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पर्यावरण का नॉलेज नेटवर्कः शोषण से निजात

24 Jan 2010      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

Manoj Mishra - Environment Writerअभी हाल ही में जयराम रमेश तथा आर. के. पचौरी का विवाद अखबारों की सुर्खिया रहा है। आई.पी.सी.सी. की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2035 तक हिमालयी ग्लेशियर पिघल जायगे परन्तु दूसरी अन्य रिपोर्ट के अनुसार आई.पी.सी.सी. की रिपोर्ट असत्य एवं तथ्यों से परे है। बाद में आई.पी.सी.सी. ने अपनी रिपोर्ट के बारे में कहा कि यह वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है तथा इसके लिये उसने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से क्षमा याचना भी की। उधर राज्य सभा में अरूण जेटली ने कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण एजेन्सियॉ ऑकडों में छेड छाड कर रहीं हैं। यह सब विकसित/औद्योगिक राष्ट्रो को लाभ पहचाने की दृष्टि से किया जाता है। विकसित या औद्योगिक राष्ट्र आर्थिक तौर पर सम्पन्न तथा उच्चस्तरीय टेक्नोलॉजी से लैस है, परन्तु विकासशील एवं गरीब देशों के पास इन दोनों चीजो का अभाव है। विकसित देश इन दोने अभावों का लाभ उठाकर अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया का उपयोग विकासशील देशों पर दबाब बनाने को कर रहे हैं। ये सम्पन्न राष्ट्र अपने विस्तृत पर्यावरणीय ’डाटा नेटवर्क‘ के सहारे तरह-तरह की आँकडेबाजी कर अन्य अपेक्षाकृत कमजोर देशों का पर्यावरण के कारण भविष्य में होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी इन्ही देशों पर डालना चाहते हैं, जबकि विकसित राष्ट्र अपने द्वारा किये पर्यावरण के नुकसान की जिम्मेदारी लेने या भरपाई करने से बचते फिर रहे हैं। इस समय यही विकसित देश अपने शोधों एवं निष्कर्षों के सहारे यह साबित करने की कोशिश में जुटे है कि ज्यादा आबादी के कारण भारत और चीन को इस पर्यावरणीय नुकसान का भय दिखाकर तथा जिम्मेदार ठहराकर घेरा जाये। विकसित राष्ट्र अपने ’डाटा नेटवर्क‘, शोध एवं शोध निष्कर्षों के सहारे इन दो बढती एशियाई ताकतों को घेरने का काम करते हैं। यहॉ पर इन दो देशों द्वारा पर्यावरण का नुकसान ही एकमात्र विषय नहीं है अपितु इनकी बढती आर्थिक शक्ति पर इस बहाने लगाम लगाने की मंशा भी है। इन सम्पन्न देशों द्वारा भारत एवं चीन के पर्यावरणीय शोध, डाटा तथा उनके निष्कर्षो को निम्न स्तरीय तथा उपयोग की जाने वाली टेक्नोलॉजी को समय के सापेक्ष अव्यवहारिक बताया जाता है। भारत तथा चीन तथ्यों तथा टेक्नोलॉजी के अभाव में इन देशों के दुष्प्रचार का प्रतिकार नहीं कर पाते हैं।
विकसित देश इस तरह का कुप्रचार कई वर्षों से करते आ रहे हैं इसी प्रकार की रणनीति के चलते पहले भी संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की ’ब्राउन क्लाइड‘ या ’भूरा बादल‘ सम्बन्धी एक रिपोर्ट में भारत और चीन को जिम्मेदार ठहराया गया था। सन् 2002 में जारी इसी रिपोर्ट में कहा गया था कि दक्षिण एशिया का आकाश प्रदूषण के कारण एक भूरे रंग की धुन्ध से आच्छादित हो गया हैं तथा लगभग तीन किमी. मोटी इस प्रदूषण की चादर के कारण धरती पर पडने वाले सूर्य के प्रकाश में 10-15 तक की कमी आ गई, मानसून, कृषि तथा मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड रहा है। उस समय बंगलौर स्थित ’इन्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ साइन्स‘ के दो पर्यावरण वैज्ञानिकों जे. श्री निवासन एवं सुलोचना गाडगिल ने तर्को और तथ्यों के आधार पर अपने शोध पत्र में इस रिपोर्ट को बेबुनियाद बताया था। यह शोध पक्ष प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका ’कान्ट साइन्स‘ में छपा था। हास्यास्पद तथ्य यह है कि इस तथाकथित धुन्ध से ज्यादा मोटी धुन्ध की चादर उसी समय उत्तरी अमेरिका तथा यूरोप के कई हिस्सों में छाई हुई थी। इसी तरह की एक अन्य रिपोर्ट मे कहा गया है कि यदि भारत और चीन की औद्योगिक विकास की यही रफ्तार रही तो सन् 2030 तक विनाशकारी गैसों की प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति औसत उत्सर्जन की दर वैश्विक औसत उत्सर्जन दर से ज्यादा हो जायेगी। अतः ये दोनो देश पर्यावरण का नुकसान करने देशों की श्रेणी में नेतृत्व करेगें। इस रिपोर्ट के सन्दर्भ में भारत की पॉच संस्थाओ ने अलग-अलग शोध निष्कर्ष निकालकर भारत का पक्ष प्रस्तुत किया। ये पॉचों संस्थाये टी.ई.आर.आई.(TERI), आई.आर.ए.डी.सी, जाधवपुर विवि, एन.सी.ए.ई.आर. तथा मैकेन्जी हैं। जिनके निष्कर्षो के आधार पर यह साबित किया जा सकता है कि भारत के द्वारा ग्रीन हाउस गैसों का प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति औसत उत्सर्जन 4 से 5 टन के आस पास होने का अनुमान है जबकि विकसित देशों के निष्कर्षों को यदि हम आधार माने तो यह दर लगभग दो गुनी (8 टन) के आस पास होगी। ग्रीन हाउस गैसों के ज्यादा उत्सर्जन के मायने ज्यादा जिम्मेदारी का निवर्हन तथा भविष्य में वैश्विक प्रतिबन्धों की पृष्ठ भूमि का तैयार होना है।
एक अन्य शोध में बताया गया कि भारत ने सन् 1990  में धान की खेती के कारण प्रतिवर्ष लगभग 38 मिलियन टन पर्यावरण को नुकसान पहचाने वाली मीथेन गैस का उत्सर्जन किया। भारतीय कृषि वैज्ञानिक ए.पी. मित्रा ने इसका प्रतिकार करते हुए अपने शोध निष्कर्ष में बताया कि भारत में धान की खेती के कारण मीथेन का उत्सर्जन 38 मिलियन टन प्रतिवर्ष न होकर मात्र 4 मिलियन टन प्रति वर्ष है। इसी तरह ग्लेशियर के पिघलने का विवाद भी चर्चा में है। विवाद की जड में यह तथ्य है कि इन ग्लेशियरों के पिघलने के लिए ’ब्लैक कार्बन‘ जिम्मेदार है या ’ग्रीन हाउस गैसें‘। परन्तु इतना तय है कि इस विषय पर अभी तक किसी भी राष्ट्र के पास शोध निष्कर्ष या ’डाटा‘ उपलब्ध नहीं, फिर भी भारतीय ग्लेशियर विज्ञानी प्रो. सैयद इकबाल हसनैन के शोध निष्कर्ष को नकार दिया गया। जबकि आई.पी.सी.सी. के अनुसार ग्लेशियर के पिघलने के अध्ययन के सन्दर्भ में शोध कार्य अभी आरम्भिक चरण में ही है।
इन उपर्युक्त उदाहरणों से एक बात साफ तौर पर समझ में आती है कि भारत सहित तमाम विकासशील देशों को विनाशकारी गैसों का ज्यादा उत्सर्जक देश सिद्ध करना है। भविष्य में जो देश ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करते पाये जायेंगे उन्हे तरह-तरह की मुश्किलों का सामना करना पडेगा। भविष्य की इन मुश्किलों में आर्थिक प्रतिबन्ध, मंहगीदर पर उच्चस्तरीय टेक्नोलाजी की खरीद, वैज्ञानिक ऑकडों की अनुपलब्धता की कीमत तथा विभिन्न विकसित देशों द्वारा आयात पर टैक्स का लगाना तथा भारत को प्रताडत करना भी शामिल है। विकसित देश भविष्य में पर्यावरण का उपयोग अपने-अपने आर्थिक हित साधने में करेंगे। उदाहरण के तौर पर अमेरिकी सीनेट में लम्बित बैकसमान मार्के बिल के तहत उन देशों के आयात पर टैक्स लगाया जायेगा जो अपने यहॉ कार्बन उत्सर्जन को कम नहीं कर रहे है, जबकि कार्बन उत्सर्जन की यह दर विकसित देश अपने यहॉ उपलब्ध संसाधन और डाटा के आधार पर तय करेंगे। फ्रान्स के राष्ट्रपति सरकोजी तथा जर्मन चान्सलर मार्केल भी इसी तरह के आयात टैक्स का सुझाव दे चुके है। अतः यह स्पष्ट है कि विकसित देश अपने शोधों, संसाधनो, निष्कर्षों, टेक्नोलॉजी तथा विस्तृत डाटा बेस का इस्तेमाल अपनी सुविधानुसार किसी भी देश को ज्यादा कार्बन उत्सर्जक देश बताकर कुछ देशों को बदनाम करने में तथा अपने आर्थिक हितों को साधनें में करेंगे।
भारत को भविष्य में आने वाली इस समस्या का सामना करने की तैयारी अभी से ही करनी होगी। देश को पर्यावरण के अध्ययन के लिए उच्चस्तरीय शोध संस्थान, संसाधनों का विकास, नई टेक्नोलॉजी का उपयोग, डाटा नेटवर्क का विकास तथा मीडिया तन्त्र विकसित करना पडेगा। पर्यावरण को समर्पित अध्ययन के लिए सेटेलाइट विकसित करनी होगी जिसे विश्वसनीय एवं विश्वस्तरीय डाटा नेटवर्क तैयार किया जा सके। अभी तक ज्यादातर शोध एवं डाटा, विकसित देशों द्वारा तैयार किये गये हैं। भारत को एक ऐसा पर्यावरणीय तन्त्र विकसित करना पडेगा जिसमें पर्यावरण को नुकसान करने वाले कारकों को नापना, देखभाल करना तथा उनका उपचार करना शामिल है। देश को पर्यावरण के सन्दर्भ में व्यापक, विश्वसनीय तथा उच्चस्तरीय वैज्ञानिकता से लैस ’नॉलेज नेटवर्क‘ विकसित करना पडेगा।

डॉ. मनोज मिश्र
एशोसिएट प्रफेसर, भौतिक विज्ञान विभाग, डी.ए-वी. कालेज, कानपुर।




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