Saturday, 23 November 2019
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बीकानेर शहर के अभिवादन के तरीके


Shyam N Rangaअभिवादन करना एक सहज बात है। जब एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से मिलता है या कोई दोस्त, कोई रिश्तेदार किसी दूसरे व्यक्ति या रिश्तेदार से मिलता है तो वह अभिवादन से ही अपने बात की शुरूआत करता है। अभिवादन से यह भी पता चलता है कि अभिवादन करने वाले का सामने वाले व्यक्ति से क्या संबंध है। अभिवादन व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान भी कराता है। राजस्थान के शहर बीकानेर में भी भाँति भाँति के अभिवादन प्रचलित है जो बीकानेरवासियों की जीवनशैली और चरित्र की पहचान करवाता है। आईए हम जानते हैं कि अलमस्त, मनमौजी, ऐतिहासिक और परम्पराओं के शहर बीकानेर में किस किस प्रकार के अभिवादन प्रचलित हैं ः 

बीकानेर में विभिन्न जातियों के लोग रहते हैं जैसे पुष्करणा ब्राह्मण, अन्य ब्राह्मण (शाकद्वीपीय, पारीक, सारस्वत आदि) माहेश्वरी बनिए, ओसवाल, अग्रवाल, राजपूत, मुसलमान आदि आदि। इन सभी जातियों में कुछ मिले जुले और कुल अलग अलग तरह के अभिवादन प्रचलित है। 

Jai Shree Krishna - Namasteपुष्करणा ब्राह्मणों सहित शहर के अंदरूनी हिस्सों में रहने वाले कईं जातियों के कुछ मिले जुले अभिवादन है। यहाँ जब एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से मिलता है तो ’राम राम सा‘ जरूर कहता है और इसी प्रकार ’जय श्री कृष्णा‘ का अभिवादन भी काफी प्रचलित है। ’जय श्री कृष्णा‘ का अभिवादन जब कोई सगा संबंधी अपने संगा संबंधी से मिलता है तो जरूर करता है। जैसे ’जय श्री कृष्णा सगोजी‘ तो वापस अभिवादन मिलता है ’जय श्री कृष्णा‘ इस प्रकार सुनने वाले को यह बात साफ हो जाती है कि यह बात करने वाले आपस में संबंधी हैं। इसी प्रकार ’राम राम सा‘ का अभिवादन हम उम्र के व्यक्तियों के बीच भी काफी प्रचलित है। 

जब कोई छोटा अपने बडो से मिलता है तो ’पगेलागणा‘ या ’पगेलागुसा‘ का अभिवादन करते हुए पाँवों के हाथ जरूर लगाता है। यह अपने आप में इस बात का परिचायक है कि बात करने वालों के बीच में उम्र की अंतरता का संबंध है और पता चल जाता है कि कौन छोटा है और कौन बडा। वैसे कभी कभी सगे संबंधी भी इस अभिवादन का उपयोग अपनी बातचीत शुरू करने में करते रहे हैं। 

बीकानेर के माहेश्वरी बनियों व अग्रवालों में ’जय श्री कृष्णा‘ का अभिवादन ज्यादा प्रचलित है। यह अभिवादन नियमित मिलने वालों व दोस्तों व सगे संबंधियों सब के बीच इन जाति के लागों द्वारा किया जाता है। 

बीकानेर के ओसवाल समाज के लोगों में भी अभिवादन की एक अलग परम्परा है जैसे ’जय गुरूदेव‘, ’जय गुरूनाना‘ ’जय नानेश‘ आदि आदि। ये लोग ’राम राम सा‘ अभिवादन का भी प्रयोग करते है।

बीकानेर के माहेश्वरी बनियों, ओसवालों की भाषा काफी मिठास लिए हुए हैं अतः इनकी आम बोलचाल की भाषा में भी ’सा‘ शब्द का प्रयोग होता है जैसेः भूडोसा, मामोसा, भूआसा आदि आदि। तो इनके अभिवादनों में भी यह शब्द उच्चारित होता नजर आता है। जैसे ’राम राम सा‘ । 

इसी प्रकार वैष्णव मंदिरों में जाने वाले लोग भी अपने अपने अभिवादन रखते हैं। भगवान कृष्ण के मंदिरों में जाने वाले ’जय श्री कृष्णा‘ अभिवादन का प्रयोग करते हैं और कईं वैष्णव मंदिरों में जाने वाले लोग ’राधे राधे‘ कहकर भी अपनी बातचीत शुरू करते है।

Jai Bhairav Nath - Namasteइसी प्रकार बीकानेर में घर घर मौहल्लों मौहल्लों में भगवान भैरवनाथ की पूजा की जाती है। भैरव की पूजा करने वाले ’जय भैरवनाथ की‘ का अभिवादन भी करते हैं। यह अभिवादन यह बताता है कि बातचीत करने वाले भगवान भैरव के उपासक ह। इसी प्रकार बीकानेर की बगीचियों में जाने वाले लोगों का भी अपना एक अलग अभिवादन है ’अलख‘। इस अभिवादन में ल शब्द का उच्चारण लम्बा होता है। यह नाथ पंत के साधू संतों की बगीचियों में आने जाने वालों का अभिवादन है। और सामने वाला भी वापस ’अलख‘ कहकर अभिवादन का जबाब देता है। इन नाथ सम्प्रदाय की बगीचियो में ’जय नाथ जी री‘ का भी अभिवादन काफी चलन में है। जब एक ही बगीची के लोग आपस में मिलते हैं तो अपने अपने अभिवादन का प्रयोग करते हैं।

इसी प्रकार विभिन्न मंदिरों में जाने वाले लोग अपने मंदिर के हिसाब से अभिवादन करते हैं जैसे ’जय गणेश‘, ’हर हर महादेव‘, जय शंकर आदि आदि। 

इसी प्रकार बीकानेर शहर में रहने वाले राजपूत समाज के लोगों में ’जय माताजी की‘ का अभिवादन करके ही बात शुरू करने की परम्परा रही है। इस समाज म करणी माता का प्रभाव रहा है और इसी प्रभाव का परिणाम है कि यह अभिवादन काम में लिया जात है। 

इसी प्रकार एक सार्वजनिक अभिवादन है ’नमस्कार‘। यह अभिवादन बीकानेर शहर के बाहर से आए लोगों में काफी प्रचलित है और वर्तमान की युवा पीढी ने इस अभिवादन को सहजता स अपनाया है। 

बीकानेर के सुथार, स्वामी सहित कुम्हारों आदि जातियों में ’पगेलागणा‘ अभिवादन ’पगधोकू‘ के रूप में प्रयोग में लिया जाता है। 

वर्तमान समय के बदलते परिवेश में अभिवादनों में भी परिवर्तन आ रहा है। ’हेलो‘ ’हाय‘ ’गुड मार्निंग‘ ’गुड आफटरनून‘ ’गुड इवनिंग‘ व ’गुड नाइट‘ के अभिवादन भी अब शहर में धीरे धीरे जगह बना रहे ह। ये अभिवादन युवा पीढी में ज्यादा प्रचलित हैं और मोबाइल व फोन पर बात शुरू करने से पहले इन अभिवादनों का प्रयोग हो रहा है। 

बीकानेर शहर में रहने वाले मुसलमानों में सामान्यतः एक ही प्रकार का अभिवादन देखने को मिलता है। ’सलाम वालेकुम‘ और ’वालेकुम सलाम‘। मुसलमानों में ’शब्बा खैर‘ का अभिवादन भी यदा कदा सुनने को मिलता है। इसी के साथ साथ मुसलमानों में ’आदाब अर्ज है‘ का अभिवादन भी काफी प्रचलित है। 

इस प्रकार हमने देखा कि अभिवादन की कईं प्रकार की शैलियाँ जो अपने ईष्ट देव, अपने मंदिरों, अपने रहन सहन पर आधारित है बीकानेर शहर में प्रयोग में ली जाती है। इस प्रकार ये अभिवादन बीकानेरवासियों के रहन सहन, नम्रता, बातचीत के तरीकों के साथ साथ इनकी भाषा को भी बताता है। इन अभिवादनों में काफी मिठास देखने को मिलती है और यह अभिवादन बीकानेर की पहचान भी बन चुके हैं। जब कभी भी बीकानेर का आदमी बीकानेर से बाहर किसी शहर में किसी बीकानेरी से मिलता है तो अभिवादन से ही पता चल जाता है कि एक बीकानेरी ही दूसरे बीकानेरी से बात कर रहा है ओर सुनने वाले को भी पता चल जाता है कि ये लोग बीकानेर के ह। परम्पराओं के शहर बीकानेर में अभिवादनों की यह परम्परा स्थापना काल से ही चली आ रही है जिसे इस शहर के लोग आज भी निभा रहे है। 


(अभिवादनों पर लिखने की यह प्रेरणा मुझे गुरूवर श्री श्रीलाल मोहता से मिली जो इस प्रकार का ही एक लेख काफी पहले लिख चुके हैं और वह समाचार पत्रों में प्रकाशित भी हो चुका है)
 


श्याम नारायण रंगा
पुष्करणा स्टेडियम के पास, बीकानेर