाए। आतंक के इस खेल को दुनिया के कईं कट्टरपंथी देशों से शह भी मिलती रही है। परतु ये लोग इस बात से अंजान है कि फटने वाला बम जाति धर्म मजहब या कुछ और देखकर नहीं फटता। यह बम और इसे बनाने वाले तथा इस प्रकार की ताकतों का शह देने वाले लोग इंसानियत के दुश्मन है और न तो किसी धर्म से मतलब है और नहीं इनको किसी मजहब से सरोकार है। अगर ऐसा होता रमजान के पवित्र महीने में इस तरह कि मानवता विरोधी हरकतों को अंजाम नहीं दिया जाता । वर्तमान में जरूरत है कि प्रशासन की ऑंखे खुले और देश के नेताओं की नींद टूटे। उन्हें यह सोचना होगा कि जेड प्लस की सुरक्षा भारत के प्रत्येक नागरिक को मुहैया नहीं है और न हीं देश के प्रत्येक बस स्टैंड व रेल्वे स्टेशन पर मेटल डिटेक्टर लगा हुआ है। सुरक्षा के वे उपाय किए जाए कि देश का हर नागरिक अपने आप को सुरक्षित महसूस करे और प्रत्येक नागरिक निर्भय होकर विचरण कर सके। अगर ऐसा न हुआ तो आने वाला समय व आने वाली पीढी कभी हमें माफ नहीं करेगी और हमशा हमारे से यह सवाल पूछेगी कि आखिर ये हो क्या रहा है।


श्याम नारायण रंगा




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