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नोबल शान्ति पुरस्कार से ऊंचा है गांधी का ‘दर्शन’

06 Feb 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

महात्मा गांधी के जन्म दिवस 2 अक्तूबर के आसपास लगभग प्रत्येक वर्ष भारत में इस विषय को लेकर अक्सर यह बहस छिड जाती है कि शान्ति एवं अहिंसा के ध्वजावाहक एवं भारत को स्वाधीनता दिलाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अब तक शान्ति एवं सद्भावना के लिए दिए जाने वाले विश्व के सबसे बडे नोबल शान्ति पुरस्कार से आखिर क्योंकर नहीं नवाजा गया? भारत में जन्मे या भारत में रहने वाले जिन लोगों को अब तक नोबल पुरस्कार मिल चुका है, उनमें रबिन्द्र नाथ टैगोर, सी वी रमन, डा. हरगोविन्द खुराना, डा. चन्द्रशेखर, मदर टेरेसा, प्रो. अमत्र्य सेन तथा वी एस नायपाल के नाम उल्लेखनीय हैं। निश्चित रूप से उपरोक्त सभी हस्तियां अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वाच्च स्थान रखती थीं। परन्तु इसमें भी कोई दो राय नहीं कि महात्मा गांधी का जीवन दर्शन इन सभी भारतीय नोबल पुरस्कार विजेताओं से कहीं भिन्न व निराला था।
हमारे देश में एक कहावत बहुत प्रचलित है कि ‘घर का जोगी जोगडा, आन गांव का सिद्घ’ अर्थात् किसी विद्वान व्यक्ति की उसके अपने देश में उतनी प्रतिष्ठा नहीं होती जितनी कि अन्य देशों में होती है। दुर्भाग्यवश महात्मा गांधी जैसा महान व्यक्ति भी इस कहावत से अलग नहीं रह सका। गांधी की सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता, साम्प्रदायिक एकता, त्याग व बलिदान जैसी बेशकीमती बातें भारत के दक्षिणपंथी विचारधारा रखने वाले लोगों के गले से नहीं उतर सकी। और पूरी दुनिया में पूजनीय समझे जाने वाले सत्य व अहिंसा के इस पुजारी का हमारे ही देश, भारत के साम्प्रदायिक सद्भाव से नफरत करने वाले लोगों ने गोली मारकर हत्या कर डाली। वह भी उस समय जबकि वे नियमित उपासना करने के बाद मन्दिर से बाहर निकल रहे थे। इतना ही नहीं बल्कि इससे भी बडा दुर्भाग्य यह है कि भारत में गांधी के अपने गृह राज्य गुजरात में आज साम्प्रदायिक सद्भाव की दुश्मन उन्हीं शक्तियों का इस कद्र बोलबाला हो चुका है कि वहां गोधरा नरसंहार तथा उसके पश्चात गुजरात में साम्प्रदायिक दंगों का वह ऐतिहासिक तांडव हुआ जिसने कुछ समय के लिए तो गोया गांधी की अहिंसा की नीतियों के तो परखचे ही उडा कर रख दिए।
बहरहाल, इसका अर्थ यह नहीं कि गांधी का बताया हुआ जीवन दर्शन बेमानी हो गया है या उनके विचार आज प्रासंगिक नहीं रहे। मेरे विचार से गांधी का विरोध जो भी है और जितना भी है केवल भारत में ही है। भारत के अतिरिक्त दुनिया के लगभग सभी देशों में गांधी को एक महान आदर्शवादी महापुरुष के रूप में स्थान दिया जाता है। इराक व फिलिस्तीन जैसे देशों में जहां कि आम जनता केवल और केवल शान्ति की ही गुहार लगाती नजर आ रही है तथा वहां के हिंसापूर्ण वातावरण से तंग आ चुकी है। कई पश्चिमी देशों में जहां कि साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्घ बडे प्रदर्शन आयोजित किए जाते रहते हैं तथा उन प्रदर्शनों में शान्ति, अहिंसा की बात की जाती है। ऐसे सभी स्थानों पर महात्मा गांधी की प्रतीकात्मक उपस्थिति को उनके चित्रों तथा उनके नाम से जुडे नारों के साथ देखा जा सकता है। हमारे देश में भले ही कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी विचारधारा रखने वाले एक सिरफिरे ने उन्हें हत्या करने के योग्य ही क्यों न समझा हो परन्तु भारत में आने वाला विश्व का कोई भी बडे से बडा राष्ट्राध्यक्ष, सुलतान अथवा नेता ऐसा नहीं है जोकि नई दिल्ली स्थित महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर गांधी के प्रति नतमस्तक न हुआ हो तथा उन्हें अपनी श्रद्घा के पुष्प अर्पित न किए हों। दक्षिण अफ्रीका की स्वतंत्रता के महानायक नेल्सन मण्डेला तो अपने संघर्ष का प्रेरणास्त्रोत ही गांधी को स्वीकार करते हैं।
Non Violence engds occuppations and resorts peace - Gandhi Madelaगत् दिनों महात्मा गांधी की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की लोकप्रियता एक बार फिर उस समय सिर चढ कर बोली जबकि भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में रखे गए दो अक्तूबर अर्थात् महात्मा गांधी के जन्मदिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाए जाने के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारी समर्थन मिला। महासभा के सभी 191 सदस्य देशों में से 14॰ से भी अधिक देशों द्वारा भारत के इस प्रस्ताव को सह प्रायोजित किया गया था। इस प्रकार इसी वर्ष 2 अक्तूबर 2007 को पहली बार महात्मा गांधी के जन्म दिवस को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाया गया। इस प्रथम विश्व अहिंसा दिवस के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र महासभा के विशेष अधिवेशन को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी ने सम्बोधित किया। सोनिया गांधी के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप ही 2 अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस मनाए जाने हेतु संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा यह निर्णय लिया जा सका है। परन्तु गांधी के विचारों से सहमति न रखने वाले वे लोग जिन्हें सम्भवतः 2 अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाए जाने का निर्णय पचाए नहीं पच पा रहा है, वे इस फैसले का विरोध सीधे तौर पर करने के बजाए सोनिया गांधी पर ही उंगली उठाने लगे हैं। इन गांधी विरोधी शक्तियों से यह बात हजम नहीं हो पा रही है कि आखिर सोनिया गांधी के प्रयासों से गांधी जी के जन्म दिवस को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाए जाने की मान्यता संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा कैसे दे दी गई।
गांधी जी का भारत में साम्प्रदायिकतावादी शक्तियों द्वारा कितना ही विरोध क्यों न किया जाए परन्तु उनके विचारों की प्रासंगिकता को भारत तो क्या पूरी दुनिया नजरअंदाज नहीं कर सकती। सत्य, अहिंसा, स्वावलम्बन, सदाचार आदि उनके बताए हुए वे मार्ग थे जिनपर चल कर इंसान बडी से बडी मंजिल को हासिल कर सकता है। हिंसा व शस्त्रों के बल पर विजय हासिल करने के बजाए वैचारिक दृढता, सत्य व सद्मार्ग को हथियार बनाए जाने की सलाह गांधी जी दिया करते थे। गरीब-अमीर, जात-पात तथा साम्प्रदायिक दुर्भावना जैसी विषमताओं के वे प्रबल विरोधी थे। भारत में कभी-कभार हिन्दू मुस्लिम समुदायों के मध्य साम्प्रदायिक विद्वेष का वातावरण दिखाई देता है। यह मतभेद कभी-कभी हिंसा का वह रूप धारण कर लेता है जिसके परिणामस्वरूप गोधरा व गुजरात जैसे शर्मनाक हादसे दरपेश आते हैं। ऐसे हादसों में लोगों को जिन्दा जलाए जाने के दृश्य सरेआम देखने को मिलते हैं। गर्भवती महिलाओं के पेट से बच्चे को निकाल कर उसे त्रिशूलों की नोक पर उछाला जाता है। शरीर के अंग-अंग तलवार की धार से टुकडे-टुकडे कर दिए जाते हैं। ऐसे साम्प्रदायिकतापूर्ण अमानवीय वातावरण से निपटने का गांधी जी ने ही एक रास्ता बताया था और वह रास्ता था साम्प्रदायिक सद्भाव, साम्प्रदायिक एकता तथा सर्वधर्म सम्भाव का रास्ता। अपने जीवन के अन्तिम दौर में उन्होंने कहा था कि मेरी दो आंखें हैं। एक हिन्दू और एक मुसलमान। इन दोनों आंखों को सुरक्षित रखने का जिम्मा भी अब हम पर ही है। खुदा का शुक्र है कि भारत की अधिकांश हिन्दू व मुस्लिम जनसंख्या अब भी गांधी के इस दर्शन का पालन करती है तथा साम्प्रदायिकता फैलाने वाल गांधी विरोधी शक्तियों को समय-समय पर लोकातंत्रिक तरीके से नीचा दिखाती रहती है।
विश्व के समक्ष शान्ति और अहिंसा का महान आदर्श पेश करने वाले गांधी जी को बावजूद इसके कि 1937, 1938, 1939, 1947 तथा उनकी हत्या से कुछ दिन पूर्व 1948 में भी नोबल शान्ति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था। परन्तु पांचों बार उन्हें यह सम्मान नहीं दिया जा सका। नोबल पुरस्कार देने वाली सर्वाच्च समिति यह मानती थी कि गांधी जी को यह सम्मान इसलिए नहीं दिया जा सकता क्योंकि सही मायनों में गांधी जी न ही राजनेता थे और न ही एक समर्पित राहत कर्मी। नोबल समिति का गांधी को नोबल पुरस्कार न दिए जाने के पक्ष में दिया जाने वाला यह तर्क कितना उचित था और कितना अनुचित यह तो मैं नहीं कह सकता परन्तु नोबल फाऊंडेशन के कार्यकारी अध्यक्ष माईकल सोहलम द्वारा गांधी जी को नोबल पुरस्कार न दिए जाने के संबंध में अफसोस जताना इस बात की दलील जरूर है कि गांधी जी को नोबल शान्ति पुरस्कार न दिए जाने का नोबल समिति का फैसला सही नहीं था। माईकल सोहलम ने अभी कुछ समय पूर्व कहा था कि ‘हमने एक महान नोबल विजेता को खो दिया और वे गांधी थे।’ इसी प्रकार नोबल म्यूजियम के क्यूरेटर डा. एंडर्स का कहना है कि ‘नोबल म्यूजियम में हमें महात्मा गांधी की कमी सबसे ज्यादा खलती है। मुझे लगता है वह एक गलती थी।’
नोबल पुरस्कार देने वाली सर्वोच्च समिति प्रत्येक वर्ष 2 अक्तूबर विश्व अहिंसा दिवस के आसपास गांधी जी को याद कर उन्हें नोबल पुरस्कार न दिए जा सकने जैसी अपनी गलती पर आंसू ही बहाती रहेगी या फिर लीक से हटकर उन्हें नोबल शान्ति पुरस्कार देकर अपने म्यूजियम की शोभा बढाएगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा। परन्तु मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि गांधी जी का अपना व्यक्तित्व तथा उनका जीवन दर्शन उस सर्वोच्च शिखर को छूता है, जिसकी बुलंदी का मुकाबला नोबल शान्ति पुरस्कार भी कतई नहीं कर सकता। 


तनवीर जाफरी - 
tanveerjafri1@gmail.com


Comments to this Article
Sh. Tanveer Jafri Ji ka yeh lekh isi site par shayad doosri baar parkashit huwa hai.Gandhi ji ke samney noble puraskar ki koi qeemat nahin hai.
Gandhiwadi hona hi apne aap men noble pane se kam nahin hai.Is article ke punarparkashan ke liye jaffri ji ko bhi dhanyawad aor khabar express ko bhi.Dinesh singh , Dinesh singh (2008-02-13 15:31:34)

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