राजस्थान प्रदेश मे गणगौर पर्व का सर्वाधिक महत्त्व है। पौराणिक आधार पर गण शिव और गौरी पार्वती की पूजा की परम्परा शताब्दियों से चली आ रही है। यह सर्वाधिक पावन-पर्व है। राजस्थान के सांस्कृतिक चेतना की पहचान इसी पर्व से बनी हुई है। सामन्ती परिवेश और राजाशाही जमाने में भी गणगौर पर्व को राजस्थान के विभिन्न शहरों में धूम-धाम से मनाया जाता रहा है।
यज्ञ सागर पुस्तक में गणगौर पर्व, गणगौर संबंधी कथा, कहानियों, गौरी गीत, व्रत, उपवास आदी के बारे में विशेष जानकारी दी गई है। चैत्र कृष्णा प्रतिपदा को कुवारीं कन्याऐं होलिका की विभूति से अखण्ड रूप मृनिश के पात्र में सोलह पिण्डिरा अपने हाथ से बनाकर भूमि पर षोडश दल कमल बनाकर उस पर मृनिश पात्र पाळसियां मे रखकर उसमें षोडश पिण्डिराओं, गौरी आदी मनाओं का पूजन शिव सहित चैत्र शुक्ला द्वितीया तक करके तृतीया व्रत यानी गौरी व्रत गणगौर उत्सव की सम्पन्न हेतु करती है। प्रलयाग्नि होलिका के सर्वभसम होने पर बचती है। विभूति इस अनोखी वस्तु को देखकर कहा जाना है कि यह भगवान शिव की विशेष विभूति है। महादेव जी ने ब्रीज रूप से विभूति में स्थापित करके उडाया कि पार्वती अंग विषेश प्राप्ति भवेति उस विभूति के साथ बीज रूप का गणेश देवता रूप पार्वती माता ने बताया इसी प्रकार परम्बा रूप कुमारी कन्याऐं विभूति रूप से होलिका मृनिश से सोलह कलारूप गौरी ईश्वर रूप की स्वांगुलि आंगिन पिण्डिराऍं, शिव शक्ति रूपा मानी जाती है। मृनिश पाम गोल अण्डकराह रूप मानकर उसमें दीर्घायु पाने की कामना की जाती है। बीजारोपण अंकुरारोपणा कुमारी कन्याऐं तथा सुहागिन स्त्रियाँ सुख सौभाग्य एवं वंश वृद्धि के कामना से मृनिशमय गोल पथ में मृनिश रखकर उसमें तीन बार एक ही पात्र में तीन पुडन बीजारोपण किया जाता है।
जल सिंचन करने चैत्र शुक्ला तृतीया को अंकुर समृद्ध शालिपात्र को गवरजा माता कि सम्मुख रखकर विधिवन् पूजन करके गवरजा माना रे मस्तिक तथा हाथों में उन समृद्ध अंकुर शाखाओं का समर्पण मानो शुभकामनाओं को हस्तगन करती हुई प्रार्थना करती है कि हे गौरी हमारा सुख सौभाग्य बढे तथा वंश कुल/बाडी में सदा आनन्द बढता रहे। अकुंर हरित हरा पीन पीला श्वेत सफेद आदी होने से अलग-अलग फल माना जाना है।
इसी प्रकार संकल्प पूजन ऊॅं गौर्ये नमः इति विभूति ग्रहणम् ऊॅ माहेश्वर्ये नमः इति ऊॅ गौरी पदमा, शचीर, मेघा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधार, स्वाहा, मातरो, लोकमातरः, घृति, पुष्टि, नृष्टि, आत्मनः, कुल देवता, गणेशेना घिरा हमेना वृर्द्धो पूज्याश्च षोडशः इसी प्रकार यह ध्यान श्लोक उच्चारित होता है।
सर्व मंगल माडल्ये शिवे सर्वा साधिके
शरणये क्यम्बके गौरी नारायण नमोस्तुते
पार्वती लालिमा गौरी गांधरी शंाकरी
शिवा उमा सती समुदष्टि नामाष्टर कंया
राजस्थान में बूंदी एक ऐसी जगह है जहां यह त्यौहार नही मनाया जाता। वही के राजा जोध सिंह जी चैत्र शुक्ला तृतीया संवत् १७६३ के दिन गणगौर की प्रतिमा के साथ मय अपनी पत्नी व अन्य साथिया सहित नाव मे सैर करने निकले परन्तु किसी मस्त हाथी ने उस नाव को उलट दिया जिससे व अपने साथियों सहित डूब गये। कहावत प्रचलित है ”हाडो ले डूबी गणगौर, श्री जगदीश गहलोत बदी राज्य का इतिहास पृष्ठ संख्या ७६-७७ मेवाड की गणगौर अत्यन्त प्रसिद्ध है। उदयपुर में वैशाख कृष्णा तृतीया को छींगारू गणगौर का त्यौहार मनाया जाता है। उदयपुर के अलावा जोधपुर बीकानेर जयपुर आदी प्रान्तों में धूम -धाम से मनाया जाता है। रंग-बिरंगे बीच पहने नारियों तथा पगडियां पहने पुरूष लोग की इस पर्व को हर्षोल्लास सहित मनाने हे। घरों पर स्वादिष्ट व्यंजन बाजरी के ढोकले, फोगलों का रायता, देशी घी की मिठाईया वाले भोजन तैयार किये जाते है।
बीकानेर की गणगौर दौड प्रसिद्ध है। भादाणी पुरोहित एवं देशवासी जाति के लोग अपनी गणगौरों के दौडते हुए ले जाते है। यह दृश्य बडा आकर्षक एवं सम्मोहक है बीकानेर राज घराने की गणगौर की शाही सवारी के साथ -साथ लारवा लूवर भ्।ी गायी जाती है। बीकानेर नगर में 15 दिनों तक गवरजा गीत गली गुवाड मौहल्लों में सुनाई देते रहते है। प्रसिद्ध मौहल्लों में बारह गुवाड चौक, नत्थुसर बास, रानीसर बास, गंगाशहर -भीनासर सुजानदेसर ढढ्ढों का चौक में इस पर्व को धूम-धाम से मनाया जाता है। गवरल गीत भी स्वर लहरी घृत तंग को अंकृत करती है।
गवरल रूडों ए नजारों तीखों नैणारों
गढ हे कोटा सूं गवरल ऊतरी
हो जी बैरे हाथ कंवळ कैरों हे
इसी प्रकार बीकानेर स्थित चांदमल ढढ्ढा की गवर ढढ्ढों के चौक में दर्शनार्थ रखी जाती है। इस दिन मेला भी भरता है सेठ उदयमल ढढ्ढा के गणगौर के आशीर्वाद स्वरूप प्रभु जन्मा था गीत है।
चांद मल ढढ्ढे का लडका रे
सूरज मल पंछी का पोता
ऊंची हवेली में पौढे गवरजा
खस -खस रा पंखा
यह गणगौर लगभग 12 आभूषणों से सुसज्जित रहती है। इन गहनों में सिर का सोने में जडाऊ हीरे का बोर मोती लगा टीका बोर के नीचे खांचा जोडी नाक में हीरे की जडाऊ नथ गले में मोती माणक हीरा पन्ना वाला कट्सरी गलपटिया तेवत रे और नीचे चन्दन हार हाथ में मोतियों की बगडी गजरे चूडिया और मझारिया उॅगलिया में छल्ला बीटी कमर मे हीरे मोती सोने रे कोन्देर पॉवों मे नेवली कडा चूडिया जैसे बारह गहनो का सैट प्रसिद्ध है।
बारह गुवाड में हाकू जी छंगाणि के पुत्र आलू जी छंगाणि की गणगौर लगभग दो सौ वर्षो पुरानी है। गोंद, अखबार मैथी मिट्टी -कृट्टी से निर्मित है। बारह गुवाड चौक में बारे मासै रो मेळो लाग्यो ंआज गणगौर पर्व लोक संस्कृति लोक चाह एवं लोक भाव से युक्त पावन पर्व है। |