Saturday, 24 August 2019
khabarexpress:Local to Global NEWS

स्वर्णनगरी में होली के दिन बादशाह व जिंदा-जिंदी के स्वांग रचने की चली आ रही है परंपरा


स्वर्णनगरी जैसलमेर में होली का त्यौहार अपनी अनूठी परंपराओं के चलते काफी लोकप्रिय है। स्वर्णनगरी में होली की धूम फाल्गुन शुक्ला एकम से चैत्र कृष्ण एकम तक चलती है। गेरियों की ग्यारस से निकलने वाली गेरों की धूम तथा नगर अराध्य लक्ष्मीनाथ में फाग की धूम के साथ ही धूलंडी के दिन दो निराली परंपराओं का निर्वाह अभी भी हो रहा है। एक तरफ भगवान शंकर और पार्वती का स्वांग तो दूसरी तरफ दुर्ग के व्यासा पाड़ा में सजता है बादशाह का दरबार। 

दुर्ग में सजता है दरबार
होली पर बादशाह का दरबार सजाने की एक दिलचस्प परंपरा है। सोनार दुर्ग के व्यासा पाड़ा में व्यास जाति के पुष्करणा ब्राह्मण ही होली पर बादशाह बनते है। इतिहासकार नंदकिशोर शर्मा बताते है कि इस संबंध में प्रचलित कथा के अनुसार महारावल लक्ष्मण के काल में पंजाब का एक ब्राह्मण रामरक्ष दिल्ली से भागकर जैसलमेर राज्य में शरण मांगता है। व्यास जाति का वह ब्राह्मण पेशे से वैद्य था। उसने दिल्ली के तत्कालीन बादशाह के साध्य रोग का इलाज किया था। इससे प्रसन्न होकर बादशाह अपनी पुत्री की शादी उससे करना चाहता था। इस शर्त पर रामरक्ष राजी न था और वहां से भाग निकला। जैसलमेर के महारावल से उसे सम्मान देकर यहां के कुल पुरोहित की पुत्री से शादी भी करवा दी। जब यह संदेश बादशाह तक पहुंचा तो रामरक्ष को पकडऩे के लिए जैसलमेर में सैनिक भेजे। संयोग से उस दिन धूलंडी थी। महारावल को विवाद टालने का बहाना मिल गया। उसे होली के स्वांग के रूप में बादशाह बनाकर बिठा दिया गया। जिससे संतुष्ट होकर सैनिक वहां से चले गए। रामरक्ष के एक पुत्र भी था उसे शहजादा बना दिया गया था। उसी दिन से होली के अगले दिन बादशाह का दरबार सजाने की परंपरा चल पड़ी।

बादशाही बरकरार-शहजादा सलामत
धूलंडी के दिन व्यासा पाड़ा में समस्त लोग एकत्र होकर सर्व सम्मति से बादशाह व शहजादे का चुनाव करते है। जिसके बाद व्यासा पाड़ा में बादशाह का दरबार सजाया जाता है। दरबार सजने के बाद बादशाह व शहजादे को पालकी पर बिठा कर व्यासा पाड़ा से जैन मंदिर, कुंड पाड़ा होते हुए सवारी निकाली जाती है। रास्ते में लोगों द्वारा बादशाह का स्वागत किया जाता है। इस दौरान बादशाह पर कोई भी गुलाल नहीं छिड़कता है। साथ ही बादशाही बरकरार व शहजादा सलामत का जयघोष किया जाता है। कालांतर में इसके साथ बादशाह बनने वाले को पूरी जाति को गोठ(पार्टी) देने की परंपरा जुड़ गई लेकिन वह आवश्यक नहीं है। 

जिंदा-जिंदी का करते है पूजन 
एक तरफ दुर्ग में बादशाह का दरबार सजता है वहीं दूसरी तरफ नगर के चैनपुरा मौहल्ला में जिंदा जिंदी का स्वांग रचाया जाता है। गिरधर लाल पुरोहित ने बताया कि धूलंडी के दिन दो युवकों को जिंदा-जिंदी बनाया जाता है। जिन्हें शिव व पार्वती का रूप माना जाता है। जिंदा-जिंदी के साथ ही चैनपुरे की गैर निकलती है जो पहले पूरे मौहल्ले में घुमती है। हर परिवार द्वारा उनका पूजन किया जाता है तथा गैरियों द्वारा हालरा(खुशी व उल्लास के गीत) गाए जाते है। साथ ही गोठ के लिए सहयोग राशि भी एकत्र की जाती है। 
चैनपुरे की गैर दुर्ग से आने वाली लक्खूबीरे की गेर के साथ मिलकर महारावल के निवास पहुंचती है। वहां से चैनपुरे व लक्खूबीरे की गेर दुर्ग स्थित लक्ष्मीनाथ मंदिर जाती है जहां लक्ष्मीनाथजी के हालरा गाने के बाद गैर समाप्ति की घोषणा होती है। इसी के साथ धूलंडी का त्यौहार भी खत्म होता है। 

खो गया होली का धमाल
जैसलमेर प्रकृति के श्रृंगार के लिए हर ओर पुष्प मंजरी, वसंत की अंगड़ाई, पछुआ हवा की सरसराहट फाल्गुन का स्पष्ट संकेत दे रही है। प्रकृति ने अपना नियम तो नहीं बदला, लेकिन आधुनिकता की दौड़ में हमारी परंपराएं जरूर निढाल हो गई हैं।
फाल्गुन महीने में पहले शहरों से लेकर गांवों तक में फाग गीतों की धूम मचती थी, लेकिन अब फाग का राग शहरों में ही नहीं, गांवों की चौपालों से भी नदारद हो गया है। महाशिवरात्रि पर्व के गुजरने के बाद ही इस मौसम मेंचंग , ढोल, मंजीरे और करताल की ध्वनि के बीच फगुआ के गाने शुरू हो जाते थे। लेकिन अब ये नदारद है। यही नहीं, पहले जैसे लूर नृत्य फाग और सामूहिक गाने की भी परंपरा दम तोड़ रही है।
कई लोग इसका कारण समाज में बढ़ते बैर, भेदभाव, कटुता और वैमनस्य को मानते है तो कई लोग आधुनिक जीवनशैली और पश्चिमी संस्कृति का हावी हो जाना मुख्य कारण बताते है।जैसलमेर शहर में विभिन्न समाजो की गैर निकलती थी उससे पहले ठाकुरजी और लक्ष्मीनाथ बाबे की गैर निकलती थी .सामूहिक गैरो के प्रति सामान उत्साह युवा और बुजुर्गो में होता था .गैरियो की टोलियाँ जब अशुद्ध फाग गाती थी तो सुनाने वालो की भरी भीड़ उमड़ पड़ती थी.

जैसलमेर के प्रसिद्ध फाग गायक फकीरा खान  बताते है कि प्रेम सौहार्द के पर्व होली में लोग दुश्मन के भी गले लग जाते थे। यह परंपरा समाज के दरके रिश्ते को जोड़ने में काफी सहायक होती थी। वह कहते है कि होली पहले एक दिन का त्योहार नहीं था, यह एक महीने तक चलने वाला त्योहार था, जिसमें बाहर रहने वाले लोग भी आकर शामिल होते थे।
पूरे गांव के लोग एक जगह चोगान पर एकत्रित हो जाते थे और फिर होली के हुड़दंग में मस्त हो जाते थे। हर गांव में एक महीने तक ढोल और मंजीरे बजते थे। लेकिन अब एक-दूसरे में सामंजस्य का अभाव, गायकों के कद्रदानों की कमी, एक -दूसरे के बीच बढ़ता वैमनस्य सहित कई कारणों से हमारी यह पुरानी परंपरा दम तोड़ रही है। सच तो यह है कि हमारी युवा पीढ़ी फगुआ गीतों की लय, सुर, ताल भी भूल गई है।
होली के एक माह पूर्व ही जोगीड़ा के लिए एक पुरुष का चयन कर उसे नर्तकी के वेश में सजाया जाता था। स्त्री वेशधारी वह पुरुष लोगों के बीच फाग गायकों के बोल पर नृत्य करता था। चौधरी कहते है कि फाग गीतों में पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, देवर-भाभी के रिश्तों में हास्य-पुट तो दिए ही जाते है, धार्मिक गीतों का भी समावेश किया जाता है। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। केवल होली के दिन ही कहीं-कहीं ढोल बजते है। फगुआ के बाद चैती गीत गाने की भी परंपरा थी।
फगुआ के मौके पर डेढ़ ताल, चौताल, बेलवरिया गीत गाए जाते थे, लेकिन अब गायन की यह परंपरा टूटती जा रही है। अब इनकी जगह फूहड़ गीतों पर डांस करते युवक नजर आते है। गांव के बुजुर्ग कहते है कि पहले गांवों की चौपालों से निकाले जाने गैरों में बुजुर्ग से लेकर युवा तक शामिल होते थे। इसके माध्यम से समाज के लोग एकता के सूत्र में बंधे होने के संकेत भी देते थे।हिली और धुलंडी के  सामूहिक फागियो की सामूहिक गैर निकलती थी  फाग गाते हुए महारावल के यंहा जम कर फाग गाते और उनसे होली की गोठ लेते.
बुजुर्ग कहते है कि युवा पीढ़ी तो इन परंपराओं से ही अनभिज्ञ है। जैसलमेर  के बुजुर्ग एवं संगीत के जानकार मंगल सिंह भाटी  कहते है कि कुछ दशक पहले तक रईसों और जमींदारों के यहां होली के मौके पर ध्रुपद-धमार की महफिलें जमती थीं। ध्रुपद शैली में गाई जाने वाली संगीत विद्या 'धमार' वस्तुत: होरी ही है।
वह कहते है कि अब न लोगों के पास समय है और न ही अपनी परंपराओं को जीवित रखने की ललक। धमार का अर्थ ही होता है, जो फड़कता हुआ, प्रेरित करता हुआ चले। अब न ध्रुपद-धमार की महफिल ही जमती है और न ही फगुआ की मस्ती ही दिखाई देती है।भाटी  कहते है कि पूर्व में जहां होली पर पूरे गांव के लोग एकत्र होकर पर्व मनाया करते थे, लेकिन अब यह पर्व अन्य पर्वो की तरह परिवारों तक सीमित होकर कर रह गया है।