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धैर्य की परीक्षा

15 Jun 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

दक्षिण के महान् संत तिरूवल्लुवर क्रोध को जीत चुके थे और सभी के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करते थे। उन दिनों जब वे अपनी आजीविका चलाने के लिए कपडे की दुकान करते थे तो उद्द्ण्ड स्वभाव के एक युवक ने उन्हें परेशान करने की सोची और निश्चय किया कि वह उन्हें क्रोधित करके ही छोडेगा। एक दिन वह युवक तिरूवल्लुवर की दूकान पर गया ओर एक धोती अपने हाथ में लेकर पूछने लगा, इसका मूल्य क्या है? तिरूवल्लूवर ने कहा, पांच रूपए। उस युवक ने उसी क्षण धोती को फाडकर उसके दो टुकडे कर दिए और फिर पूछा, बताओं, इसका मुल्य क्या हैं?
तिरूवल्लूवर ने शांत भाव से कहा, इसका दाम ढाई रूपए। उस युवक ने धोती के टुकडे को फाडकर फिर उसके दो टुकडे कर दिए पूछा, और इसके दाम? तिरूवल्लुवर ने उसी शांत मुद्रा में उतर दिया, सवा रूपया। वह युवक धोती के एक के बाद एक टुकडे करता गया और तिरूवल्लुवर से उसके दाम पूछता रहा। अंत मैं उसने धोती के धागे-धागे कर दिए और तिरूवल्लूवर के सामने ऐंठकर पांच रूपए फके। रूपए फेंककर जाने लगा तो उन्होंने रूपए लौटाते हुए कहा, देखो भाई, यदि तुम्ह धोती की आवश्यकता हो तो दूसरी धोती ले जाओ और यदि उसकी आवश्यकता नहीं हो, तो फिर ये रूपए अपने पास रखो। व्यर्थ में रूपए देने से तुम्हारे पिताजी रूष्ट होंगे। वे कहेंगे, घर में सामान नहीं आया तो तुमने रूपए कहां खो दिए! यह सुनकर युवक संत तिरूवल्लूवर के चरणों में गिर पडा।



Comments to this Article
good story.
thanking you, jwala lahre (2009-11-29 10:18:24)

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