चैम्पियंस ट्राफी पर प्रबल दावेदार आस्ट्रेलिया ने गत चैम्पियन वेस्टइंडीज को पराजित कर आसानी के साथ कब्जा कर लिया। मेजबान भारत इस प्रतियोगिता के सेमिफाईनल में भी नहीं पहुंच पाया। मलेशिया में डीएलएफ कप में बुरी तरह पराजित भारतीय क्रिकेट टीम के लिए यह लगातार दूसरी बडी असफलता हैं। ऐसा बहुत कम देखने को आया है कि टीम की हार के लिए कोच को दोषी ठहराया जाता है परन्तु भारत के मामले में पिछले कुछ समय से ऐसा हो रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ग्रेग चैपल एक ऐसी टीम के कोच है तो प्रतिभाशाली खिलाडयों से युक्त है और इस टीम के खेलने संबधी सभी महत्वपूर्ण निर्णय चैपल करते है। हर एक हार के पीछे चैपल का कोई न कोई* निर्णय महत्वपूर्ण कारण होता है। इस लिहाज से चैम्पियंस ट्राफी में भारत का निराशाजनक प्रदर्शन गुरू ग्रेग की हार है।
आईसीसी क्रिकेट रैंकिग में कभी टॉप रैंकिग में रही भारतीय टीम की रैंकिग लगातार गिर रही है। बावजूद इसके कि भारतीय टीम के पास विश्व के नामचीन खिलाडी हे। सौरव की टीम के मुकाबले राहुल की टीम काफी पीछे है। चैम्पियंस ट्राफी में उसका प्रदर्शन बहुत खराब रहा। वर्तमान में भारतीय टीम के सभी निर्णय कोच चैपल करते है और कप्तान राहुल द्रविडमात्र कठपूतली नजर आते है। चैपल भारतीय टीम की प्रतिभा की परख करने में नाकाम रहे है। प्रयोग के नाम पर प्रतिभाऐं जाया हो रही है। अपने गलत निर्णय को चैपल सही साबित करने के लिए क्रिकेटरों की प्रतिभाओ के साथ अन्याय करते है। पठान को नंबर तीन पर मैदान में उतारने का निर्णय और कप्तान राहुल द्रविड का क्रम बदले जाने का निर्णय टीम को भारी पडा। वीरेन्द्र सेहवाग पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया जा रहा है। रमेश पोवार को आवश्यकता होने के बावजूद वेस्टइंडीज और आस्ट्रेलिया के विरूद्ध नहीं ख्लाया गया। उसकी कमी की पूर्ति वीरेन्द्र सेहवाग से करवाई गई। मैदान में खिलाडयों की बॉडी लैग्वेज संघष्र्ा करने वाली नहीं दिखाई देती है। भारतीय खिलाडयों की बॉडी लैग्वेज उनके उपर किसी बाहरी दबाव को प्रदर्शित करती है। यह दबाव ग्रेग चैपल का ही हो सकता है। भारतीय खिलाडी मैदान में उत्साहहीन नजर आते है। राहुल की टीम में कमोबेश वही खिलाडी है जो सौरव की टीम में थे परन्तु उनका प्रदर्शन कमजोर है। स्पष्ट है कि प्रतिभा की कमी नहीं है। प्रतिभा का सही उपयोग नहीं हो रही है। सही जगह पर सही आदमी का उपयोग नहीं हो पा रहा है। प्रयोग आस्ट्रेलिया की टीम के द्वारा भी किये जाते है परन्तु उनके प्रयोग परिस्थिति के अनुसार किये जाते है। वे मैच की स्थिति, प्रतिद्वन्द्वी टीम और विकेट को देखकर निर्णय लेते है और विशेष बात यह है कि उनके प्रयोग से किसी भी बल्लेबाज और गेदबाज का क्रम प्रभावित नहीं होता है। चैपल संभवत क्रिकेट की दुनिया के अकेले ऐसे कोच है जिनका टीम में सर्वाधिक दखल है। यहां तक कि ऐसा लगता है कि राहुल द्रविड टॉस जीतने के बाद निर्णय भी चैपल के निर्दशानुसार करते है। इससे भारतीय कप्तान की भूमिका नगण्य हो गई है। कोच ने अपने कार्यक्षेत्र की सीमाऐं लांघ ली है। कोच का प्रमुख कार्य खिलाडयों को प्रशिक्षित करना और उनकी कमजोरियों को दूर करना है। संभवतः चैपल द्वारा इस कार्य में रूचि नहीं ली जा रही है। भारतीय टीम के क्षेत्ररक्षण में कोई सुधार नहीं हुआ है जबकि कोच के आने के बाद सुधार होना चाहिए था। अजित वाडेकर और जॉन राईट ने इस* क्षेत्र में जो मेहनत की उसे चैपल ने बेकार कर दिया। आउट आफ फार्म* में चल रहे बल्लेबाज और गेंदबाज के प्रदर्शन में सुधार के लिए चैपल द्वारा कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि ग्रेग चैपल भारतीय क्रिकेट टीम के कोच नहीं होकर गैर खिलाडी कप्तान है।
अब समय आ गया है कि भारतीय टीम में कोच और कप्तान की भूमिका की समीक्षा होनी चाहिए। कप्तान को अपने कार्यक्षेत्र में स्वंतत्रता से कार्य करना चाहिए। ग्रेग चैपल के कार्य को मात्र टीम के प्रदर्शन के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि चैपल अभ्यास सत्र में कैसे कार्य कर रहे है। विश्वकप के मध्यनजर भारतीय रणनीतिकारों को कोच एवं कप्तान की भूमिका की समीक्षा करनी चाहिए। चयनकर्ता, कोच और कप्तान के बीच एक सामंजस्य हेानी चाहिए। चैपल को इस समय कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता मिली हुई है परन्तु वे इसका दुरूपयोग कर रहे है । चैम्पियंस ट्राफी में भारतीय टीम नहीं हारी हे। यह चैपल की रणनीतिक हार है। यह गुरू ग्रेंग की हार है।
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