सरकार और संकट की राशि एक है। दोनों में स्वभाव व प्रकृति में असमानता के बजाए समानता अधिक जान पडती है। इतिहास गवाह है कि सरकारे संकटों के साये में ही पलती रही है। कारण साफ है कि सरकार जब-जब सता में परिवर्तित होती तब-तब आम अवाम् की विडम्बनाएँ विचलन व भय बढते जाते हैं।
लोकतंन्त्र का एक फायदा और कायदा यह भी है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के चलते किसी भी किस्म के मानवीय मूल्य के हनन पर हम अपनी बेबाक राय दे सकते हैं। आज मंगलवार है। विधानसभा का सत्र प्रारम्भ हो रहा है। प्रदेश भय/ भूख/ के साथ बीमारियों की जकडन मे और अधिक जकडता जा रहा है। जहाँ एक और हज हाऊस सरकार के गले की हडडी बना है। वही इस पर सत्ता व संगठन् के मनमाने रवैये ने भी सरकार की पेचिदगियों को बढा दिया है। इधर कुछ जिलों में पिछले दिनों हुई जल त्रासदियों बाढ से तबाही ने सरकार की सूची में अपनी जगह अग्रिम बनाई है। क्योकि त्रासदी के बाद अपर्याप्त सेवाओं के कारण हजारों पीडितों को समय पर राहत सेवाएँ उपलब्ध नहीं हो सकी। सरकार की एक मुसीबत लाभ के पद का मामला भी है। सत्तारुढ दल के प्रेमसिंह् बाजौर अर्जुन सिंह् देवडा और् विष्णु मोदी के बारे में सरकारें को सोच विचार कर अपने निर्णय करने हैं। ऐसा लगता है कि इस बाबत् विधेयक में संशोधन सरकार की अनिवार्य ज्ररुरत बन गया है। विपक्ष पहले से ही इस मुददे पर अपनी भकुटि ताने है। उधर चुनाव आयोग ने भी मामले की तह तक जाने की राह अपना रखी है। हिंसा भ्रष्टाचार और् लचर होती जा रही प्रशासनिक व्यव्स्था के मुददों के साथ विपक्ष के ये तीन हथियार सरकार पर भारी पड सकते हैं।
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