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फकीर की खांसी

20 May 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

एक फकीर यात्रा करते हुए कही जा रहा था। घने जंगल से गुजरते हुए उसे कई दिनों तक कोई बस्ती नहीं मिली। बस्ती के बिना जंगली फल-फूल खाकर फकीर ने कई दिन बिताए। एक दिन फकीर ने सोचा। क हीं कुछ खाने को मिल जाए तो बेहतर होगा। फकीर को भरोसा था ईश्वर सबका ध्यान रखता है। इसलिए उसने ईश्वर को कहा-हे प्रभु तुम्हीं पालनहार हो। कई दिनों से रोटी नहीं मिली तुम्हीं कहीं से इसका जुगाड करो। आखिर चोच दी है तो चना भी खाने को दो। ये कहते हुए वह एक पेड पर चढ बैठा। दोपहर का वक्त था। एक नवाब अपने लोगों के साथ वन भ्रमण करते हुए उधर से गुजरां उसके साथ वजीर और दो सिपाही थे। वे सब उसी वृक्ष के नीचे आकर बैंठे। घनी छाया में आराम फरमाते हुए नवाब ने कहा-चलो आज खाना यहीं बनाया जाए। दानों सिपाहियों ने नवाब और वजीर समेत चार-पँाच लोगों का खाना बना लिया। नवाब के सामने गरमागरम- नरमानरम चकाचक छप्पन भोग परोसे गए। नवाब ने हाथ जोडकर ईश्वर से कामना की-हे प्रभु! रोज मैं महल में किसी फकीर को भोजन देकर भोजन करता हूं। आज इस घनघोर जंगल में किसी दरवेश के दर्शन करा दे तो मैं भोजन करू नवाब की प्रार्थना सुनते ही पेड पर बैठे फकीर ने खंकारा किया। नवाब ने उपर देखा और बोला- धन्यवाद परवरदीगार आखिर तूनें मेरी दुआ कबूल कर ली घर बैठे गंगा भेज दी। नवाब ने फकीर को प्रेमपूर्वक नीचे आकर भोजन करने को कहा। फकीर ने भोजन करने को कहा। फकीर ने भोजन कर नवाब के सामने ईश्वर को धन्यवाद दिया-हे प्रभु अरन महरल है। कीडी को कण और हाथी को मण आप ही देतें है। देने वाला तो खुदा ही है, बंदे को तो बस खांसना पडता है। ये कहते हुए फकीर ने अपना इकतारा बजाया और आगे के सुर के लिए चल पडा।




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