‘‘प्रणाम बाबाजी !‘‘
‘‘सुखी रहो, दुर्गावती! भगवान तुझे शूरवीर वर दे !!‘‘ ये वाक्य प्रायः रोज ही दुहराए जाते जब दुर्गावती साधु बाबा से, जो शिवमंदिर के पास एक विशालकाय बड के वृक्ष के नीचे बैठे रहते, मिलती। दुर्गावती प्रतिदिन संध्या समय अपनी दो प्रिय सहेलियों के साथ शिवमंदिर जाती और दर्शन करने के बाद लौटते समय अक्सर बड वृक्ष के नीचे बैठकर विश्राम करती और बाबाजी से शूरवीर राजाओं की कहानियां सुनती।
रहस्यमय साधु
साधु बाबा काफी वृद्ध थे बहादुर राजपूतों और अन्य शूरवीर राजाओं की इतनी कहानियां जानते थे कि दुर्गावती और उसकी सहेलियां उनसे रोज नई कहानी सुनतीं। फिर भी बाबाजी का कहानी-कोष खाली न होता। कभी बाबाजी न मिलते तो वे घंटों बैठकर उनकी राह देखतीं।
महोबा-नरेश की राजकुमारी
दुर्गावती राजपूताने में महोबा राज्य के राजा शालिवाहन की पुत्री थी। शालिवाहन चंदेल राजपूतों के वंशज थे, जो अपनी बहादुरी एवं शूरवीरता के लिए प्रसिद्ध थे। दुर्गावती की मां बचपन में ही मर गई थी। अतः राजा शालिवाहन ने उसे बडे लाड-प्यार से पाला तथा एक राजपूत की तरह उसकी सारी शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था की। राजा उसे बहुत चाहते थे तथा पुत्र की तरह उसे अपने साथ-साथ रखते थे।
दुर्गावती को बचपन से ही घोडे की सवारी, शिकार तथा शास्त्र चलाने की शिक्षा दी गई। जब वह बडी हुई तो उसने कई बहादुरी के कार्य करने आरम्भ कर दिए। विशेषकर भयानक जानवरों के शिकार में उसने अभूतपूर्व योग्यता का परिचय दिया। दुर्गावती का कद लम्बा तथा शरीर गठा हुआ था। नाक-नक्शे से भी वह खूबसूरत थी। वास्तव में एक बहादुर राजपूत सैनिक के सभी गुण उसमें मौजूद थे। धीरे-धीरे उसके गुणों की प्रशस्ति आसपास के राज्यों में फैलने लगी और बहुत-से राजपूत उससे विवाह करने की इच्छा करने लगे।
दुर्गावती हमेशा की तरह शिव मंदिर जाती और बाबाजी को प्रणाम करना न भूलती। एक दिन मंदिर जाते समय दुर्गावती कुछ विचारों में डूबी हुई गम्भीर-सी प्रतीत हो रही थी। तभी साधु बाबा को देख वह बोल उठी, ’’प्रणाम, बाबाजी ! ‘‘
साधु बाबा का आशीर्वाद
’’आयुष्मान हो ! मेरी बच्ची, ईश्वर तेरी इच्छा पूरी करे और तुझे बहादुर पति मिले।‘‘ साधु ने हाथ उठाकर आर्शीवाद देते हुए कहा।
सुनकर दुर्गावती की सहेली पदा ने चुटकी ली और शरारत भरी मुस्कराहट के साथ दुर्गा के कान में बोली, ’’मनपंसद आर्शीवाद के लिए बधाई हो !‘‘
’’लगता है बाबाजी को हमारी राजकुमारी के मन की बात मालूम हो गई‘‘। दूसरी सहेली श्यामा ने कनखियों से कहा।
दुर्गावती चुपचाप मंदिर मे घुस गई उसने शिवलिंग के आगे माथा टेक, बडी एकाग्रता से प्रार्थना की और बाहर आ गई। लौटते समय वे तीनों फिर बड के वृक्ष के पास रूकी, जहां साधु बाबा बैठे हुए थे क्षणभर के लिए पूर्ण शांति रही। कारण, सभी चुप थे। फिर एकाएक मौन को भंग करते हुए श्यामा बोली, बाबाजी गढ मंडला के बहादुर राजा दलपतशाह के बारे में कुछ और बताइए न !‘‘
’’’उनके शौर्य और पराक्रम की गाथाओं से हमारी राजकुमारी बडी प्रभावित हुई है‘‘ पद्दिानी ने कहा।
दुर्गावती जमीन की ओर देखती हुई चुपचाप खडी थी। पदा की बात सुन उसका चेहरा लज्जा से गुलाबी हो गया। किन्तु अपने मन के भाव को छिपाते हुए वह बोली ’’बाबाजी शूरवीरों की गाथाओं से कौन प्रभावित न होगा ! राजपूत हमेशा अपनी बहादुरी पर गर्व करते हैं।‘‘
’’किन्तु दलपतशाह राजपूत नहीं, गोड जाति के है।‘‘ बाबा ने कहा।
मनुष्यों कर्मो से जाना जाता है
’’मनुष्य जन्म से नहीं बल्कि अपने कर्मो से जाना जाता है व जाति के गोंड हो सकते है किन्तु कर्मो से सच्चे राजपूत हैं।‘‘ दुर्गावती ने प्रत्युतर देते हुए कहा।
’’बेटी, तुम ठीक कहती हो, किन्तु लोग इस तरह से नहीं सोचते। मैंने ऐसे सकुंचित दिमाग के लोगो को देखा है जो जाति के नाम पर खूनखराबा करने से भी नहीं चुकते।‘‘ बाबाजी ने कहा।
’’वह नासमझ लोगों का काम हैं, हम उस दृष्टि से नहीं सोचते।‘‘ दुर्गावती ने फिर जवाब दिया।
साधु फिर राजा दलपतशाह के सम्बन्ध में बताने लगा कि किस प्रकार बहादुरी के साथ उन्होंने मुगलों का सामना किया तथा स्वतन्त्रता और मानवता की रक्षा की। दक्षिण भारत को उतर के मुगलों आक्रमणों से बचाने के लिए दलपतशाह ने बीच में संतरी का काम किया। कारण गडमंडला ही एक ऐसा रास्ता था जिससे होकर मुगल दक्षिण में प्रवेश कर सकते थे।
दलपतशाह की शूरवीरता का बयान करते हुए साधु बोला कि न केवल मुगल उनसे भयभीत रहते है, वरन् कुछ राजपूत राजा भी उनका लोहा मानते है; और सबसे बडी बात तो यह है कि राजा दलपतशाह अपनी सज्जनता और उच्च चरित्र के लिए प्रसिद्ध है राजपूतों की तरह से ब्राहाण, स्त्री और गया का सम्मान करते है तथा उनकी रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। यही कारण है कि हर कोई उन्हें चाहता है तथा पूरे राज्य में वे अत्यन्त लोकप्रिय है उनका नाम और यश दूर दूर तक फैला है, विशेषकर मध्य हिन्दुस्तान में हर किसी की जबान पर उनकी चर्चा हैं।
विवाह-प्रस्ताव
दुर्गावती ने युवावस्था में कदम रखा ही था कि जगह-जगह उसके विवाह के प्रस्ताव आने शुरू हो गए; किन्तु शालिवाहन इस ओर विशेष ध्यान न दें, यह कहकर लोगों को वापस कर देंगे कि वे सोचेंगे और फिर जवाब देंगे। शालिवाहन दुर्गावती का विवाह इसलिए नहीं टाल रहे थे कि अभी उसकी उम्र कम थी; वरन् इस लिए कि वे अपनी एकमात्र प्रिय पुत्री के बिछोह की कल्पना-मात्र से ही घबराते थे। उस मातृहीन संतान को उन्होंने अपने पुत्र की तरह पाला-पोसा था और वे उसे बहुत ज्यादा चाहते थे। विवाह की बाद वे कुछ समय के लिए टाल देना चाहते थे। ऐसे समय उन्हें अपने स्वर्गीय रानी के अंतिम शब्द भी बरबस याद आ जाय करते।
रानी मृत्यु-शय्या पर पडी थी और उनके निस्तेज नेत्रों से अविरल अश्रु की धारा बह रही थी। राजा शालिवाहन देखकर विचलित हो उठे और बोले, ’’रानी, धैर्य रखो तुम्हारे आंसू मेरे हदय को चीर रहे है। क्या तुम्हारे मन में कोई बात है जो तुम कहना चाहती हो? साफ साफ कहो, मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा।‘‘
’’स्वामी ! मेरी एक ही इच्छा है कि आप दुर्गा का लालन पालन पुत्र की तरह करना तथा जब तक उसकी इच्छान हो, उसका विवाह न करना
रानी के शब्द सुन राजा शालिवाहन बहुत दुखी हुए, किन्तु फिर भी उन्होंने वचन दिया कि वे उनकी इच्छा के अनुसार ही कार्य करेंगे, और कुछ ही क्षणों के बाद रानी देह त्याग स्वर्गगामी हुईं।
दुर्गा का पुत्र की तरह पालन-पोषण
रानी को दिए अपने वचन के अनुसार शालिवाहन ने दुर्गा का पालन-पोषण लडके की तरह किया और उसे उन सारी बातों की शिक्षा दी जो एक राजपूत के लिए आवश्यक होती हैं। किन्तु जब वह बडी हुई तो उनके सामने विवाह की समस्या आ खडी हुई। यही कारण था कि विवाह के प्रत्येक प्रस्ताव पर वे गम्भीर और मौन हो जाते।
महाशिवरात्रि का दिन था और शिवमदिर के पास छोटा-सा मेला भरा था। शाम तक लोगों की भीड रही। अतः दुर्गावता शिवालय में दर्शन करने न जा सकी। जब अंधेरा हो गया और लोग घरों को वापस होने लगे, दुर्गा अपनी दोनों सहेलियों को ले शिवमंदिर गई। जब वे बड वृक्ष के पास से निकली तो उन्होंने दो आदमियों को अंधेरे में छिपकर खडे हुए देखा। वे आपस में कुछ फुस-फुसा रही थे और जैसे ही दुर्गावती पास आई, उनमें से एक सामने आ खडा हुआ और जमीन पर हाथ टेककर प्रणाम करते हुए बोला, ’’यदि में गलती नहीं कर रहा हूं तो मैं सोचता हूं आप ही महान प्रतापी महोबा-नरेश की शौर्यवान बहादुर राजकुमारी दुर्गावती हैं।‘‘
इससे पहले कि दुर्गावती कुछ सोचे और बोले, पद सामने कूद पडी और कडे स्वर में बोली, ‘‘हां, राजकुमारी हैं ! तो फिर तुम्हें क्या कहना है? तुम कौन हो? और कहां से आए हो? सब कुछ पदा एक ही सांस में बोल गई।
वह आदमी कुछ घबरा-सा गया, किन्तु हिम्मत करके उसने फिर कहा, ’’हम उनके लिए गढमंडला के राजा दलपतशाह का एक पत्र लाए हैं।‘‘
’’और वह कहां है?‘‘ श्यामा ने आगे बढकर मांगते हुए कहा।
दलपतशाह का दुर्गावती को पत्र
दूत ने पत्र श्यामा को दे दिया और एक ओर चुपचाप खडा हो गया। पदा का क्रोध अब तक शांत हो चुका था। वह बोली, ‘‘आप यहां ठहरिए। हम लोग मंदिर होकर आते।‘‘
और तीनों शीघ्रता से मंदिर की ओर बढीं। दर्शन करने के बाद पदा ने पत्र खोला और दीये के प्रकाश में पढाने लगीः
परम आदरणीय राजकुमारी दुर्गावती, सबसे पहले मैं क्षमायाची हूं- आपको सीधे पत्र लिखने की धृष्टता के लिए। यह सचमुच हमारी सभ्यता, शिष्टाचार और रिवाज के विरूद्ध है, और आशा है आप इसके लिए मुझे अवश्य क्षमा करेंगी। यद्यपि मैंने आपको प्रत्यक्ष कभी नहीं देखा, किन्तु आपकी शूरवीरता और शालीनता के समाचार मैं लगातार सुनता आ रहा हूं और आपका मौन भक्त हो गया हूं। मेरी सदा से इच्छा रही है कि मैं आप जैसी किसी वीरांगना को ही अपनी रानी बनाऊं। क्या मैं आशा करूं कि मेरी इच्छा पूरी होगी? इस संबंध का सन्देश मैं आफ पूज्य पिताजी के पास भेजना चाहता था, किन्तु सोचा-इससे पहले आपकी इच्छा जान लूं। क्या आप अपनी सहमति भेजने की कृपा करेंगी।? कष्ट के लिए क्षमा।
-दलपतशाह
’’आज के इस महापर्व पर शुभ सन्देश बधाई राजकुमारी बधाई !‘‘ श्यामा ने खुशी से भरकर कहा।
’’संयोग की बात है राजकुमारी का मनपसंद संदेश अपने आप आ पहुंचा दिखता शिवजी प्रसन्न है उन्होने हमारी राजकुमारी की प्रार्थनाए सुन ली और इसीलिए आज यह शुभ सन्देश लीं और इसीलिए आज यह श्ुाभ सन्देश बधाइ !‘‘र् है पघा ने खुशी में हिस्सा लेते हुए कहा।
दुर्गावती उठ खडी हुई उसकी आँखे चमक उठी और गालों पर लज्जा की लालिमा बिखर गई उसने सहेलिसों से वापस चलने का आग्रह किया किन्तु
वे अड गई और शिवजी को सवा पांच सेर का प्रसाद चढाने का वचन लेकर ही दुर्गावती को छोडा।
तीनो मंदिर से बाहर आई और वापस चल पडी रास्ते में बड का वृक्ष के नीचे दोनों आदमी बडी उत्सुकता से उनके वापस आने की राह देख रहे थे
जैसे ही वे पास आई दुर्गावती ने श्यामा के कान में कुछ कहा श्यामा ने तब आगे बढकर दूत से कहा हमारी राजकुमारी आफ बहादुर राजा गढ मडलानरेश को प्रणाम भेजती नहीं है इतना कहकर वे तीनों बढ गई और वे दोनों आदमी भी अंधेरे में गायब हो गए।
शालिवाहन को दलपतशह का पत्र
मुश्किल से एक सप्ताह बीता होगा कि गढ मण्डला से दलपत शाह का सन्देश लेकर एक दूत महोबा नरेश शालिवाहन के पास आया उसमें राजकुमारी दुर्गावती से विवाह का प्रस्ताव था शालिवाहन क्षण भर के लिए स्तम्भीत रह गये उनके समझ में नहीं आया कि क्या किया जाए एक राजपूत लडकी गौड राजा को दि जाए यह कैसे हो सकता है किन्तु साथ ही गौड राजा के प्रस्ताव को ठुकराकर उसे दुश्मनी मोल लेना भी मामूली बात नहीं थी
हर राजपूत यह अच्छी तरह जानता था कि दलपत शाह के भय के कारण ही मुगल आगे बढने का साहस नहीं कर रहे हैं। साथ ही शालिवाहन जानते थे कि प्रस्ताव की मंजूरी भेजना मानों दलपत शाह को युद्ध के लिए पुकारना है किसी निर्णय पर पहूँच सकने में अपने को असमर्थ पा अन्त में उन्होंने दरबार बुलाया और अपनी समस्या सब के समाने रख दी सभी राजपूत एक स्वर से बोल उठे असम्भव राजकुमारी दलपतशाह को कैसे दी जा सकती हैं। एक राजपूत की गौड की शादी नहीं हो सकती मंत्री के कहने पर ही बात यहीं खत्म नहीं होती न ही गौड राजा दलपत शाह चुप होकर बैठेगा सारे राजपूत एक साथ चिल्ला उठे हम जान दे देंगे लेकिन रक्त का अपमान न होने देंगे।
युद्ध की घटा घिरी
दूत को सन्देश देकर वापस भेज दिया गया और सारे मोहेबे में युद्ध की तैयारीयां प्रारम्भ हो गयी। सारे राज्य में खलवली मच गई। अपनी प्रिय पुत्री राजकुमारी दुर्गावती का ख्याल कर राजा शालिवाहन बहुत दुखी हुए। एक बार फिर स्वर्गीय रानी के वे शब्द उनके मस्तिष्क में गूंजने लगे-’’दुर्गा का लालन-पालन पुत्र की तरह करना तथा जब तक उसकी इच्छा न हो, उसका विवाह न करना। वे एक बार फिर गहरी वेदना से पीडीत हो उठे फिर दुर्गावती को अपने पास बुलाकर कहा बेटी, तुम्हारे विवाह का प्रस्ताव गडमंडला के राजा दलपतशाह की तरफ से आया था।‘‘
’’आपने क्या जवाब दिया?‘‘ दुर्गावती ने पूछा।
’’मैंने प्रस्ताव नामंजूर कर दिया।‘‘
’’क्यों?‘‘
’’क्योंकि वे जाति के गोंड है और राजपूत लडकी उन्हें नहीं दी जा सकती। इस सम्बन्ध में मैंने दरबार के लोगों से भी राय ली और उन्होंने एक स्वर से प्रस्ताव का विरोध किया।‘‘
दुर्गावती कुछ देर जमीन पर आंखे गडाए चुपचाप खडी रही और कमरे में पूर्ण स्तब्धता रही। अन्त में शालिवाहन ने पूछा, ’’दुर्गा क्या सोच रही हो?‘‘
’’मैं यही सोच रही थी कि मनुष्य जन्म से नहीं वरन्र अपने कर्मो से जाना जाता है दलपतशाह यधपि गोड हैं लेकिन वे बडे शूरवीर हैं अब उनके शौर्य की परीक्षा है यदि वे अपनी बात पर अडकर महोबा पर आक्रमण करते हैं तो वे वास्तव में सच्चे राजपूत सिद्ध होंगे।‘‘
शालिवाहन यह सुनकर अबाक रह गए, फिर भी वे शान्त रहे। कुछ देर वे बिलकुल मौन रहे और उनके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला। फिर वे अपने कमरे में विश्राम करने चले गए।
विधि का विधान मेटा नहीं जा सकता। दलपतशाह ने विशाल सेना लेकर महोबे पर धावा बोल दिया और कठोर संघर्ष तथा खून-खराबे के बाद अन्त में वे अपनी इच्छित वस्तु-राजकुमारी को प्राप्त करनें में सफल हुए।
शालिवाहन गम्भीर रूप से घायल
संघर्ष में शालिवाहन बुरी तरह से घायल हुए और अन्त में उसी बडवृक्ष के नीचे गिर पडे जहां साधु बाबा निराश से भरकर भगवान की प्रार्थना कर रहे थे। अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं पड रहा था। पास में किसी आदमी की कराहने की आवाज सुनकर बाबा जलती हुई लकडी हाथ में लेकर उसके पास पहुंचे। ध्ंाुधले प्रकाश में यौर से देखने पर बाबा को यह देख बडा आश्चर्य हुआ कि वे स्वंय राजा
Discuss this article on KhabarExpress Forum
Comments to this Article this Story very interseted and knowdelgefully our history, kiranpal (05/01/2009 18:43:01) |