92वें जन्म दिवस ( 20 अप्रेल 2008) पर विशेष
स्वतंत्रता सेनानियों की गरिमापूर्ण श्रृंखला में एक महत्त्वपूर्ण शख्सियत हैं, जनजातीय अंचल बांसवाडा के मास्टर सूरजमल। बहुत ही सामान्य परिवार में जन्मे मास्टर सूरजमल में राष्ट्रीय चेतना का विस्तार पिता शंकरलाल एवं उनके मित्रों की आपसी चर्चा सुन-सुन कर होता गया। शिक्षा सुविधा के अभाव में केवल मिडिल तक शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद वैचारिक क्रांति की लहरे अल्प आयु में ही उन्हें आँदोलित करने लगी। जलियाँवाला बाग काण्ड और भगत सिंह, राजगुरु तथा चंद्रशेखर आजाद को फांसी दिये जाने की खबर ने आग में घी का काम किया।
सारा देश गुलामी की बेडियों की चुभन से आकुल उन्हें तोड डालने के लिये व्यग्र हो रहा था। सडकों पर गाए जाने वाले ओजस्वी गीत माटी की मूरतों में फौलाद भर रहे थे। क्षितिज से निरन्तर एक आमंत्रण अनहद नाद सा गूँज रहा था।
उन दिनों गांधीवादी रचनात्मक नेता चिमनलाल मालोत की सिलाई की दुकान थी, मास्टर सूरजमल भी उनके पास काम सीखने लगे। उस वक्त राजा लोग वेट-वेगार लोगों से करवाते थे, एक बार दर्जियों ने राजा से शिकायत की कि हम से आप बेगार करवाते हैं तो अन्य जो लोग सिलाई का धंधा करते हैं, उन्हें कयों नहीं बुलाया जाता? यह सब सुन-देख चिमनलाल मालोत ने बाँसवाडा छोड दिया व इन्दौर (मध्यप्रदेश) चले गये। उनके संस्कार सूरजमल पर पडे व सिलाई के ही सिलसिले में सन् 1936 में अहमदाबाद (गुजरात) गये, उस वक्त वहाँ दारू बंदी आन्दोलन के सूत्रधारों धुलजी भाई भावसार व विजया बहन के संफ में आये। वे दोनों गॉँधीजी के आँदोलन में सक्रियता से जुडे हुये थे। वहॉँ सूरजमल मास्टर ने विट्ठलभाई पटेल के नेतृत्व में दारू बन्दी आन्दोलन के जुलूस में हिस्सा लिया।
वहाँ से बाँसवाडा आकर कुछ माह मॉँ की सेवा के पश्चात सन् 1939 में उदयपुर चले गये तथा गेहरीलाल जी बोर्दिया के पास सिलाई का काम सिखने लगे। गेरीलाल जी इंग्लैण्ड से उन्हीं दिनों सिलाई में डिप्लोमा करके आये थे, उनसे डिप्लोमा किया। उदयपुर में ही वे माणिक्यलाल वर्मा से मिले तथा सेवाश्रम की गतिविधियों को निकटता से देखा।
बाँसवाडा आकर उन्होंने सिलाई की दुकान खोल ली। उस समय कई लोग उनसे सिलाई सिखने आते थे। वहीं से उन्हें मास्टर के नाम से जाना जाने लगा। सन् 1942 में गाँधी जी ने ''अंग्रेजों भारत छोडो'' का नारा दिया तब मास्टर सूरजमल के मन में राष्ट्रीयता का ज्वार उद्वेलित होने लगा। इसी दौर में फिर राजशाही ने बेगार लेना शुरू किया। तब उन्होंने दुकान बंद कर सेटलमेंट दफ्तर में नौकरी कर ली और लोगों से संफ कर आजादी की लडाई में आगे आने के लिये लोक चेतना जगाते रहे। भूमिगत रहकर व चोरी छिपे अवकाश के दिनों तथा नौकरी के समय के बाद आजादी के लिये काम करते रहे व प्रजामंडल की गतिविधियों से जुडे। उस समय तक कई स्वतंत्रता सेनानी बाँसवाडा आ चुके थे।
इस समय तक आजादी के इस आँदोलन ने तीव्र रूप से पा लिया था। लोगों को सताया जाने लगा, दमन हुआ। लोगों को अनाज का मोहताज बना दिया गया, तब अनाज आँदोलन चलाया गया। समानान्तर सरकार बनाकर भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया गया। उस रात बैठक बिखर जाने के पश्चात् 5 मार्च 1946 आधी रात को कुछ नेताओं को पकड कर जेल मे डाल दिया गया। अगले दिन सवेरे पूनमचंद सुनार, मास्टर सूरजमल आदि ध्वज लेकर आजाद चौक पहुँचे व वन्दे मातरम, इंकलाब जिन्दाबाद के नारे गजा दिये। पुलिस जब छीना झपटी करने लगी तब झण्डा मास्टर सूरजमल ने थाम लिया। इस पर पुलिस उन पर टूट पडी तथा लाठियों की मार से बेहोश होकर गिर गयेघ्। होश आया तो उन्होंने अपने आपको जल की सीखचों में पडा पाया। कई लोग जेल में ठूँसे गये। बाद में जाकर सरकार से समझौता हुआ व लोगों के लिये अनाज का इंतजाम हुआ। नगर की समिति बनाई जाकर अनाज वितरण किया गया व बाअदब रिहा कर दिया गया।
एक सरकारी मुलाजिम होने के कारण सेटलमेंट के अधिकारियों ने उन्हें माफी माँगने के लिये कहा। उन्होंने स्वाभिमानी सेनानी की तरह माफी नहीं माँगी ओर सरकारी नौकरी ठकरा कर देश सेवा में जीवन खपा देने का प्रण ले लिया इसके बाद लम्बे समय तक उन्हें विपन्नता का सामना करना पडा। अब स्वाधीनता के लिए संघर्ष ही उनका मुख्य ध्येय रहा। सन 1947 में बांसवाडा गौशाला में हुए अधिवेशन में स्वागत समिति के सदस्य के बतौर उनकी सक्रिय सेवाएं रहीं।
अनेक कार्यक्रमों में क्षेत्रीय स्वाधीनता सेनानियों के अलावा श्रीमती रामेश्वरी, नेहरू, ठक्कर बापा, जयप्रकाश नारायण, गोकुलभाई भट्ट, सिद्धराज ढड्डा, मामा बालेश्वर दयाल आदि के संफ में आने से उनकी भावनाएँ दृढतर होती गई व काफी प्रेरणा पायी। आपातकाल के वकत जे पी आन्दोलन का उन्हें जिलाध्यक्ष बनाया गया।
सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों में मास्टर सूरजमल ने सक्रियता से भाग लिया। आजादी की लडाई के वक्त कई आँदोलनों, अधिवेशनों, कार्यक्रमों और लोक चेतना क्षेत्रों में आपकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
हनुमान जयन्ती चैत्र पूर्णिमा को 92 वें वर्ष में प्रवेश कर रहे मास्टर सूरजमल आज भी सामाजिक क्षेत्र में अग्रणी कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे हैं। देश की मौजूदा स्थिति से वे बेहद व्यथित हैं।
उनका कहना है की अभी भी उनके मन में देश के लिये कुछ कर गुजरने की तमन्ना हैं मगर परिस्थिति व उम्र के इस पडाव ने मजबूर कर रखा है। उनकी चिन्ता है कि देश को जिन आशाओं के साथ आजाद कराया था उन पर तुषारापात हो रहा है। वे कहते हैं कि शुद्ध बुद्धि और समर्पण के साथ देश को उन्नति के शिखर पर ले जाये जाने की जरूरत है।
नौजवान पीढी के नाम संदेश में मास्टर सूरजमल का आह्वान है कि सत्य और अहिंसा की धरा को हिंसा की आग में न धकेलें व भारत भू की पवित्रता को बरकरार रखते हुये सारी दुनियॉँ को रोशनी दें। लाठी के सहारे रचनात्मक कार्यक्रमों में भागीदारी और वयोवृद्ध होने के बावजूद प्रबल आत्मविश्वास के धनी मास्टर सूरजमल आज की पीढी के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं।
- डॉ. दीपक आचार्य
जिला सूचना एवं जन सम्पर्क अधिकारी, बांसवाडा