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हिरणा रे किसना गोविन्दा प्रहलाद भजे...
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27 May 2010 Add comment Mail
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बीकानेर में आज नृंसह चतुर्दशी का त्यहार पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। शहर के लखोटिया चौक सहित डागा चौक, दुजारियों की गली, लालाणी व्यासों का चौक व नत्थूसर गेट के बाहर नृसिंह लीलाऍं आयोजित की गई और शाम ढलते ही भगवान नृसिंह ने हरिण्यकश्यप का वध कर दिया।

परम्पराओं व आस्थाओं के शहर बीकानेर में यह आयोजन पिछले सैंकडों सालों से हो रहा है। इस आयोजन की शुरूआत शहर के लखोटिया चौक से हुई। कहा जाता है कि शहर के डागा व लखोटिया जाति के लोगों ने इस मेले की शुरूआत करीब साढे चार सौ साल पहले की थी। इस जाति के लोग व्यापार व्यवसाय का काम करते थे और वर्तमान में जहाँ लखोटिया चौक है वहाँ पर आकर रूकते थे। कहा जाता है कि यहाँ पर एक सरोवर था और पास ही के एक टीले पर मंदिर था। उन्होंने इसी सरोवर के पास स्थित मंदिर में भगवान नृसिंह की प्रतिमा स्थापित की और इस मेले की शुरूआत की। लखोटिया चौक में जो मेला आयोजित किया जाता है वहाँ पर भगवान नृसिंह का एक मुखौटा और हरिण्यकश्यप के दो मुखौटे हैं। पहले दोपहर में कोई कम उम्र का व्यक्ति या लडका हरिण्यकश्यप बनकर पूरे शहर में घूमता है और फिर शाम को दूसरा व्यक्ति नृसिंह लीला के समय हरिण्कश्यप बनता है। जो पहले मुखटा काम में लिया जाता है उसका वजन करीब पंद्रह किलो है और जो शाम को मुखौटा काम में लिया जाता है उसका वजन करीब सात किलो है। उस समय के डागा व लखोटिया जाति के लोग वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित मुल्तान शहर में व्यापार के लिए जाया करते थे और वहीं से ये मुखौटे बनाकर लाए गए है। बाद में आपसी विवाद के कारण इस मेले से डागा जाति के लोग अलग हो गए और अपने डागा चौक में जाकर नए मंदिर की स्थापना की और वहाँ पर भी इसी दिन इस मेले की शुरूआत की जो आज तक जारी है। इसी प्रकार शहर के दुजारी गली व लालाणी व्यासों के चौक सहित नत्थूसर गेट के बाहर भी इस मेले का आयोजन श्रद्धा के साथ किया जाता है। नत्थूसर गेट पर रंगा ठाकुर के निर्देशन में पिछले करीब तीस साल से इस मेले का आयोजन किया जा रहा है।
कहा जाता है श्रषि विश्रवा और माता अदिति के दो संताने थी एक हिरण्याक्ष और दूसरा हरिण्यकश्यप । दोनों में अत्यंत बल था जिसके कारण व मानव जाति को सताते थे। हिरण्याक्ष का वध तो वामन अवतार में भगवान विष्णु ने किया और जब से अपने भाई की मौत के बाद हरिण्यकश्यप विष्णु भगवान को अपना शत्रु मानने लगा। इसी हरिण्यकश्यप ने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की और ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया कि हरिण्यकश्प को कोई मानव न पशु मार सकता है और न रात में और न दिन में कोई मार सकता है न वह अस्त्र से मर सकता है और न शस्त्र से । ऐसा वरदान प्राप्त कर हरिण्यकश्यप पूरे संसार में उत्पात मचाने लगा लेकिन उसी के पुत्र प्रहलाद ने भगवान विष्णु की भक्ति की जो उसके पिता को पसन्द न आई। अपने पुत्र को मारने के कईं यत्न उसने किए और अंत में एक खम्भे से भगवान नृसिंह ने अवतार लिया जो नर व सिंह दोनों रूपों में थे और इस अवतार ने न दिन को और न रात को मतलब संाझे ढलते वक्त गोधूली बेला में हरिण्यकश्यप का वध कर अपने भक्त की रक्षा की।
इसी लीला का मंचन बीकानेर शहर में पिछले सैंकडों सालों से हो रहा है। आस्थाओं के शहर बीकानेर में यह परम्परा आज भी बडी भक्ति व श्रद्धा से निभाई जाती है और इस नृसिंह लीला को देखने के लिए हजारों का जन समूह इन स्थानों पर उमडता है और सयह सिद्ध करता है कि आज भी धर्म नगरी बीकानेर के लोग अपने संस्कारों व परम्पराओं से गहरे जक जुडे ह
गौर करने वाली बात यह भी है कि इस तरह की नृसिंह लीला का आयोजन भारत भर में बीकानेर सहित उत्तरप्रदेश के कुछ जिलों में ही होता है। बीकानेर के लोग जो वर्तमान में कलकत्ता में रहते हैं वे भी बांसतल्ला स्थित भैरव मंदिर में आज के दिन इस लीला का आयोजन कर ते ह ।
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| thanks bhaiya , raja (2010-06-05 12:49:37) |
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Dear Ranga Ji, Nice discripration of Narshing Chaturdasi. Its most popular factival in the Bikaner Nagari & I see u in a very harmfull writer. Your artical is good job in your life. GO A Head., Narendra Ranga (2010-05-31 20:14:29) |
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Dear raga ji your artical vary good i like bkn haritage , Raju mohta (2010-06-06 18:59:32) |
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| the sound of pure culture of INIDAn religions, yogendra kumar purohit (2010-05-29 22:42:24) |
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traditional bikaneri festival. which joints the community. article has touch all the aspects of festival & it's reason. nice written, jai purohit (2010-05-30 00:54:48) |
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nice discripration of narshing chatudasi your artical very good jija ji, balmukand vyas (2010-06-28 13:24:24) |
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| thanks very good collection ya bbat lakhotiya chowk wala ko bhi nahi pata thanks..., muna rathi (2010-08-15 01:07:07) |
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HAMARE SARE PARIWAR KE LOG NARSINGH BHAGWAN KI HI PUJA PATH KARTE HAI. OR SAALO HAMARE BAAP DADA BHI YAHI KARTE THE HUME NA OR BHI PHOTO CHAHIYE BHAGWAN KI HUME BAHOT ACHHA LAGA KI NARSINGH BHAGWAN KO KOI OR BHI ES TARAH SE BHAKTI KARTE HAI. FROM : YOGESH PARMAR, KADI , Yogesh parmar (2010-10-27 12:53:15) |
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प्रिय रंगा जी आपके लेख पढे, बीकानेर के जन जीवन की कहानी कहते हैं ..मुझे ऐसा लगा इनका महत्व बीकानेर के लोगों के लिए कम और दूसरे लोगों के लिए अधिक होगा बीकानेर की उन्मुक्त ,स्वच्छंद संस्कृति को जानने के लिए ..भाषा की और परिपक्वता आलेखों की अध्ययनशीलता बढ सकेगी ..शुभकामनाएं , pankaj goswami (2011-01-21 08:39:41) |
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| thanx, and i am really very sorry about myself that i checked it too late, kedar upadhyay.kolkata (2011-02-20 09:25:41) |
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| thanx, and i am really very sorry about myself that i checked it too late, kedar upadhyay.kolkata (2011-02-20 09:25:44) |
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