Monday, 12 April 2021

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भारतीय मुसलमानों ने छेडी रक्तदान की मुहिम


तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

दुनिया के लगभग सभी धर्मों के अनुयाईयों द्वारा समय-समय पर मनाए जाने वाले अपने धार्मिक पर्वों के दौरान तरह-तरह के आयोजन किए जाते हैं। लगभग सभी समुदाय अपने-अपने पंथों द्वारा चलाई जा रही परम्पराओं को विरासत में मिली धार्मिक परम्परा मानकर उसी का अनुसरण भी करते आ रहे हैं। इन परम्पराओं में जहां एक ओर धार्मिक त्यौहारों के अवसर पर खान पान, मौज मस्ती, सामूहिक भोज, जश्नपूर्ण माहौल के अनेकों आयोजन, जलसा-जुलूस आदि शामिल हैं, वहीं कुछ समुदायों में प्रचलित कुछ परम्पराएं ऐसी भी हैं जो आम इन्सान को विचलित कर देती हैं। धार्मिक परम्पराओं के नाम पर होने वाली कुछ हृदय विदारक गतिविधियां तो ऐसी होती हैं जिन्हें देख पाना भी आम आदमी के वश की बात नहीं होती।
ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की हैरतअंगेज तथा आम व्यक्ति का दिल दहला देने वाली परम्पराओं का अनुसरण केवल अनपढ तथा पिछडे हुए समुदाय के लोगों द्वारा ही किया जाता हो। स्वयं को विश्व का सबसे आधुनिक एवं जागरूक समझने वाला ईसाई समाज भी कभी-कभी ऐसी धार्मिक गतिविधियों में शामिल होते देखा जा सकता है। लगभग प्रत्येक वर्ष इस प्रकार के सचित्र समाचार देखने को मिलते हैं जबकि येरुशलम अथवा किसी अन्य धार्मिक नगर में ईसा मसीह के किसी चाहने वाले द्वारा स्वयं को क्रूस पर लटकाए जाने का वैसा ही प्रदर्शन दोहराया जाता है जैसा कि ईसा मसीह के साथ घटित हुआ था। कितना मार्मिक दृश्य होता होगा जबकि एक जीवित व्यक्ति को उसी के समुदाय के लोगों द्वारा क्रूस पर जिन्दा चढाया जाता होगा तथा दोनों हाथों व हथेलियों में व पैरों में मोटी व लम्बी लोहे की कीलें ठोकी जाती होंगी। अक्सर ईसा मसीह का कोई न कोई भक्त स्वयं को क्रूस पर चढवा कर ईसा मसीह को अपनी रक्तपूर्ण श्रद्घांजलि देने का प्रदर्शन करता है। जाहिर है ऐसी दर्दनाक घटना के समय उसकी जान भी जा सकती है। और यदि ऐसा हुआ तो उस परिवार या समाज के सदस्य यह समझने में जरा भी देर नहीं लगाते कि क्रूस पर चढकर जान देने वाला व्यक्ति अपने इष्ट की बाहों में समा गया तथा स्वर्ग का अधिकारी बन गया। ईसाईयों के अतिरिक्त और भी कई समुदाय ऐसे हैं जहां इसी प्रकार के हैरतअंगेज दृश्य धार्मिक आयोजनों के समय देखे जा सकते हैं।
  ऐसा ही एक समुदाय है मुसलमानों का शिया समुदाय। वैसे तो मुस्लिम धर्म में मनाए जाने वाले सभी पर्व शिया समुदाय के लोग भी अन्य मुसलमानों की तरह ही मनाते हैं। परन्तु मोहर्रम में शिया समुदाय के लोग हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन व उनके उन 72 साथियों का शोक मनाते हैं जिन्हें करबला के मैदान में एक आतंकवादाी मुस्लिम शासक यजीद द्वारा अत्यन्त क्रूरता व बर्बरता के साथ तीन दिन का भूखा व प्यासा कत्ल करवा दिया गया था। शिया समुदाय में ऐसा विशेष वर्ग जिसे सैय्यद कहा जाता है, स्वयं को हजरत इमाम हुसैन का वंशज मानता है। प्रत्येक वर्ष मोहर्रम के इस शोकपूर्ण आयोजन में शिया समुदाय द्वारा हजरत इमाम हुसैन को अपनी अश्रुपूर्ण श्रद्घांजलि दी जाती है। इस सिलसिले में मजलिसें आयोजित होती हैं जहां यजीद व उसकी सेनाओं द्वारा किए गए अत्याचार व उसके द्वारा हजरत मोहम्मद के परिजनों को करबला में दी गई यातनाओं का शोकपूर्ण माहौल में जिक्र होता है। इसे सुनकर शिया हजरात खूब रोते व बिलखते हैं। शिया समुदाय हजरत हुसैन को याद कर केवल इसलिए नहीं रोता कि हजरत हुसैन इनके पूर्वज थे। बल्कि अपने शोकपूर्ण नजराने के द्वारा शिया समुदाय प्रत्येक वर्ष यह संदेश भी देना चाहता है कि हुसैन सच्चाई के रास्ते पर थे और बेगुनाह थे। उनके पास कोई सैन्य बल नहीं था। वे इमाम थे तथा एक धार्मिक संत थे। शिया समुदाय के लोग हजरत हुसैन को याद कर अपनी पीठ, सिर व छाती पर तलवारों, चाकुओं व धारदार छुरियों से मातम करते हैं। इस दौरान उनके शरीर से निकलने वाले रक्त से जमीन लाल हो जाती है। अपने इस रक्तरंजित कार्यक्रम के द्वारा वे हजरत इमाम हुसैन को अपना रक्तपूर्ण नजराना पेश करते हैं। बारगाहे हुसैन में शिया समुदाय अपने खून का नजराना देकर यह भी जताना चाहता है कि यदि हम करबला के मैदान में होते तो हजरत इमाम हुसैन की ओर से इसी प्रकार अपना भी खून बहाते और शहादत देते।
 प्रत्येक वर्ष पूरी दुनिया के करोडों शियाओं द्वारा हजरत हुसैन की याद में अपना खून बहाने तथा उन्हें अपनी रक्तपूर्ण श्रद्घांजलि देने का यह सिलसिला लगभग 1000 वर्षों से चला आ रहा है। कहा जा सकता है कि इनमें और अधिक इजाफा ही होता जा रहा है। इस प्रकार की गतिविधियां जब सीधे तौर पर धार्मिक भावनाओं से जुड जाएं तो इनपर आसानी से उंगली भी नहीं उठाई जा सकती। यदि कोई व्यक्ति धार्मिक भावनाओं में डूबे किसी जोशीले व्यक्ति से इस विषय पर कुछ सवाल भी खडा करना चाहे तो भी लेने के देने पड सकते हैं। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि शिया समुदाय के लोगों में अब इस मामले को लेकर जागरूकता आने लगी है। शिया समुदाय अब यह महसूस करने लगा है कि जिस प्रकार हजरत इमाम हुसैन ने अपना व अपने परिजनों का खून बहाकर इस्लाम धर्म की आबरू को बचाने का सफल प्रयास किया था उसी प्रकार हजरत हुसैन के अनुयाईयों द्वारा भी अपना रक्त सडकों पर बहाने के बजाए उसका उपयोग किसी की जान बचाने के लिए किया जाए तो कितना अच्छा है।
Men Donating Blood in tribute to hazrat Imaam Hussainगत् 20 जनवरी को दिल्ली में आयोजित मोहर्रम के जुलूस के दौरान यह देखा गया कि जहां एक ओर उत्साही शिया अपने शरीर को लहुलुहान कर सडकें लाल कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर कश्मीरी शियाओं के आह्वान पर रक्तदान किए जाने की भी एक समानान्तर मुहिम छेडी गई थी। सरकार द्वारा सहयोग दिए जाने वाली इस मुहिम में बाकायदा अखिल भारतीय अयुर्विज्ञान संस्थान की रक्तदान लेने वाली एक विशेष बस कश्मीरी गेट पर ठीक उसी स्थान पर खडी की गई थी जहां दूसरी ओर जंजीरों व तलवारों का मातम हो रहा था। बडे आश्चर्यजनक रूप से यह देखा गया कि रक्तदान करने वालों की भी लम्बी कतार उस विशेष वाहन के समीप लग गई। इस दौरान सैकडों युवाओं ने हजरत इमाम हुसैन को पेश किए जाने वाले नजराने के रूप में अपना रक्तदान किया। हैरत की बात यह भी थी कि इस रक्तदान में अनेकों शिया महिलाएं भी शामिल थीं।
रक्तदान की इस मुहिम के संचालक संगठन हुसैनी रिलीफ कमेटी, जम्मु-कश्मीर के एक अधिकारी ने इस विषय में बताया कि इस मिशन की शुरुआत तो श्रीनगर से कई वर्ष पहले ही हो चुकी है। अब यह मुहिम दिल्ली जा पहुंची है। रक्तदान की इस मुहिम के सकारात्मक परिणाम आने शुरु हो गए हैं। इस मुहिम को सरकार समाज तथा बिरादरी के पढे लिखे लोगों का भी समर्थन मिल रहा है। अब शिया समुदाय के शिक्षित लोग इस बात को भली भांति महसूस करने लगे हैं कि यदि हजरत हुसैन के नाम पर किए गए रक्तदान से किसी व्यक्ति की जान बच जाए तो आखिर हजरत इमाम हुसैन को इससे अच्छी श्रद्घांजलि और क्या हो सकती है। आशा की जानी चाहिए कि भारतीय शियाओं द्वारा छेडी गई रक्तदान की इस मुहिम का केवल राष्ट्रव्यापी ही नहीं बल्कि विश्वव्यापी प्रभाव पडेगा। इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सुन्नी समुदाय के लोग जोकि हजरत इमाम हुसैन की शहादत के कायल तो हैं, इस घटना पर अफसोस भी करते हैं परन्तु शियाओं की तरह रक्तरंजित मातम से परहेज करते हैं, वे भी रक्तदान की इस मुहिम में शामिल होंगे। इससे मुस्लिम समुदाय द्वारा हजरत इमाम हुसैन को श्रद्घांजलि दिए जाने के साथ-साथ साम्प्रदायिक सद्भाव का एक बडा उदाहरण प्रस्तुत होगा। इस रक्तदान के द्वारा मानवता एवं भाईचारे की एक ऐसी मिसाल पेश होगी जिसकी आज बहुत सख्त जरूरत महसूस की जा रही है।


तनवीर जाफरी - 
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