Monday, 23 September 2019
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पेंशन की टेंशन में हैं समायोजित अनुदानित शिक्षाकर्मी


राज्य में अनुदानित शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत शिक्षाकर्मियों के निरन्तर शोषण तथा विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए तत्कालीन सरकार ने इन संस्थाओं में कार्यरत व्याख्याताओं, अध्यापकों तथा मन्त्रालयिक कर्मचारियों का राजस्थान स्वैच्छाया ग्रामीण शिक्षा सेवा नियम 2010 बनाकर उसके अन्तर्गत राज्य सरकार की सेवा में समायोजन किया गया। यह लम्बी अवधि से शोषण के शिकार निजी शिक्षण संस्थाओं के कार्मिकांे को शोषण से मुक्त करने के लिए उठाया गया एक बड़ा कदम था। लेकिन समायोजन के लिए बनाों गये नियमों में रही विसंगतियों के कारण समायोजित शिक्षाकर्मियों को पूरी तरह से शोषण से मुक्ति नही मिल पायी हैं।

इन नियमों में सबसे बड़ी विसंगति पेंशन के मामले में रही। इन नियमों के तहत समायोजित शिक्षाकर्मियों को राज्य सरकार की जुलाई 2004 के बाद नियुक्त कर्मचारियों की तरह अंशदायी पेंशन योजना के अन्तर्गत पेंशन देने का प्रावधान किया गया । समायोजित शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति इन नियमों के अनतर्गत नही हुई। यदि इन नियमों के अन्तर्गत नियुक्ति दी जाती तो उन्हे दो वर्ष के प्रोबेशन पर रखा जाता तथा इस अवधि के दौरान इन्हे स्थिर वेतन प्रदान किया जाता लेकिन उन्हे न तो प्रोबेशन पर रखा गया और ना ही स्थिर वेतन दिया गया। उन्हे उनकी वरिष्ठता के आधार पर जितना वेतन मिल रहा था उसी पर समायोजन किया गया। उनके लिए प्रोबेशन की अवधि भी नही थी। इस दृष्टि से एक तरह से उनकी नियुक्ति की तिथि वही मान ली गयी जिस तिथि को वे सम्बन्धित अनुदानित संस्था में नियुक्ति किये गयें । जब समायोजन की तिथि वही थी तो 2004 के सेवानियमों के अन्तर्गत पेंशन का प्रावधान किया जाना अनुचित था ।

वैसे भी अनुदानित शिक्षाकर्मी लम्बी अवधि से विभिन्न रूपों में शोषण के शिकार रहे हैं उन्हे न तो नियमित रूप से वेतन मिला ना ही समय समय पर घोषित महंगाई भत्तें मिलें चिकित्सा लाभ सुविधा से भी वे वंचित रहें । पूर्ण योग्यता तथा बाकायदा सरकार के प्रतिनिधि की उपस्थिति में चयनित तथा सरकार द्वारा अनुमोदित होने तथा सरकार द्वारा औसतन 80 से 90 प्रतिशत अनुदान मिलने के बावजूद भी निजी संस्थाओं के शोषण के शिकार रहें । अधिकांश शिक्षण संस्थाओं ने छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार सरकार के आदेशांे के बावजूद भी स्थिरीकरण नही किया था । समायोजित होने के बाद या तो स्वयं सरकार ने उनका स्थिरीकरण कराया या संस्थाओं पर दबाव डालकर वेतन स्थिरीकरण करवाया ं इससे उनको सरकारी सेवा में आने के बाद तो छठे वेतन आयोग के अनुसार लाभ मिल गया लेकिन सरकारी सेवा में आने पूर्व की अवधि की बकाया राशि के लिए सम्बन्धित संस्थाओं की दया पर छोड़ दिया। सरकार ने भी बकाया राशि के अनुदान का भुगतान इन संस्थाओं को नही किया, परिणामस्वरूप अनुदानित कार्मिको को बकाया राशि का भुगतान नही हुआ।

सरकारी सेवा में जो शिक्षाकर्मी समायोजित किये गये उनकी सेवानिवृति में औसतनः 4 से 8 साल ही बचे थे। उनमें से बहुत से सेवानिवृत हो चुके हंै तथा बड़ी संख्या के कार्मिक आगामी कुछ वर्षो में हो जायेंगे। ऐसे मे सेवानिवृति के बाद फिर असुरक्षिृत हो गये है या होने वाले है क्योंकि सेवाकाल में बराबर वेतन आदि नही मिलने से बचत हई नही। निर्धारित मियमों के अन्तर्गत प्रोविडेंट फंड की जो राशि जमा हुई वह बहुत अधिक नही थी। कई संस्थाओं ने इस राशि का भी भुगतान किया ही नही। कुछ ने किया तो जमा राशि का आधा अर्थात कर्मचारी के भाग का भुगतान किया जो बहुत कम ही था।

समायोजित शिक्षाकर्मियों को 2004 की अंशदायी पेंशन योजना के अन्तर्गत जमा राशि के अन्तर्गत मिलने वाली पेंशन की राशि नाम मात्र की है कयोंकि यह कोई बीमा कंपनियों तथा बैंकांे द्वारा चलायी गयी पेंशन योजना को देकर उनके माध्यम से पेंशन देने का प्रावधान के अनुसार है। इन कम्पनियों द्वारा प्रत्येक 1 लाख रु. जमा राशि के आधार पर औसतन  500 से 600 रु. प्रतिमाह पेंशन दी जाती है समायोजित कार्मिकों की जमा राशि पर उतनी सेवा अवधि के आधार पर जो पेंशन की रेंज बनती है वह 600 रु. से लेकर अधिकतम 10,000 रु. तक ही हो सकती है। इतनी अल्प राशि की नाममात्र की पेंशन से व्यक्ति वृद्धावस्था में अपना कैसे जीवन व्यापन कर सकता है।

वास्तव में जब अनुदानित कार्मिको को सेवा अवधि के आधार पर पूरे वेतन पर समायोजित किया गया तो उनकी पेंशन भी 2004 से पूर्व नियुक्ति अन्य सरकारी कर्मचारियों के अनुरूप भी होनी चाहिए थी। इस हेतु शिक्षाकर्मियों के संगठनों ने प्रयास भी किये । तत्कालीन सरकार तथा वर्तमान सरकार दोनांे ने ही पुरानी पेंशन लागू करने के संबंध में आश्वासन भी दिये लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई प्रगति नही हुई। इस बीच शिक्षाकर्मियों के संगठनों ने मामला न्यायालयों में भी उठाया लेकिन वहां भी यह अभी लम्बित ही है।

वास्तव में मानवीय दृष्टि से तथा समाजिक सुरक्षा की दृष्टि से सरकार को सभी समायोजित शिक्षाकर्मियों  को सेवा समायोजन के बाद उसी प्रकार की पेंशन दी जानी चाहिए जो सरकार अपने कार्मिको को देती है। सरकार से अपेक्षा है कि इस संबंध में सहानूभूति पूर्वक विचार करे ताकि न्यायालय की लम्बी प्रक्रिया के बिना सभी समायोजित अनुदानित शिक्षाकर्मियों को पेंशन का लाभ मिल सके तथा उनकी वृद्धावस्था में उन्हंे आर्थिक कठिनाईयों का सामना नही करना पड़े।

                                                                                                     - डाॅ. अजय जोशी