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और कुछ नही तो - ऑर्कुट

10 Jul 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

इंटरनेट प्रेमियों के लिए ‘ऑर्कुट’ आज एक जाना पहचाना नाम बन गया है जो एक ‘ Social Site' के तौर पर हिन्दुस्तानी युवाओं के बीच मित्रता का नया ठिकाना कहा जा सकता है। महज कुछ ही सालों में इसकी बढ़ती लोकप्रियता को समझने के लिए कुछ ही दिन पहले मेरे एक मित्र ने मेरी असाधारण सी मदद की। उसने भी ऑर्कुट में अपनी Profile बना रखी है और हर चार-पांच दिन में वह Profile का शीर्षक भी बदलता रहता है। वैसे अपनी पहचान को बदलते रहने का यह एक अच्छा बहाना है। कुछ दिन पहले उसने अपने नाम की जगह उसने शीर्षक लिखा ‘औरकुछ नहीं तो ऑर्कुट’। खैर, मैंने तुरंत इसके लिए उसे धन्यवाद तो भेज दिया लेकिन मेरी परेशानी का उसके बाद कोई ठिकाना नहीं रहा।

इस शीर्षक के पीछे कुछ गहरे निहितार्थ छिपे हैं जिससे आज की सामाजिक छिन्न-भिन्नता और रिश्तों में आये बदलावों को समझने में मदद मिल सकती है। रिश्ते समाज की गलियों से निकलकर एक मायावी (इंटरनेट) दुनिया में प्रतिष्टापित हो चुके हैं और हमारे बुजुर्ग उनके निशान घर के आंगन में तलाशते-तलाशते थक रहे हैं।

दरअसल, तकनीक के नासमझी भरे उपयोग के कारण हमारा सामाजिक धरातल और उसकी जरूरतें हमने कहीं और shift कर दी हैं। अपने आस पास के समाज और माहौल में जीने से हम बचने लगे हैं और लगता है कि वो सुख जो हम अपने लोगों के बीच से नहीं ले सकते वह हमें मोबाइल, इंटरनेट, एफ.एम., आई-पोड वगैरह-वगैरह की दुनिया से मिल जाएगा। इस दौड़ में हम कब अपने आप से ही कट गये इसका भी होश नहीं रहा। बड़े शहरों में सीटी बस, गाड़ियों व कारों में आप यह दृश्य आसानी से देख सकते हैं। इनमें से अधिकांश युवा कानों में ईयर फोन लगाये हुए या तो गाने सुन रहे होते हैं या फिर किसी से बात करने में मशगुल सही मायने में तो हम वहां होते ही नहीं केवल शरीर ही हिल डुल रहा होता है। आस-पास के सैकड़ों लोगों, उनके कपड़े, भाषा व व्यवहार इत्यादि से बिल्कुल दूर एक नयी दुनिया में केवल दो लोग। इस कारण धीरे धीरे हमारा Sense of Observation तो मानो शुन्य सा होने लगा है। हमारे समाज की अच्छी चीजों और उसके सौंदर्य को देख पाने का (न ही किसी खराब चीज को पहचानने का) Aesthetic Vision हमारे पास बचा है।

'औरकुछ नही तो ऑर्कुट' टाइटल भी मेरे 20 वर्षीय मित्र ने ही भेजा है। क्या हम आज अपने समाज की यह कल्पना करें कि हमारे 20 साल के नौजवानों के पास करने के लिए कुछ नहीं बचा है। उसकी सारी उर्जा महज अपनी प्रोफाइल में 500 नये मित्रों को जोड़ने में चली जाए और उसकी गली के दोस्त उसकी घर से बाहर निकलने की प्रतीक्षा करते रहें? हमारा देश और यहां के लोग विदेशों से रोज नयी तकनीक की वस्तुएं तो ले आयेगें लेकिन उन तकनीकों का इस्तेमाल करने का विवेक कहां से लायेगें? ‘ऑर्कुट’ पर रिश्ते रहें लेकिन गली और परिवार के रिश्तों की कीमत पर कतई नहीं। यहां मुझे एच.एच. दलाई लामा की प्रसिद्व कविता The Paradox of Our Age की पंक्तियां याद आ रही है-

We have bigger houses but smaller families;
more conveniences, but less time; We have more degrees, but less sense;
more knowledge, but less judgement;
more experts, but more problems;
more medicines, but less healthiness;
We've been all the way to the moon and back, but have trouble crossing the street to meet the new neighbour.
We built more computers to hold more information to produce more copies than ever, but have less communication;
We have become long on quantity, but short on quality.
These are times of fast foods but slow digestion;
Tall man but short character;
Steep profits but shallow relationships. It's a time when there is much in the window, but nothing in the room.



Comments to this Article
very nice artical sir, umakant purohit (2009-11-14 22:59:27)

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