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20 July 2008
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5
Oct
खेलों मे बढती डोपिंग प्रवृति  
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जब से मानव सभ्य्रता अस्तित्व में आई है जब से खेलों का भी प्रादुर्भाव हुआ है और मानव सभ्यता के विकास भी निरन्तर जारी रहा है। खेल मनोरंजन का साधन है पुराने जमाने में मल्ल, युद्घ व तलवार भालों आदि के खेलों द्वारा राजा महाराजा अपना मनोरंजन के यम साधन उस समय के खिलाडियों के आजिविका का जरिया भी थे। खेल हमारे स्वास्थ्य को भी सही व सन्तुलित रखते हैं।  किसी भी खेल को नियमित रुप से खेलने वाले खिलाडी का शरीर वज्र के समान कठोर होता है इस प्रकार अगर यह कहा जाए कि वर्तमान में खेल हमारें जीवन का आधार हैं तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। वर्तमान युग में भी खेलों का महत्व दिन प्रतिदिन बढता जा रहा हैं। वर्तमान में कई खेल प्रचलन में हैं। जैसे : फुटबाल,  क्रीकेट, सोफ्टबाल, टेनिस, शतरंज, बेसबाल, इत्यादि। खेलों के बढते महत्व के कारण ही प्रत्येक देश के किसी न किसी खेल को अपने राष्ट्रीय खेल के रुप अपनाया है। जैसे: भारत ने होकी को अपने राष्ट्रीय खेल के में घोषित किया है। इतना सब कुछ होने के बावजूद अगर चारों ओर नजर दौडाई जाए तो खेलों के स्तर पर चिंता का प्रश्नचिह्न अवश्य खडा होता है। वर्तमान में खेलों के बिगडते स्वरुप में अनुशासनहीनता व नशावृत्ति इतनी बढ रही है कि खेलों पर प्रश्नचिह्न लग रहा है। इस बिगडते स्वरुप के लिये नशावृति या डापिंग प्रवृत्ति घोर जिम्मेवार है। खेलों में बढती नशावृति अत्यन्त चिन्ता का विषय है। आज खेलों में प्रतिदिन डोपिंग कि प्रवृति बढती ही जा रही है।  इस डोपिंग प्रवृति ने लाखों खेल प्रेमियों व देशवासियों के ह्रदय में आघात लगाया है क्योंकि किसी भी खिलाडी को यह नही भूलना चाहिए कि खेलों के साथ लाखों लोगों की जन भावनाएं जुडी हुई रहती है और वे नशा लेकर खेलकर न सिर्फ अपना चरित्र खराब करते हैं बल्कि लाखों लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड करते है। नशा लेकर खेलने की प्रवृत्ति अन्तरर्--------- स्तर पर् अपने पाँव पसार चुकी हैं। बेन् जाँनसन पिछले ओलंपिक खेलों में नशे की दवाईयां लेकर दौडा और विश्व का सबसे तेज धावक बन गया परन्तु बाद मे घ्यान मे आने पर उसका स्वर्ण पदक छीन लिया गया।इसी प्रकार ही फुटबाल ए प्रसिद्ध खिलाडी मारर्डोना ने तो हद कर दी, बार-बार चेतावनी के बावजूद नशा लेकर खेलना उसकी मजबूरी बन गया। पहले पहल तो वह इंकार करता रहा अंतत: वह मान गया कि वह नशा लेकर खेलता है। विश्व के सर्वाधिक लोकपृय खेल के साथ ऐसा मजाक एक खिलाडी के मन में घोर शकांए पैदा करता है। इस तरह के खिलाडी,खिलाडी न हो कर नशेडी बन जाते है। खिलाडियों की इस डोपिंग प्रवृति ने उस खिलाडी की प्रतिष्ठा तो गिराई ही है व साथ में  उस राष्ट्र का सिर भी नीचा किया है जिसका वह खिलाडी है। एक राष्ट्र के लोग बडे अरमानो से अपने देश के खिलाडी पर आँखे लगाते है और् अंतत: उनका खिलाडी नशेडी निकले तो उस राष्ट्र की प्रतिष्ठा गिर जाती व अरमान टूट जाते है। आज स्थानीय स्तर से अन्तर् राष्ट्रीय स्तर तक ऐसे खिलाडी है जो दवाईयां नशा ही है। शारीरिक दमखम के खेलों मे डापिंग प्रवृति अक्सर देखने मे आती है। खिलाडी मैदान मे उतरने से पहले व चलते मैच में नशा लेते है व इसी दम पर अपना दमखम दिखाते है इस तरह नशे के बल पर ही वह खेलता है।बहुत से ऐसे नामी खिलाडी है जिन्होंने संन्यास लेकर अपना खेल जीवन समाप्त कर लिया है, वे आज इस बात को स्वीकार करते है खेलो में डापिंग प्रवृति उनके समय भी थी। इस तरह यह सिद्ध होता है कि डापिंग प्रवृति आज की नही पुरानी है। यह तो हुई मानव द्वारा ली जाने वाली नशे की बात आज हमारे देश में बैलगाडी दौड्,घुड्दौड्,मुर्गी लडाना व सांड् लडाने जैसे खेलो को भी बडे शौक से आजमाया जाता है। इन खेलो मे भी नशावृति घुस चुकी है। इनमे भी पशुओ को दौडाया व लडाया जाता है ताकि वे जीत सकें। उनको को भी अफिम,गाँजा,बीयर,व्हीस्की आदि पिलाई जाती है व फिर खेलाया जाता है, इस तरह पशुओ के साथ भी यह मजाक किया जाता है।
इस तरह हमने जाना कि खेलो में डापिंग प्रवृति दिन प्रतिदिन बढती जा रही है। अब एक नजर इसके नोकसान पर :-
1 इससे खिलाडियों के अन्दर का खिलाडी मर जाता है व उसकी हैसियत एक नशेडी से ज्यादा कुछ नहीं रहती।
2 इस प्रवृति से पूरे राष्ट्र का अपमान होता है।
3 इससे लाखो लोगो की भावनाओ के साथ खिलवाड होता है।
4 इससे खेलो में नैतिक पतन होता जा रहा है।
अन्त में इतना ही अगर वास्तव में खेलो का स्तर बढाना है,स्वर्ण पदको से अपना गला चमकाना है तो डापिंग प्रवृति का अन्त करना होगा।

Article By: Shyma Narayan Ranga, Bikaner

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, ramesh (07/12/2007 12:54:35)
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