एक चरवाहा था, नन्दू। उसके पास बहुत सी बकरीयां थी। वह बडी सावधानी से उनकी देखभाल करता था।
एक बार उस इलाके में भयंकर अकाल पडा। पशुओं के लिए चारा मिलना दुर्लभ हो गया। आखिर चन्दू बकरियों के साथ चारें की खोज में गांव से निकल पडा।
चलते-चलते नन्दू एक घाटी में जा पहुंचा। वहां चारों ओर हरियाली फैली हुई थी। नन्दू ने वही रहने का फैसला किया। वहां एक पुरानी झोपडी भी थी। नन्दू ने मरम्मत करके उसे अपने रहने लायक बना लिया। बकरियों के लिए भी उसने एक बाडा बना दिया।
एक-दो दिन बारिश हुई। घास-पात में खूब मच्छर हो गए। नन्दू ने एक उपाय सोचा,’लकडया एकत्रित करके जगह-जगह आग जला दी।‘ खूब धुंआ हुआ। धुंए से मच्छर भाग गए। अब तो वह रोज यही करने लगा। आसपास के गड्ढो को भी भर दिया। इस तरह धीरे-धीरे मच्छर खत्म हो गए। अब बकरिय को कोई तकलीफ न थी।
एक दिन नन्दू फल-फूल की तलाश में जंगल में गया। वहां सुनहरी रंग के हिरण एक समूह में आने लगे। हिरणों को देखकर नन्दू के मन में लोभ आ गया। सोचने लगा-क्यों न इन्हें पकड कर राजा को उपहार में दिया जाए। ऐसे खूबसूरत हिरण पाकर राजा बहुत खुश होंगे। हो सकता है, मुझे बढया ंइनाम भी मिल जाए। राजा धन देंगे, तो मेरी मौज हो जाएगी। अब नन्दू को अपनी बकरियों की परवाह न रही। वह नित्य हिरणों को आकर्षित करने के तरीके सोचता रहता। उसने वहीं नई झोंपडी बना ली। वह अपनी बकरियों को लगभग भूल ही गया। देख-रेख के बिना बकरियों कमजोर और बीमार रहने लगी। उनमें से कुछ चरते-चरते राह भूलकर भटक गई। कुछ मर गई। धीरे-धीरे मौसम बदलने लगा। बारिश और ठंड के बाद गर्मी आ गई। हिरण वहां से घने जंगल में भाग चले गए। नन्दू हिरणों की खोज में फिरने लगा। लेकिन हिरण कहां मिलतें।
अंत में वह समझ गया, अब हिरण नहीं आएंगे। तब उसे बकरियों की याद आई। वह भारी मन से अपनी पुरानी झोपडी में लौट आया। लेकिन उसे बाडे में एक भी बकरी दिखाई नहीं दी। नन्दू ने पछता कर अपना सिर पीट लिया। लालच के कारण वह घर का रहा, न घाट का।
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