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14
Sep
हिन्दी नहीं है राज्याश्रय की मोहताज.......
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Writer - Nirmala Sharmaविश्व का सबसे बडा लोकतांत्रिक देश भारत वर्ष बहुभाषा भाषी देश है। लगभग १०० से अधिक बोलियाँ इस देश में बोली जाती हैं किन्तु संविधान में स्वीकृत भाषाओं की संख्या १४ है। किसी भी स्वाधीन देश में राष्ट्र ध्वज, राष्ट्र गान और राष्ट्रीय वेश उस देश की प्रतीकात्मक पहचान है जब कि, राष्ट्रभाषा देश की शिराओं में प्रवाहित होने वाली उस जीवंत रुधिर धार की तरह होती है जिसका संबन्ध व्यक्ति की आत्मिक ऊर्जा और भावात्मक संवेदनों से होता है।
रक्त बुद्धि से अधिक बली है, और अधिक ज्ञानी भी
क्यों कि बुद्धि सोचती है और शोणित अनुभव करता है।
राष्ट्रभाषा के बिना जन-जन का न तो पारस्परिक संफ संभव है और न देशवासियों में एकता की भावना का विकास हो सकता है। भावात्मक एकता की बात करने वाले राजनीतिज्ञ न जाने क्यों इस बात को भूल जाते हैं कि विदेशी भाषा के माध्यम से स्वदेश और स्वदेशी के प्रति आत्मीयता का विकास आकाश कुसुम सूँघने की तरह ही होगा।
आजादी मिले आधी सदी से भी ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी आज हिन्दी की जो स्थिति है उसके लिए अंग्रेज या अंग्रेजी बिल्कुल जिम्मेदार नहीं है। अगर इसके लिए कोई सर्वाधिक जिम्मेदार है तो वह है अंग्रेजयत। जी हाँ अंग्रेजयत एक संस्कृति है, एक संस्कार है जो भारतीय जनमानस में बडे आकर्षण के साथ आधुनिकता और विज्ञान के नाम पर घर करती जा रही है। यही वह विष है जो हमारे जातीय संस्कार और गौरव बोध का हनन कर हमें अस्मिता शून्य बनाता जा रहा है।
हिन्दी के विकास, प्रचार-प्रसार और संवर्द्धन के लिए शासकीय सहायता,  प्रयत्न, प्रेरणा और अनुदान कभी भी प्रेरक नहीं रहे। विगत दो सौ वर्षों का इतिहास साक्षी है कि (१८वीं और १९वीं शताब्दी) हिन्दी शासकीय उपेक्षाओं के बावजूद अपनी आभ्यन्तर ऊर्जा से अपनी सार्वभौम लोकप्रियता से निरन्तर प्रगति पथ पर बढती रही है। राजाश्रय की उसने न तो कभी कामना की और न सहज रूप में राजाश्रय उसे सुलभ हुआ।
परतंत्रा भारत में हिन्दी की जो स्थिति थी उसे दयनीय नहीं कहा जा सकता। विदेशी व्यापारियों के सामने भारत में माध्यम का प्रश्न आरंभ से था और अंग्रेज, फ्रेंच, डच, पोर्तुगीज आदि सभी ने अपनी सूझ-बूझ से इसे हल किया था।
प्रसिद्ध भाषा शास्त्राी सुनीति कुमार चटर्जी ने अपनी पुस्तक में एक डच यात्राी जॉन केटेलर का उल्लेख किया है जो सन् १६८५ में सूरत में व्यापार करने के लिए आया था। भाषा माध्यम की समस्या उसके सामने भी थी। वह स्वयं डच भाषी था किन्तु सूरत के आस-पास व्यापारी वर्ग में जो भाषा बोली जाती थी वह हिन्दी गुजराती का मिश्रित रूप था और उसका व्याकरण हिन्दी परक था। अतः जॉन केटेलर ने डच भाषा में हिन्दी का प्रथम व्याकरण लिखा। सन् १७१९ में इसाई प्रचारक बैंजामिन शुल्गे मद्रास आया और उसने ’ग्रेमेटिका हिन्दोस्तानिक‘ नाम से देवनागरी अक्षरों में हिन्दी व्याकरण की रचना की। उसी समय हेरासिम लेवेडेफ नामक क्रिस्चन पादरी ने भाषा पंडितों की सहायता से शुद्ध और मिश्रित पूर्वी हिन्दुस्तान की बोलिय का व्याकरण अंग्रेजी में लिखा।
यह सब बताने का अभिप्राय यह है कि गुजरात और मद्रास जैसे अहिन्दी प्रदेशों में विदेशी विद्वानों ने भाषा ज्ञान के लिए एवं माध्यम भाषा के लिए जिन व्याकरण ग्रन्थों का निर्माण किया वे हिन्दी व्याकरण थे। अर्थात उस भाषा के व्याकरण थे जो दो सौ वर्ष पहले इस देश की लोकप्रिय सार्वभौम भाषा थी। उसका विकास किसी दबाव, लालच, शासकीय प्रबन्ध या प्रेरणा से न हो कर विकास की अनिवार्यता से आवश्यकतानुसार स्वयं हो रहा था।
विकासशीलता भाषा का प्राकृत गुण है। उसकी जीवन्तता का लक्षण है। जीवन के विविध व्यापारों की अभिव्यक्ति के लिए व्यवहार में लाई जाने वाली वह प्रत्येक भाषा जो अपना संसर्ग दूसरी भाषाओं से बनाए रखती है, और ज्ञान के नित नूतन संदर्भों से जुडती रहती है, वह अपनी जीवन्तता बनाए रखती है। अर्थात व्यवहार धर्मिता अैार गतिमयता- भाषा की प्रगति को सूचित करने वाली दो प्रमुख विशेषताएं हैं।
भाषा की प्रगति तब मानी जाती है जब एक ओर वह अधिक प्रौढ होती चलती है तो दूसरी ओर उसका प्रसार होता जाता है। पहली स्थिति उसके अर्थ गर्भत्व को संकेतित करती है और दूसरी उसकी व्यापक स्वीकृति को। पहली स्थिति में उसका अंतरंग विकसित होता है और दूसरी स्थिति में बहिरंग प्रोद्भासित होता है। दोनों के संयोग से भाषा समृद्ध और विशेष प्रभावशालिनी बनती है।
जब हम हिन्दी के विकासशील होने की बात कहते हैं तो उसका अभिप्राय भी यही है कि एक ओर उसका अन्तरंग विकसित हुआ है तो दूसरी ओर उसे व्यापक स्वीकृति भी मिली है। यों सामान्यतः यह अपेक्षा किसी भी भाषा से की जा सकती है किन्तु हिन्दी से इसकी विशेष अपेक्षा इसलिए है क्यों कि संविधान के अनुसार वह संघ की राजभाषा है और विभिन्न प्रदेशों के बीच संफ भाषा की भूमिका का निर्वाह उसे करना है। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि, हिन्दी किन दिशाओं म? और कितनी विकसित है और उसके विकास की क्या अपेक्षाएं हैं। हिन्दी उन अपेक्षाओं को कहाँ तक पूरा कर पा रही है, या फिर कौन से साधक या बाधक तत्व हैं और उनसे कैसे निपटा जाए?
भाषा के जिस द्विपक्षीय विकास की बात यहाँ कही गयी है उसे क्रमशः गुणात्मक विकास एवं संख्यात्मक विकास कहा जा सकता है। हिन्दी के पक्ष में संख्यात्मकता का बडा बल रहा है और आज भी है। किन्तु एकमात्रा उसी को आधार बना कर नहीं रहा जा सकता। गुणात्मक विकास ही उसके संख्यात्मक विकास का कारण रहा है। अतः आज भी हमें उसके गुणात्मक विकास की ओर अधिक सक्रिय और सजग रहने की आवश्यकता है। गुणात्मक विकास की भी दो दिशाएं हैं। १. ललित साहित्य सृजन  २. ज्ञानात्मक साहित्य की रचना और उसकी अभिव्यक्ति का विकास। आज जिस संदर्भ में हिन्दी पर विचार किया जा रहा है वह ललित साहित्य की प्रौढता को लेकर नहीं है।
राष्ट्र के समक्ष जो चुनौती है वह व्यावहारिक धरातल पर भाषिक सम्फ और उसके माध्यम से पारस्परिक सहयोग की भूमिका तैयार करने की है। नयी तकनीक, नये आविष्कार और विज्ञान की अनन्त उपलब्धियों और संभावनाओं को हमें अपनी भाषा के माध्यम से उजागर करना है। इस दिशा में भी यद्यपि प्रयत्न हो रहे हैं पर जितने और जिस गति से हो रहे ह वे पर्याप्त नहीं हैं। जिस भाषा को सदियों विदेशी भाषाओं के शासन ने दबोचे रखा, उससे एक दम से किसी चमत्कार की आशा नहीं की जा सकती फिर भी यदि प्रयास ईमानदारी से किए जाएं तो ५४-५५ वर्ष कम नहीं होते। इस दिशा में भौतिक चिन्तन एवं लेखन के साथ हमें अन्तर्राष्ट्रीय जगत से सम्फ बनाए रखना होगा। आज का युग अंतरावलम्बन का युग है। विकसित देशों में भी अपनी समृद्ध भाषा में लिखे गए साहित्य के अतिरिक्त इतरदेशीय भाषाओं में लिखे गए साहित्य से लाभ उठाया जाता है।
आज हम इंटरनेट के जरिए किसी भी देश के पुस्तकालय में प्रवेश पा सकते हैं। हिन्दी पत्रा-पत्रिाकाएँ भी इसके जरिए विश्व भर में आसानी से पढी जा रही हैं। अतः समस्त वातायनों को बन्द करके हिन्दी को सिंहासनारूढ कराने की बात हम नहीं कहते। हिन्दी की सम्पूर्ण प्रतिष्ठा के बावजूद ज्ञान-विज्ञान के नवीन स्रोतों की जानकारी के लिए समृद्ध भाषाओं के उपयोग की आवश्यकता पर कोई प्रश्नचि* नहीं लगाया जा सकता।
विधागत विशेष ज्ञान के प्रस्तुतीकरण के साथ-साथ हिन्दी को अन्तर्देशीय व्यवहार की भाषा के रूप में भी पनपना और विकसित होना है। पारस्परिक व्यवहार के अपने तकाजे होते हैं। भाषा के संदर्भ में ये तकाजे उसकी रूप रचना से सम्बन्ध रखते हैं। यहां रूप रचना से अभिप्राय भाषा की शब्द सम्पदा, पारिभाषिक शब्दावली का गठन, अभिव्यक्ति की सरलता या बोधगम्यता, तथ्यपरकता, लाघव और विषय संबद्धता से है। व्यावहारिक धरातल पर व्यवहृत होने वाली किसी भी भाषा को इन्हें या ऐस ही अनेक तत्वों को अपने में समाहित करना पडता ह। इस संदर्भ में यह स्पष्ट करना समीचीन होगा कि व्यावहारिकता का अर्थ भाषा की स्वच्छन्दता या मनमाना प्रयोग नहीं है। व्यावहारिक और मानक भाषा में कोई अन्तर्विरोध भी नहीं है। व्यवहार दृष्टि से किसी भी भाषा की तैयारी का अर्थ है- उसके मानक रूप का सर्वसुलभ और सहज बोधगम्य रूप में तैयार होना। व्यवहार भाषा के रूप में हिन्दी की श्रेष्ठता और सिद्धता का आधार है उसकी शब्द सम्पदा।
किसी भाषा की शक्ति और सम्पन्नता केवल इस बात पर निर्भर नहीं होती कि वह अपने शब्द कोष में कितने शब्द संभाले हुए है बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि उसमें नवीन शब्दों के निर्माण की कितनी क्षमता और शब्दों को आत्मसात करने की कितनी उदारता है। हिन्दी में ये दोनों ही विशेषताएं विद्यमान हैं। मध्यकालीन कवियों ने अरबी-फारसी के न जाने कितने शब्दों को न केवल अपनी भाषा में खपा लिया बल्कि उन्हें हिन्दी की प्रवृत्ति के अनुसार ढाल भी लिया था। यह क्रम चलता रहना चाहिए था।
हिन्दी की मौजूदा स्थिति निराशाजनक तो कदापि नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि भाषागत राजनीति में न उलझ कर हिन्दी को अपने हित के लिए दृढता से उस नीति का अनुसरण करना होगा जिससे वह और अधिक समृद्ध और सशक्त होती जाए और उसकी सर्वग्राह्यता बनी रहे।

(डॉ. निर्मला शर्मा)

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