होली का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता हैं । होली से आठ दिन पहले से होलाष्टक प्रारम्भ होते हैं । होलाष्टक के दिनो में कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित हैं ।
होली एक सामाजिक पर्व हैं । यह रंगो का त्यौहार हैं । इस पर्व को सब वर्ण के लोग आपस का भेदभाव मिटाकर बडे उत्साह से मनाते हैं । इस दिन सांयकाल के बाद भद्रा रहित लग्न मे होलिका दहन किया जाता हैं । इस अवसर पर लकडयो तथा घास फूस का बडा भारी ढेर लगाकर होलिका पूजन करके उसमे आग लगाई जाती हैं ।
प्रतिपदा, चतुर्दशी, भद्रा तथा दिन में होली दहन का विधान नही है पूजन के समय निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते हैं -
अहकूटा भयत्रस्तैः कूतात्व होली बालिशैः।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम ।।
विधानः एक माला, गन्ना, पूजा की सामग्री (जल, मौली, रोली, चावल, फूल, गुलाल,गुड)
जल का लोटा, नारियल, बूट (कच्चे चने की डाली) पापड आदि से जिस स्थान पर होली जलाई जाती हैं । होली का पूजन करें ।
कथाः इस पर्व का विशेष सम्बन्ध भक्त प्रह्वाद से है। हिरण्यकशिपु ने प्रह्वाद को मारने के लिए अनेक उपाय किए पर वह उसे न मार सका । हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था । हिरण्यकशिपु ने लकडयो के ढेर मे आग लगवाई । और प्राह्वाद को होलिका की गोद में देकर अग्नि में प्रवेश करने की आज्ञा दि । होलिका ने अग्नि में प्रवेश किया परन्तु भगवान कि कृपा से होलिका जल गई और भक्त प्राह्वाद बच गया । तभी से भक्त प्राह्वाद की स्मृति में तथा आसुरी प्रवृति के नाश हेतु इस पर्व को मनाते हैं ।
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