Sunday, 01 November 2020

KhabarExpress.com : Local To Global News

ऑप्रेशन कलंक की छाया में गुजरात चुनाव


Writer - Nirmal Raniगुजरात तथा हिमाचल प्रदेश में दिसम्बर माह में विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। निःसन्देह इन दोनों ही विधानसभाओं के चुनाव परिणामों पर पूरे देश की नजर लगी हुई है। उम्मीद है कि परिणाम दिलचस्प व अप्रत्याशित होंगे। जहां तक हिमाचल प्रदेश विधानसभा का प्रश्न है तो 1952 में पहली बार विधानसभा चुनावों से रूबरू होने वाले इस राज्य में वर्तमान दलीय स्थिति के अनुसार 68 सीटों वाली विधानसभा में सत्तारूढ कांग्रेस का 42 सीटों पर कब्जा है जबकि भारतीय जनता पार्टी के पास मात्र 17 सीटें ही हैं। लोक जनशक्ति पार्टी को पिछले चुनावों में एकमात्र सीट पर विजय प्राप्त हुई थी जबकि निर्दलीय प्रत्याशी 6 सीटों पर विजय प्राप्त करने में सफल हुए थे। गत् चुनावों में बहुजन समाज पार्टी ने आठ सीटों पर अपने प्रत्याशी खडा करने के बावजूद एक भी सीट प्राप्त नहीं की थी।
हिमाचल प्रदेश के वर्तमान चुनावों में सत्तारूढ कांग्रेस को पारंपरिक सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना पड रहा है। इसका पूरा लाभ भारतीय जनता पार्टी द्वारा उठाने की कोशिश की जा रही है। इस बार बहुजन समाज पार्टी द्वारा भी राज्य में कुछ करिश्माई परिणाम दिखाने की उम्मीद है। इसका कारण जहां एक ओर यह है कि उत्तर प्रदेश में पहली बार बहुजन समाज पार्टी द्वारा पूर्ण बहुमत की सरकार का गठन करने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती का राजनैतिक कद बहुत ऊंचा हो गया है, वहीं दूसरी ओर मायावती ने हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के तेज तर्रार नेता रहे मेजर विजय सिंह मनकोटिया को बहुजन समाज पार्टी की राज्य शाखा का अध्यक्ष बनाकर उन्हें बहुजन समाज पार्टी के प्रस्तावित मुख्यमंत्री के रूप में घोषित कर दिया है। मनकोटिया तो बहुजन समाज पार्टी के सम्भावित प्रदर्शन को को लेकर इतने उत्साहित हैं कि उन्होंने विधानसभा की 50 सीटों पर बसपा के विजयी होने की घोषणा तक कर डाली है। यदि बहुजन समाज पार्टी के आंकलन के अनुसार विधानसभा में प्रत्याशित सीटों पर उसे विजय नहीं भी हासिल हो सकी तो भी बसपा के पक्ष में पडने वाले मतों के प्रतिशत आगामी विधानसभा चुनावों के परिणामों को अवश्य प्रभावित कर सकते हैं। देखना होगा कि राज्य के इस त्रिकोणीय होते जा रहे चुनाव संघर्ष में ऊंट किस करवट बैठता है।
गुजरात के चुनाव के प्रति भी आम लोगों की कुछ अधिक ही उत्सुकता बनी हुई है। गुजरात के साम्प्रदायिकतापूर्ण वातावरण में नरेन्द्र मोदी जोकि स्वयं हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिकता का प्रतीक बन चुके हैं, इसी नाव पर बैठकर दो बार लगातार राज्य के मुख्यमंत्री बन चुके हैं। हालांकि 2004 में हुए लोकसभा चुनावों में राज्य की 26 संसदीय सीटों में से कांग्रेस ने 12 सीटें जीतकर नरेन्द्र मोदी सरकार को यह सीधा संदेश दे दिया था कि गुजरातवासियों का राष्ट्रीय स्तर पर साम्प्रदायिकता को हवा देने का अथवा साम्प्रदायिक शक्तियों को मजबूत करने का कोई इरादा नहीं है। परन्तु इसमें भी कोई दो राय नहीं कि गुजरात दंगों के बाद 2002 में हुए विधानसभा चुनावों में 182 सीटों की विधानसभा में 126 सीटों पर विजय पाकर भाजपा ने राज्य में हिन्दुत्ववादी मतों के ध्रुवीकरण का एक सफल राजनैतिक खेल खेला था। जबकि कांग्रेस ने 51 सीटों पर विजय पाकर यह संदेश छोडा था कि महात्मा गांधी के इस गृह राज्य में सत्य, अहिंसा व सर्वधर्म सम्भाव अभी भी जिंदा व सलामत है। 2002 के विधानसभा चुनावों में जहां तक मत प्रतिशत का प्रश्न है तो उसके अनुसार भी कांग्रेस की स्थिति कोई इतनी अधिक दयनीय नहीं थी न ही भाजपा की इतनी अधिक उत्साहजनक। 2002 में भाजपा को 49.8 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे जबकि कांग्रेस ने 39.2 प्रतिश वोट हासिल किए थे।
गुजरात में होने वाले ताजातरीन चुनाव भी पारंपरिक सत्ता विरोधी रुख का सामना तो कर ही सकते हैं, साथ-साथ इस बार नरेन्द्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी की ऐसी अन्तर्कलह का सामना करना पड रहा है जिसकी न तो मोदी ने कल्पना की थी न ही उन्हें इतने बडे पैमाने पर होने वाले दलीय विद्रोह की उम्मीद थी। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी राज्य के गृहमंत्री हरेन पांड्या की हत्या के भूत से अभी पूरी तरह उबर भी नहीं पा रहे थे कि तहलका द्वारा किए गए ऑप्रेशन कलंक ने उन्हें व उनकी हिन्दुत्ववादी टीम को और भी बेनकाब कर दिया। गुजरात चुनाव के पूर्व ऑप्रेशन कलंक के माध्यम से नरेन्द्र मोदी के सेनापतियों को जिस प्राकर बेनकाब किया गया तथा गुप्त कैमरे का सामना करने वाले मोदी के विश्वासपात्रों ने जिस तरह नरेन्द्र मोदी को भी गुजरात दंगों में हुई ज्यादतियों का जिम्मेदार ठहराया व इसके लिए उनका महिमामंडन भी किया, उससे नरेन्द्र मोदी का वास्तविक चेहरा पूरी तरह से बेनकाब हो गया है।
हालांकि इस प्रकार के आरोप भाजपा विरोधी दलों द्वारा नरेन्द्र मोदी पर पहले ही लगाए जा रहे हैं। परन्तु आम जनता उसे मोदी विरोधियों के प्रचार के रूप में देख सकती थी। परन्तु ऑप्रेशन कलंक में इन्सानियत को शर्मसार करने वाले सभी खुलासे स्वयं नरेन्द्र मोदी के उन हितैषियों द्वारा किए गए हैं जो मोदी को ‘भगवान’ के रूप में देखते हैं। ऑप्रेशन कलंक में नरेन्द्र मोदी का वह भयावह चेहरा उजागर हुआ है जिसने भारतीय राजनीति को तो शर्मसार किया ही है साथ-साथ राम राज्य जैसा ‘सुशासन’ देने वालों की हकीकत भी सामने रख दी है। यदि ऑप्रेशन कलंक के खुलासे के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार को सरकारी आतंकवाद फैलाने वाली सरकार की संज्ञा दी जाए तो यह गलत नहीं होगा। इस खुलासे के बाद भाजपा विरोधी दल के नेताओं द्वारा तो नरेन्द्र मोदी पर मुकद्दमा चलाने, त्यागपत्र देने, यहां तक कि उन्हें फांसी पर चढाने तक की मांग की जाने लगी थी।
ऑप्रेशन कलंक के सार्वजनिक होने के बाद राजनैतिक विशेषकों का एक वर्ग ऐसा भी है जो यह सोच रहा है कि ऑप्रेशन कलंक का मोदी को नुकसान नहीं बल्कि फायदा होगा। इस स्टिंग ऑप्रेशन के बाद गुजरात में हिन्दुत्ववादी मतों के और अधिक ध्रुवीकरण होने के कयास लगाए जा रहे हैं। बेशक चुनाव परिणाम आने के बाद ही इस बात का सही पता चल सकेगा कि इस स्टिंग ऑप्रेशन ने नरेन्द्र मोदी को नुकसान पहुंचाया या फायदा। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि नरेन्द्र मोदी के असली चेहरे को देखने के बाद भी गुजरात की जनता पुनः मोदी के हाथ में सत्ता की बागडोर सौंपने जैसी भूल शायद न करे। ऑप्रेशन कलंक ने एक शासक के रूप में सत्ता पर बैठे नरेन्द्र मोदी की उन वास्तविकताओं पर से पर्दा हटा दिया है जिसने कि गुजरात को बदनामी के सिवा और कुछ नहीं दिया। गोधरा, गुजरात से लेकर ऑप्रेशन कलंक तक गुजरात हमेशा नरेन्द्र मोदी के कारण ही पूरे विश्व में नकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। अमेरिका भी नरेन्द्र मोदी को अपने देश में आने का विजा देने से इन्कार कर चुका है। पिछले दिनों प्रसिद्घ पत्रकार करण थापर द्वारा लिए जा रहे एक साक्षात्कार में नरेन्द्र मोदी जब करण थापर के सवालों का जवाब न दे सके तो वे साक्षात्कार को बीच में ही छोडकर अप्रत्याशित ढंग से स्टूडियो से बाहर निकल गए। थापर के अनुसार उन्होंने नरेन्द्र मोदी की दुखती नब्ज पर हाथ रख दिया था। ऐसे हालात से मोदी को प्रायः ऐसे हालात से रूबरू होना पडता है जबकि राम राज्य की दुहाई देने वाले नरेन्द्र मोदी एक शासक के रूप में बगलें झांकते दिखाई देते हैं।
बहरहाल नरेन्द्र मोदी इस बार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के साथ-साथ राज्य के विकास के नाम पर भी जनता से वोट मांग रहे हैं। बिजली की नियमित आपूर्ति, भारी विदेशी पूंजी निवेश तथा औद्योगीकरण को बढावा जैसी बातें वे भगवा राजनीति की आड में जनता को समझा रहे हैं। परन्तु देखना यह है कि ऑप्रेशन कलंक की छाया में होने वाले इस चुनाव में जनता मोदी के भगवाकृत विकास के पक्ष में अपना निर्णय देगी अथवा गांधी के सत्य, प्रेम, अहिंसा व सर्वधर्म सम्भाव के पक्ष  अपनी राय व्यक्त करेगी।


Nirmal Rani - [email protected]