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करबला में लिखी गई थी इस्लामी आतंकवाद की पहली इबारत

18 Dec 2007      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

मोहर्रम का महीना तो दरअसल इस्लामिक कैलेन्डर के अनुसार वर्ष का पहला महीना होता है। परन्तु इसी मोहर्रम माह में करबला (इराक) में लगभग 1400 वर्ष पूर्व अत्याचार व आतंक का जो खूनी खेल एक मुस्लिम बादशाह द्वारा खेला गया, उसकी वजह से आज पूरा इस्लामी जगत मोहर्रम माह का स्वागत नववर्ष की खुशियों के रूप में करने के बजाए शोक व दुःख के वातावरण में करता आ रहा है। शहीद-ए-करबला हजरत इमाम हुसैन को अपनी अश्रुपूरित श्रद्घांजलि देने के साथ-साथ पूरी दुनिया में इस्लामी जगत के लोग उस सीरियाई शासक यजीद को भी लानत भेजते हैं, जिसने हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन व उनके 72 परिजनों को आज से लगभग 1400 वर्ष पूर्व मैदान-ए-करबला में फुरात नदी के किनारे तपती धूप में क्रूरतापूर्वक भूखा व प्यासा शहीद कर इस्लामी आतंकवाद की पहली इबारत लिखी थी।
बडे दुःख का विषय है कि इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मोहम्मद द्वारा इस्लाम के रूप में परिचित कराए गए इस पंथ पर उन्हीं के अपने दौर में ही ग्रहण लगना शुरु हो गया था। हजरत मोहम्मद इस्लाम धर्म का पालन करने वाले मुसलमानों से ऐसी उम्मीद करते थे कि वे केवल एक अल्लाह के समक्ष नतमस्तक हों, चरित्रवान हों, पवित्र हों, एक-दूसरे के प्रति प्रेम, सद्भाव व सहयोग की भावना रखने वाले हों, दानी हों, छल-कपट, झूठ, मक्कारी, व्याभिचार, दुराचार से दूर हों। किसी दूसरे के माल व दौलत पर नजर न रखते हों, जुआ, शराब, हरामखोरी, हरामकारी जैसे दुव्र्यसनों से हरगिज वास्ता न रखते हों। ऐसी व ऐसी और तमाम विशेषताओं को धारण करने वाले व्यक्ति को हजरत मोहम्मद साहब एक सच्चे मुसलमान की श्रेणी में गिना करते थे। यही निर्देश उन्होंने अपने परिजनों को भी दिए थे। अतः उनके निर्देशों का पालन करना तथा हजरत द्वारा बताए गए इस्लामिक सिद्घान्तों पर हूबहू अमल करना उनके परिजन अपना कर्त्तव्य समझते थे।
दूसरी ओर इस्लाम की उत्पत्ति के केंद्र मदीना से कुछ दूर सीरिया देश जिसे उस समय ‘शाम’ के नाम से जाना जाता था में मुआविया नामक शासक का दौर था। मुआविया का पुत्र यजीद जिसमें कि सभी अवगुण मौजूद थे, वह अपने पिता मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में शाम राज्य की गद्दी पर काबिज हो गया। इस्लामी इतिहास का वह पहला काला दिन था जिस दिन यजीद जैसे भ्रष्ट, चरित्रहीन व अत्याचारी शासक ने स्वयं को किसी इस्लामिक देश का बादशाह घोषित करने का दुस्साहस किया था। उधर हजरत मोहम्मद द्वारा चलाए गए पवित्र पंथ इस्लाम की रक्षा के लिए तथा इसे यजीद जैसे किसी अपशकुनी बादशाह से दूर रखने के लिए हजरत मोहम्मद का वह पहला घराना था जिसने यजीद जैसे दुष्ट क्रूर सीरियाई सुल्तान को किसी इस्लामी देश का इस्लामी शासक मानने से साफ इन्कार कर दिया था। यही कारण था जिसके चलते दसवीं मोहर्रम को करबला के मैदान में बेगुनाहों के खून की होलियां खेली गईं।
क्रूरता का एक ऐसा इतिहास करबला के मैदान में यजीद के सेनापतियों व उसके सैनिकों द्वारा रचा गया जिसकी दूसरी मिसाल आज तक देखने व सुनने को नहीं मिली। एक ओर तो यजीद अपनी गुलाम महिलाओं, मां जैसी उम्र वाली गुलाम महिलाओं, अपनी ही बहनों व बेटियों तक से व्याभिचार करने में गर्व महसूस करता था। उसे शराब के नशे में खुदा से रुबरु होने अथवा नमाज पढने का ढोंग करने में आनन्द की अनुभूति होती थी। हजरत इमाम हुसैन तथा हजरत मोहम्मद का पूरा घराना यजीद के दुष्चरित्र से पूरी तरह परिचित था। केवल हजरत मोहम्मद का परिवार ही नहीं बल्कि पूरे इस्लामी जगत में उस समय यजीद की चरित्रहीनता की चर्चा होने लगी थी। यजीद जैसे आततायी व्यक्ति को इस्लामी देश के शासक के रूप में देखकर मुस्लिम जगत इसे इस्लाम धर्म पर एक बडे अपशकुन के रूप में देख रहा था। ऐसे क्रूर, दुष्ट एवं व्याभिचारी शासक को इस्लामी देश के शासक के रूप में अपनी स्वीकृति प्रदान कर देना हजरत मोहम्मद के नवासे व हजरत अली व फातिमा के बेटे हजरत हुसैन के लिए आखिर कहां सम्भव था।
हजरत इमाम हुसैन ने यजीद को शाम के इस्लाम शासक के रूप में स्वीकृति प्रदान करने से इन्कार कर दिया। और हजरत हुसैन का यही इन्कार करबला की दर्दनाक घटना का तो कारण बना ही साथ-साथ करबला की यही घटना इस्लाम की रक्षा के लिए हजरत मोहम्मद के घराने की ओर से दी गई महान कुर्बानी का भी एक सबब बनी। इतिहास साक्षी है कि दस मोहर्रम को करबला में यजीद की सेनाओं द्वारा हजरत हुसैन के 6 माह के बच्चे अली असगर, 18 वर्ष के जवान बेटे अली अकबर से लेकर 80 वर्ष के बुजुर्ग तक को तीरों व तलवारों से शहीद कर दिया गया। इतिहासकार बताते हैं कि करबला की घटना मई माह में घटित हुई थी। इराक में मई माह में पडने वाली गर्मी के विषय में आसानी से सोचा जा सकता है। आज भी वहां गर्मियों में दिन के समय सामान्य तापमान 50 डिग्री से अधिक ही होता है। सुना यह जाता है कि करबला के हादसे के समय प्राकृतिक रूप से कुछ ज्यादा ही गर्मी पड रही थी तथा फुरात नदी के किनारे की रेगिस्तानी जमीन आग की तरह तप रही थी। ऐसे भयंकर गर्मी के वातावरण में यजीदी फौजों द्वारा हजरत हुसैन व उनके सभी 72 साथियों के तम्बुओं को फुरात नदी के किनारे से बलपूर्वक हटा दिया गया। इतना ही नहीं बल्कि तीन दिन तक इन्हें नदी से पानी लेने की इजाजत तक नहीं दी गई। हजरत इमाम हुसैन की ओर से कुर्बानी देने आए इन 72 लोगों में दूध पीने वाले बच्चे से लेकर बुजुर्ग महिलाएं यहां तक कि हजरत हुसैन के एक पुत्र जैनुल आबदीन भी शामिल थे जोकि उन दिनों बहुत बीमारी की अवस्था से गुजर रहे थे।
यजीद रूपी उस आतंकवादी शासक ने किसी पर भी कोई दया नहीं की। यदि हजरत मोहम्मद के परिवार के इन सदस्यों के कत्ल तक ही बात रह जाती तो भी कुछ गनीमत था। परन्तु यजीद ने तो करबला में वह कर दिखाया जिससे आज का यजीदी आतंकवाद भी कांप उठे। हजरत इमाम हुसैन व उनके पुरुष साथियों व परिजनों को क्रूरता के साथ कत्ल करने के बाद यजीद ने हजरत इमाम हुसैन के परिवार की महिला सदस्यों को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया। उनके बाजुओं पर रस्सियां बांधकर उन्ह बेपर्दा घुमाया गया। उसी जुलूस में आगे-आगे हजरत इमाम हुसैन उनके बेटों, भाई अब्बास व अन्य शहीदों के कटे हुए सरों को भाले में बुलंद कर आम लोगों के बीच प्रदर्शित किया गया। हजरत हुसैन की 4 वर्ष की बेटी सकीना को सीरिया के कैदखाने में कैद कर दिया गया जहां उसकी मृत्यु हो गई। आश्चर्य की बात तो यह है कि एक ओर तो इस घटना से दुःखी होकर इस्लामी जगत यजीद के नाम पर थूक रहा था तथा उसके मुस्लिम शासक होने पर सवाल खडे कर रहा था तो वहीं दूसरी ओर यजीद अपने को महान विजेता समझता हुआ हुसैन के लुटे हुए काफिले को देखने वालों को यह भ्रमित करने की कोशिश कर रहा था कि यह हश्र उन लोगों का किया गया है जिन्होंने यजीद के शासन के विरुद्घ विद्रोह करने का साहस किया था। एक ओर तो सीरिया के बाजारों में हजरत हुसैन व उनके परिजनों की शहादत को लेकर कोहराम मचा था तो दूसरी ओर यजीद अपने दरबार में ठीक उसी समय शराब व ऐश परस्ती से भरपूर जश्न मना रहा था।
बहरहाल इस दर्दनाक घटना को 1400 वर्ष से अधिक बीत चुके हैं। हजरत इमाम हुसैन व उनके परिजनों द्वारा दी गई बेशकीमती कुर्बानी के फलस्वरूप इस्लाम आज दुनिया का दूसरा सबसे बडा पंथ माना जा रहा है। परन्तु यह भी एक कडवा सच है कि यजीदियत आज भी अपना फन उठाए हुए है। यजीदियत आतंकवाद के रूप में आज भी पूरे विश्व की शांति भंग करने का प्रयास कर रही है। कहना गलत नहीं होगा कि आज फिर यजीदियत को समाप्त करने के लिए हुसैनियत के परचम को बुलंद करने की जरूरत महसूस की जा रही है। अर्थात् आतंकवाद के आगे न झुकने के संकल्प की जरूरत, इसका मुंहतोड जवाब देने की जरूरत, इसे हरगिज आश्रय व प्रोत्साहन न देने की जरूरत तथा कदम-कदम पर इसका विरोध करने की जरूरत। और यदि जरूरत पडे तो इसके लिए बडी से बडी कुर्बानी देने के लिए भी तत्पर रहने की जरूरत। हुसैनियत का जज्बा ही इस्लाम पर लगते जा रहे ग्रहण से उसे बचा सकता है अन्यथा आतंकवाद के रूप में यजीदियत ठीक उसी प्रकार इस्लाम धर्म को निगल जाने के लिए बेताब है जैसे कि करबला में 1400 वर्ष पूर्व इस्लाम को आहत करने का एक प्रयास यजीदी विचाराधारा द्वारा किया गया था।
कत्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यजीद है। इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद।

 तनवीर जाफरी - tanveerjafri1@gmail.com


Comments to this Article
atankwad ko khatm karna hai., haider ali (2010-12-08 10:22:11)
I agreed with writer, MUNAZIR (2010-12-13 07:46:49)
INSHA ALLAH ATANKWAD JALD HI DUNIYA SE KHATAM HO JAYE


AAMIN.........., IMRAN SHAIKH (2011-02-01 12:54:57)
i agreed with writer INSHAALLAH atankwad jald hi duniya se khatam hoga.AAMIN........., mohammad ali (2011-02-24 09:58:41)
insha allah aatankwaad khatm hoga , ahmed khan (2011-03-16 08:40:01)
Hazrat Mohmmad S.A. Ki Aulad Ka Ek Janbaz Sipahi Aaega Atankwad Ka Sapaya Karke Batayega Ke Asl Atankwadi Koun Tha Or Koun hai.Hussein Zindabad.
Hindustan Zindabad. , MeraJ Ali (2011-07-13 11:51:07)
‘इस्लामी आतंकवाद‘ एक ग़लत शब्द है
इस्लामी आतंकवाद यह एक शब्द है जिसे पश्चिम के सूदख़ारों ने इस्लाम को बदनाम करने के लिए दिया और दुनिया भर के सूदख़ोरों ने इसे दुहराया। यह लेख पढ़कर पता चला कि दीन की सही समझ न रखने वाले ऐसे लोग भी इसकी चपेट में आ गए हैं जिनके नाम मुसलमानों जैसे हैं। हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके परिजनों को करबला में ज़ालिमाना तरीक़े से क़त्ल कर डाला गया। इन ज़ालिमों में हुकूमत के लालची यज़ीद के सैनिक भी थे और वे दग़ाबाज़ भी थे जिन्होंने ख़त लिखकर आली मक़ाम इमाम हुसैन रज़ि. को बुलाया था। नबी स. और औलादे नबी से मुहब्बत ईमान का लाज़िमी तक़ाज़ा और उसकी एक लाज़िमी अलामत है। ये ज़ालिम इस मुहब्बत से बिल्कुल ख़ाली थे। इनके अमल को आज तक दुनिया के किसी भी आलिम ने ‘इस्लामी अमल‘ नहीं कहा। दग़ाबाज़ों का कोई भी अमल कभी इस्लामी नहीं होता।
हज़रत मुहम्मद स. ने फ़रमाया है कि
‘जो धोखा दे वह हम में से नहीं है।‘

क़ातिलाने हुसैन का धोखा जगज़ाहिर है। उनके अमल को सिर्फ़ आतंकवाद कहा जाना उचित है।
इस्लाम क्या है ?
यह इमाम हुसैन रज़ि. की ज़िंदगी से जानने की ज़रूरत है।
‘इस्लाम‘ का एक अर्थ सलामती और शान्ति है।
‘इस्लामी आतंकवाद‘ का अनुवाद होता है ‘शान्तिवादी आतंकवाद‘।
क्या दुनिया में ‘शान्तिवादी आतंकवाद‘ संभव है ?
जहां शान्ति होगी वहां आतंकवाद नहीं हो सकता और जहां आतंकवाद होगा वहां शान्ति नहीं हो सकती।
अतः ‘इस्लामी आतंकवाद‘ एक ग़लत शब्द है। अपने खंडन के लिए यह शब्द ख़ुद ही गवाह है।
लेखक को इस बात पर संजीदगी से विचार करना चाहिए। , DR. ANWER JAMAL (2011-07-14 07:27:54)
अच्छा है और समसामयिक भी है ऐसे आतंकवादी और अतिवादी जो अपनी होशियारी झाड़ने पूरे शहर मे घूमते हैं उनका भी जवाब शामिल है । मुस्लिम धर्म को बदनाम करने मे ऐसे ही लोग जिम्मेदार है वरना पैगम्बर साहब ने तो अपनी तरफ़ से क्या नही सिखाया और उन्होने अपना नाम नही दिया अपनी तस्वीर नही दी ऐसा संत कौन था इन हजारो सालो मे आपको धन्यवाद वरना यहां ऐसे लोग मुसलमान बने फ़िरते हैं जो महादेव और गणेश मे भी अपना स्वार्थ खोजते हैं कहते हैं भाई तुम हमारी मानो वरना तुम हिंदू नही हो अरे भाई मुसलिम बनो या हिंदू काम नही इबादत करनी है उस उपर वाले की क्या अल्लाह ने इश्वर ने कहा है कि सौ मुसलमान या हिंदू बनाये बिना आओगे तो नर्क मिलेगा, अरूणेश सी दवे (2011-07-16 07:53:09)

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