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इक्कड बिक्कड बम्बे बो, अस्सी नब्बे पूरा सौ.........
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11 May 2010 Add comment Mail
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to Editor Other Articles By This Writer |
कहाँ गया वो बचपन, छिन गया वो बचपन
ये वो शब्द है जो आजकल गली मौहल्लों में सुनने को नहीं मिलते है। इन शब्दों के साथ बच्चों का बचपन निकलता था और बच्चे इस तरह के सैकडों शब्दों के साथ अपना बचपन भरूपर जीते थे। आजकल ये शब्द सुनने को नहीं मिलते हैं। हमने विकास के साथ क्या पाया और क्या खोया कि अगर गणना करें तो बच्चों के हिस्से से हमने उनका बचपन छीन लिया है और उनके बचपन को हमने यांत्रिक बचपन बनाकर रख दिया है। याद करो वो दिन जब आप और हमारे जेसे बच्चे सुबह और शाम को अपने महल्ले में टोलियाँ बनाकर घूमा करते थे और दुनिया भर की चिंता से मुक्त होकर खुले आसमान में कभी गिल्ली डंडा खेला करते थे तो कभी किसी बाग में लुका छिपी का खेल खेलकर अपने साथियों को ढढा करते थे। बचपन की वो यादें आज भी हमारे जेहन में ऐसे ताजा है कि उनको याद कर हम आज भी खुद को तरोताजा महसूस करते है।
एक समय था जब बचपन खेल खेल में निकल जाता था और बचपन का मतलब ही खेल खिलौनों से लगाया जाता था। हर गली मौहलले में बच्चों की टोलियाँ अलग अलग खेल खेला करते थे। कोई लुका छिपी खेलता तो कोई पकडा पकडी, गिल्ली डंडा का खेल तो बच्चों का सबसे प्रिय खेल हुआ करता था। इसी के साथ लंगडी खेलना, लहे और लकडी का खेल खेलना, पेल दूज का खेल, धाड धुक्कड का खेल, गुड्डे गुड्डियों की शादी करना आदि आदि बहुत से ऐसे खेल थे जिनके माध्यम से बच्चे खेल खेल में बडे होने के साथ ही समाज की सामाजिकता को सीखते थे।
याद करो वो अपने शहर में बारिस का आना और वो कागज की कशितयाँ बनाकर पानी में छोडना और उस कश्ती के पीछे पीछे जब तक जाना जब तक कि वह कश्ती दम न तोड दे । याद करो वो तेज ऑंधियों में कागज से बनी पतंगों को उडाना और आनन्द लेना। कितना खुशगवार होता था वह सब । कितना शानदार और यादगार रहा है हमारा बचपन । पर आज के बच्चों के नसीब में यह बचपन नहीं है, उनके पास कम्प्यूटर है, टीवी है, विडियोगेम है और आधुनिक साजो सामान के बने यंत्र है खिलौने है पर नहीं है तो कश्ती वो पतंग और वो अल्हडपन और वो बचपना।
वर्तमान परिदृश्य पर गौर फरमाए तो हमें पता चलता है कि हमने विकास की इस दौड में बच्चों से बचपन छिन लिया है और उनके सिर पर स्कूल के बैग का इतना बोझ डाल दिया है कि आजकल के बच्चों की अल्हडता और नाजुकता इन बस्तों को बोझ में दब कर रह गई ह। आज किसी भी गली मोहल्ले में बच्चे आपको खेलते नजर नहीं आएंगे। आजकल का बच्चा टीवी के सामने सीरियल देखता है, कार्टून की फिल्म देखता है, टीवी फिल्म देखता है और गेम्स पीरियड में थोपा हुआ गेम खेलकर अपनी दिनचर्या पूरी करता है।
क्या यह स्थितियाँ बच्चों के लिए लाभदायक है। इस पर गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है।
पिछले दौर में गली मौहल्ले में खेलकर बच्चा साामाजिकता सीखता था आपस में मिलकर रहना, पडौसी से प्रेम, भाईचारा और समाज में रहने का तरीका सीखता था। वह खेल खेल में अपने पूरे मौहल्ले और पडौसी को जान जाता और वह बच्चा पूरे मौहल्ले का बच्चा माना जाता था। आज जो सामाजिक स्तर गिरा है और नैतिकता में जो कमी आई है और व्यक्ति ने स्व की कोटर में रहना सीखा है इसका मूल कारण एक यह भी है कि हमने बच्चों को उनके स्वाभाविक खेलों से दूर कर लिया। हमने उसको एकाकीपन से भरे खेल दिए जिन्हे खेलकर वह स्वयं एकाकी होता जा जाता है उसे पता नहीं कि पडोस में कौनसा उसकी हमउम्र का बच्चा रहता है और उसको उससे दोस्ती करनी है। उसे यह तो पता है कि आज किस कार्टून चैनल पर कौनसा सीरियल आएगा और आईपीएल खेलों का कलेण्डर क्या है लेकिन वह यह नहीं जानता कि उसका मौहल्ला कितना बडा है और उसमें कौन कौन रहते हैं। कम्प्यूटर पर बैठकर दुनिया भर की खबर रखने के चक्कर में वह अपने पडौस से अनजान रह जाता है। जिन खेलों के माध्यम से पूरे समाज में उसका प्रवेश होना था वह द्वार अब उसके पास नही रहा है और यही कारण है कि मौहल्ले का होने वाला यह बच्चा अब शर्मा जी, वर्माजी, सक्सेनाजी का बच्चा होकर रह गया है।
खेल जीवन में अनुशासन तो सीखाते ही है साथ ही साथ खेलों के माध्यम से बच्चे के व्यक्तित्व का भी विकास होता है। लेकिन बंद कमरे में विडियोगेम पर खेले जाने वाले खेलों के माध्यम से आजकल के बच्चे ने अपने बचपन को खो दिया है और वह बच्चा बडा होकर अपने ही समाज में अकेला महसूस करता ह।
आप इमानदारी से अपने आस पास के घर परिवार के माहौल पर नजर डाले और अपने आप के बचपन से अपने आज के बच्चे के बचपन की तुलना करें तो शायद जो बात में कहना चाह रहा ह वह अपने आप आफ समझ में आ जाएगी।
जरूरत है आज के बच्चे को स्व की कोटर से निकाल कर सामाज के उस पटल पर रखने की जहाँ समग्र समाज उसे अपना परिवार लगे और वह अपने बचपन से ही वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के साथ बडा हो और एक जिम्मेदार नागरिक बने ।
किसी कवि की कही ये पंक्तियाँ के साथ मैं अपनी बात को विराम देना चाहुंगाः -
ये दौलत भी ले लो,
ये शोहरत भी ले लो,
भले छिन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो
वो बचपन का सावन
वो कागज की कश्ती
वो बारिस का पानी.........
श्याम नारायण रंगा
पुष्करणा स्टेडियम के पास, बीकानेर |
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| Comments to this Article |
SAHI RAHI RANGA G AAJKAL BACHHO KO TO MAJDUR BANA DIYA HAI UNKA BACHPAN KHO GAYA HAI MA BAAP APNI PRATHISTHA KE LIYE BACHHO KO BADI BADI SCHOOL ME ADMISSION KARWA DETE HAI OR AAJKAL KE IS COMPUTER YUG NE BACHHO SE BACHPAN CHHEEN LIYA HAI ACHHA LIKHA HAI , SATYENDRA (2010-05-17 13:17:20) |
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sir aapne bilkul sahi kaha hai maine bhi bahut games khele hai par ab kids najar he nahi aate bahar mere apne ghar me bhi yahi haal hai, Anamika (2010-05-16 11:23:43) |
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| It is Simply Fantastic., Pankaj Ojha (2010-05-17 08:47:21) |
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| SUMMARY : "CHILDHOOD" NEVER COMES BACK., Dr.Vipin Kumar Pareek (2010-05-14 22:07:29) |
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| good one ..., Guddi Vyas (2010-05-14 22:16:57) |
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mirror of kids life.. in contemporary time.., yogendra kumar purohit (2010-05-14 22:21:22) |
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Mr. Aditya guy u r awesome , kya likhe hain good on par
Good Essay , ANUP SHARMA (2010-05-14 11:25:30) |
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| good article, manish kumar joshi (2010-05-14 11:37:57) |
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| Wel said Aditya, very nice thoughts........ children should be allowed to enjoy their life to the fullest extent...., Anindita Upadhyay (2010-05-14 10:51:29) |
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To Say the Least :-
GOOD THINGS COME IN SMALL PACKAGE , SO ENJOY AND LET UR CHILDREN ENJOY THEIR CHILDHOOD , AND AGAIN TECHNOLOGICAL PROSPERITY IS NOT MAKING THE CHILD FACE THE ADVERSITY TO THE PERFECTION WHICH IS THE SOUL AND BRINGS BEAUTIFUL INNOCENCE TO THE CHILDHOOD AND THUS THEY ARE ALOOFED FROM REAL ENTERTAINMENT OF THE SAID PERIOD , THUS LET THEM FREE AND ALLOW THEM TO ENJOY THIS LITTLE TIME ........
AS IS VERY POPULARLY SAID :- No one has yet realized the wealth of sympathy, the kindness and generosity hidden in the soul of a child. The effort of every true education should be to unlock that treasure. SO LET FREE THE CHILDREN AND ALLOW THEM TO ENJOY THEIR CHILDHOOD
@dity@ , ADITYA PUROHIT (2010-05-14 10:34:37) |
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| BUT USE SOCHKER EK YAAD RAH JATI HAI. KABHI HUM BHI BACCHE THE. , ASHOK (2010-05-22 17:14:00) |
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| US WQAT KAY PATA THA KI FUTURE ME ITNI POPPLUTION KE SATH YE TENSION AANE WALI HAI. AUR AAJ MAA -BAP BACCHE KO PEHLE HI FUTURE DIKHA DETE HEIAN MERE BHI. THBI TO BACHAPAN BACHAPAN NA RAHKER HALAAT BAN JATI HAIN, Ashok (2010-05-22 17:12:19) |
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| PLEASE GIVE US MOTE INFORMATION ABOUT BIKANER AND RAJASTHAN YOU WRITTING IS VERY IMPRESSIVE AND ATTRACTIVE THANKS FOR IT AND PLESE CONTINUE WRITE ARTICLE FOR US , ASHOK MODI (2010-07-26 13:59:48) |
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| बीकानेर के बारे में अच्छी जानकारी इसके लिए धन्यवाद बीकानेर राजधराने के बारे जानकारी दे, b.l.sethia (2010-05-28 17:13:56) |
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| nice ranga g nice very nice article. it make me in childhood thaks very very thanks for it , ravi shankar acharya (2011-02-20 11:11:47) |
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ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छिन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन वो कागज की कश्ती वो बारिस का पानी........., ravi shankar acharya (2011-02-20 11:12:59) |
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| bahut khoob..., mohan thanvi (2011-03-23 09:22:52) |
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