हर नगर की अपनी अस्मिता, अपना गौरव और अपनी पहचान होती है। जिसके बल पर ही वह अपने भौगौलिक अस्तित्व के जरिये अपने होने का सघन एहसास देता है।
नगर बीकानेर अब तक पापड भुजिया, रसगुल्ला, ऊन, सिरेमिक्स जैसे व्यवसायों के जरिये ही अन्तरराष्ट्रीय मानचित्र पर अपनी पहचान बनाए था लेकिन एड्वोकेट एवं साहित्यानुरागी उपाध्यानचन्द्र कोचर एवं जया उल हसन कादरी के संयुक्त प्रयास से हजार हवेलियों का शहर बीकानेर पुस्तक ने नगर को हवेलियों के शहर की श्रेणी में भी ला खडा किया है। हलांकि राजस्थान में हवेलियो का शहर के नाम से नवलगढ प्रसिद्ध है, पर बीकानेर की स्थापत्य कला के ये बेनजीर, बेमिसाल एवं नायाब नमूने किसी भी सूरत, अपनी मूरत में अन्य के मुकाबले किसी भी स्तर पर कमजोर नही है।
ग्यारह अध्यायों में विभक्त यह पुस्तक हवेली साहित्य से संबधित (विशेषकर बीकानेर के संर्दभ में) अपनी तरह की प्रथम कृति है। जिसमें हवेली की अवधारणा से लेकर हवेली निर्माण में सहायक कलाओं की उपस्थिति व महत्त्व को एक साथ रेखांकित किया गया है। इतना ही नहीं पुस्तक में हवेली से जुडी विभिन्न कलाओं को भी इनके अति संक्षिप्त इतिहास व उनके कलाकारो के परिचय के साथ प्रस्तुत किया गया है। यह प्रविधि अपने आप में अनुकरणीय है।
पुस्तक में नगर चरित्र को प्रभावी बनाने वाली सभी महत्त्वपूर्ण हवेलियों के छायाचित्र भी दिये गये हैं। अंत में ९८७ हवेलियो की सूची भी दी गई है।
नगर के प्रमुख श्रेष्ठीगण की हवेलियो के बारे में विस्तार से बताया गया है। सबसे बडी बात यह है कि पुस्तक की भाषा आम बोल चाल की भाषा है। जिससे सम्प्रेषण में यत्किंचित भी बाधा नही पहुंच सकती ।
हलांकि यह ध्रुव सच है कि कोई काम अंतिम नही होता। अतः स्वाभाविक है कि इसमें भी कुछ त्रुटिया का परिहार होना रह गया है।।
फिर भी कुछ तथ्यात्मक भूलों एवं सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से जुडे पक्षों को छोड दिया जाय तो यह पुस्तक अपने आप में इसका पुष्ट प्रमाण है कि ’’जहॉ चाह वहा राह‘‘
पुस्तक का नामः हजार हवेलियो का शहर
लेखक गणः उपाध्यान चन्द्र कोचर
जिया उल हसन कादरी
प्रकाषकः कलाषन प्रकाशन, मार्डन मार्केट, बीकानेर
मूल्यः ३५०/-