राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष २००६-०७ के अपने बजट में प्रदेश के विभिन्न नगरों के परकोटें एवं नगर द्वार संरक्षण के लिए अलग से योजना प्रारंभ करने, इस प्रयोजनार्थ २ करोड की राशि का प्रावधान किया हैं। पूरा सम्पदा के महत्त्व को देखते हुए पुरातात्विक भवनों एवं पुरा वस्तुओं के संरक्षण एवं विकास हेतु भी पृथक से ’विरासत संरक्षण एवं प्रोत्साहन बोर्ड‘ के गठन की बात बजट में कही गयी हैं। बजट के प्रावधानों को इस रूप में महत्वपूर्ण कहा जा सकता हैं कि धरोहर समृद्ध राजस्थान के बहुत से पुरातात्विक स्थल, इमारतें, किले, महल, आदि आज संरक्षण के अभाव में अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहें हैं। ’विरासत संरक्षण एवं प्रोत्साहन बोर्ड‘ के भविष्य के बारे में तो अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी, परन्तु इससे लगातार अपने अस्तित्व से जूझते आ रहे सांस्कृतिक धरोहर से समृद्ध प्रदेश के किलों, महलों, पुरा महत्त्व के स्थानों को काफी हद तक संरक्षण मिलेगा। वैसे भी तेजी से होते शहरीकरण से प्रदेश की पुरा सम्पदा के साथ ही प्राचीन स्मारकए किलें निरंतर बदहाली के शिकार हो रहे हैं।
स्वर्णनगरी जैसलमेर का सोनार किला हो या फिर बीकानेर का जूनागढ या फिर चित्तौड का दुर्ग- इन सबकी नीवें खोखली होती निरंतर ढहनें की ओर अग्रसर हैं। कारण है- इनमें रहने वाले लोगों या आस-पास के लोगों द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले पानी की निकासी की व्यवस्था सही नहीं होना। परिणामतः न केवल प्रदेश के किलें और महल निरंतर ढहने की ओर अग्रसर है बल्कि प्राचीन स्मारकों के आस-पास होने वाले अतिक्रमणों, उनकी सार संभाल नहीं होने से वे निरंतर हादसों के शिकार भी हो रहे हैं। नागौर व लक्ष्मणगढ किले के साथ ही बहुत से ऐसे राज्य के और भी किलें है जिनकें मुख्य द्वारों के आस-पास इतने अतिक्रमण हो गए है कि वे बाहर से दिखायी नहीं देते। इसी प्रकार प्राचीन स्मारक व पुरा महत्त्व के बहुत से स्थलों के आस-पास अतिक्रमण व कचरा डालनें की प्रवृति का ही परिणाम है कि ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्त्व के ऐसे स्थलों की गरिमा का निरंतर हास होता जा रहा हैं।
इस संदर्भ में बीकानेर का उदाहरण ही काफी होगा। बीकानेर में सागर रोड पर बनी प्राचीन शासकों की याद में संगमरमर के पत्थर की बनायी छतरियाँ अपने स्थापत्यकला सौन्दर्य से पर्यटकों को आरंभ से ही आकर्षित करती आयी है परन्तु इधर के कुछ वर्षो में इनके आस-पास अतिक्रमणों की इतनी भरमार हो गयी है कि अब ये सडक से नजर ही नह आती। इस प्रकार जालौर में परमारकालिन संस्कृत पाठशाला अपने स्थापत्य सौन्दर्य के कारण पूरे देश में अपनी विशिष्ट आभा लियें हैं। पाठशाला के आस-पास के अतिक्रमणों व इसकी समुचित सार-संभाल नहीं होने से अब यह पाठशालो विलुप्ति के कगार पर हैं। हमारी ऐताहासिक व सांस्कृतिक विरासत के ऐसे बहुत से स्मारक, किले व महल सार संभाल व संरक्षण के अभाव में निरंतर अपनी दुर्दशा से आंसू बहा रहें हैं।
आवश्यकता इस बात की भी है कि प्राचीन स्मारकों, महलों व किलों के संरक्षण के लिए सरकार के साथ-साथ निजी भागीदारी को सभी स्तरों पर सुनिश्चित किया जाए। यह सब संभव तब होगा जब किलें, महलों व स्मारकों के संरक्षण के प्रति वास्तविक रूप में जन जागरूकता का वातावरण बनाया जाए। अतिक्रमण करने वाले लोगों के खिलाफ कठोर कार्यवाही अमल में लाए जाने के साथ ही निजी व सरकारी आधिपत्य के प्रदेश के सभी किलें, महलों व स्मारकों का चिन्हिकरण करने का अभियान चलाकर इस दिशा में प्रभावी कदम उठाए जाए तो न केवल राज्य में पर्यटन को बढावा मिलेगा बल्कि हमारी संस्कृति की विरासत को काफी हद तक बचाया भी जा सकेगा। आज भी देश में ऐसे हजारों स्मारक, इमारतें है जिन पर निजी अथवा अल्य किसी स्तर पर नियंत्रण होने से वे पर्यटकों के लिए महरूम हैं। इन सभी के संरक्षण के साथ ही इन पर्यटकों के आने से होती हैं। उसका अंश मात्र हिस्सा खर्च करके ही इनके संरक्षण को सुनिश्चित किया जा सकता हैं।
कुछ समय पूर्व प्रदेश के लगभग सभी राजे-रजवाडों ने अपने पारिवारिक विवादों को भुलाकर अपने सभी किलों और महलों को इस आधार पर राज्य सरकार से मांगा था कि राज्य सरकारें उनका रख-रखाव करने में नाकाम रही हैं। रख-रखाव में राज्य सरकारों की नाकामी की बात कुछ हद तक सही भी हो सकती है परन्तु इस परिप्रेक्ष्य में यह बहन भी कम अतिशयोक्जिपूर्ण नहीं होगा कि ऐतिहासिक इमारतों को भी राजे-रजवाडो द्वारा जायदाद की तरह देखा जाता हैं। कोई इसे छोडना नहीं चाहताए भले ही उनका संरक्षण सही तरीके से हो भी नही। ऐसी स्थिति में बहुत से किलें, प्राचीन स्मारक राजे-रजवाडों की जायदाद रहते न केवल पर्यटकों से महरूम है बल्कि वे अब निरंतर अपने अस्तित्व को ही समाप्त करने की ओर अग्रसर हैं।
इस संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में आवश्यकता आज इसी बात की है कि ऐतिहासिक इमारतों, धरोहरों को सभी स्तरों पर संरक्षित किया जाए। इस दिशा में जोधपुर के महाराजा गजसिंह द्वारा नागौर किले का जीर्णोद्धार किया जाना भी अपने आप में मिसाल हैं। लगभग जर्जर हो चुके नागौर के किले का मेहरानगढ ट्रस्ट द्वारा जीर्णोद्धार करने का प्रयास इस रूप में कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि अब पुनः यह अपने पूर्व वर्ती स्वरूप में पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा हैं। इसे यूनेस्कों अवार्ड से भी नवाजा जा चुका हैं।
कुल मिलाकर सांस्कृतिक सरोकार रखते हुए सरकार और निजी दोनों ही क्षेत्र अगर ऐतिहासिक इमारतों के साथ ही पुरा महत्त्व के स्थलों की बदहाली को दूर करने का संकल्प लें तो इसके दूरगामी परिणाम राज्य के पर्यटन विकास के रूप में स्वतः ही सामने होंगे। कला, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के शासन सचिव अशोक शेखर का कहना है कि संस्कृति के संरक्षण के लिए पूरे प्रदेश में प्रभावी कार्ययोजना के तहत कार्य किए जाएंगें। अगर ऐसा होता है तो निश्चित ही न केवल संग्रहालय व स्मारकों की साफ सफाई समुचित रूप में हो पायेगी, बल्कि इस बहानें संस्कृति के संरक्षण का वातावरण भी तैयार हो सकेगा। संस्कृति के संरक्षण की सोच का विस्तार वर्तमान में इस रूप में भी जरूरी है कि इसी से पर्यटन विकास को नए आयाम दिए जा सकते हैं।
डॉ. राजेश व्यास
विशेषाधिकारी, शिक्षा मंत्री राज. सरकार