यह खबर युग है। हम खबर समय में खबरों के साये में पल-पढ रहे हैं। खबर का हिस्सा होना हमारी नियति हो गया है। बाजार के लिए खबर ब्रह्मास्त्र है। जिसका संधान वह अपने हित में अपनी छुपी हुईर् रणनीति के तहत करता है। खबर युग में खबर सर्वोपरि धर्म है। बाजार इस धर्म का नियामक है क्योंकि प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष खबर के प्रभाव से जो स्थितियाँ पैदा होती है उन्हें बाजार अपने हक में इस्तेमाल करता है।
अब देखिए न बाजार के मायालोक ने बॉलीवुड के जरिये खबर युग में एक नई खबर को इन दिनों सबसे ज्यादा भुनाया है। समय सन्न है। आवाम् हैरान। बाजार की करतूत के आगे बुद्विजीवी हतप्रभ। भाई लोगों ने पाप के चार हथियारों में अन्तिम श्रद्वा को अपना अमोघ अस्त्र बनाकर हमारी भोली भाली जनता विशेषकर मध्यवर्गीय चेतना पर जबर्दस्त आक्रमण किया है।
बाजार के खबरव्यापारियों ने भाषा को भी अपनी अनुगामिनी बनाने के क्रम इस बार ’’गांधी जी ’’ नया ब्रेक ’गांधी गिरि’शब्द के इजाद से दिया है। पहले हम बाबूगिरि, दादागिरि, गुण्डागिरि आदि शब्दों को सुनते रहे हैं। अब गांधीजी इन्हीं गिरियों की सूची में शुमार है। बाजार बहुत बैचेन है। अधीर है वह वस्तु, घटना, व्यक्ति, भाषा आदि सब कुछ को बेचना चाहता है। शुक्र था कि अब तक गांधी बिका नहीं लेकिन लीजिये अब गांधीगिरि बेचकर बाजार अपने नए कीर्तिमान खडे कर रहा है।
कहने को ’लगे रहो मुन्नाभाई ’ ने भारतीय युवा चित्त में गांधी का पुनरानिष्कार किया। गांधीवाद का नवीनीकरण किया है पर वैश्वीकरण के साथ कदमताल मिलाकर चलने वाला हमारा युवा इसे कितना बचा-पचा पाएगा। इसका उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में है। बरहाल यह एक अलग बहस का मुद्दा है। पर अपुन के भाई माई-बाप बाजार आका के रणनीतिकार यह भूल गए हैं कि गांधीवाद एक वैश्विक परिघटना है। गांधी जीवन को संपूर्ण ढंग से देखने जीने व चरित्र, आचरण व्यवहार ढालने की वैचारिक व्यावहारिक प्रक्रिया है।
अक्सर हमारे साथ दुर्घटना यह होती है कि जिन चीजों को हम कम समझते हैं। उन पर हम तीव्र प्रतिक्रिया करते हैं। फिल्म में जैसे व जिस तरह से गांधीवाद को गांधीगिरि के रूप मे ंएक आस्वाद्य व्यंजन की तरह परोसा गया है। यह गांधी के विचार की अहिंसक हत्या कही जा सकती है। मेरे एक बहुत ही निकट के वरिष्ठ साहित्यकार ने एक बार मुझे कहा था कि किसी बडे आदमी के साथ किसी औसत व्यक्ति की तुलना की जाय तो यह उस बडे और महान व्यक्ति को अपमान है। यह नेक सलाह उस समय मुझे बडी राजनीतिक किस्म की लगी लेकिन अब जब गुण्डागिरि के साथ गांधीगिरि भी शुमार हो रहा है तो मुझे उनकी यह सलाह ठीक ही जान पडती है।
गांधी व्यक्ति नहीं जीवन है। जीवन को सम्पूर्णता का व्यावहारिक पथ है विचार का जीवन्त प्रमाण है। जीवन के झांझावतों से टकराने व समय मे हस्तक्षेप करने की सामूहिक श्रमशीलता का पुख्ता प्रमाण है। गांधी विचार को मूर्त रूप में देखने का सुखद सकून है। गांधी हमारे चिर परिचत संसार के ध्यान परिसर का वह हिस्सा है जो अपने में असाधारण होने की क्षमता निपुणता व कौशल का परिष्कृत रूप है
अतः ऐसे विराट् व्यक्तित्व के प्रति इतने हल्के फुल्के ढंग से सोचने व उसको अपनी सोच के अनुकुल परोसने में हमारी उसके प्रति समझ का अभाव ही सादित होगी और कुछ नहीं ।
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Comments to this Article great sir...., doctor_vinay2005@yahoo.com (21/07/2007 10:32:07) |