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हाईटेक विभाग मेरी पहली प्राथमिकता : डॉ. महेन्द्र

10 Nov 2006      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

कहते हैं कि दुनिया में काम की कमी नहीं कमी है तो केवल काम करने वालों की। प्रायः ऐसी उक्तियों को सुनकर हम Director Rajasthan State Archivesयह कहकर उन पर विराम लगा देते हैं कि ऐसी बातें किताबों में ही अच्छी लगती हैं, जीवन व्यवहार में नहीं। परन्तु जीवन इतना छोटा भी नहीं जितना हम उसे अपने आस-पास बिखरा पसरा देखते हैं। काम और उसके स्वरूप के साथ-साथ उसके विविध प्रकार भी हैं। उसके भाँति-भाँति के तरीके भी हैं। ऐसे में इस सच का जीवन्त प्रमाण हमारी आँखों के सामने होता हैं तो बरबस ही हमारे मुख से निकलता हैं कि हाँ, काम तो काम ही है और मेहनत का कोई विकल्प ही नहीं।
नगर बीकानेर में दो ही निदेशक कार्यालय हैं। जो अपने-अपने क्षेत्र में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भी हैं। एक शिक्षा विभाग दूसरा राजस्थान राज्य अभिलेखागार। ऊपर कहीं बातें और उनका सच हम से रू-ब-रू तब होने लगता हैं। जब हम मिलते हैं राजस्थान राज्य अभिलेखागार के युवा, हर दिल अजीज, हर दिल दराज निदेशक डॉ. महेन्द्र खडगावत से। उनकी लीडरशीप में  पिछले डेढ वर्षो में राजस्थान राज्य अभिलेखागार ने अपनी कार्यपद्धति और पुराने अभिलेखों के साथ संवेदनशील व्यवहार करने की जो पहल की हैं। और उनके लिए जितना श्रम साध्य काम किया उतना पिछले किसी  निदेशकों ने नहीं किया होगा। हालांकि ऐसा कहना अतिश्योक्ति प्रतीत हो सकता हैं। लेकिन सच तो सच ही हैं। आप उसे चाहकर भी झुठला नहीं सकते।
चालीस की दहलीज पर कदम रखने वाले खडगावत ने जब से पदभार ग्रहण किया तब से उन्होंने व्यक्तिगत प्रयासों सरकार व राष्ट्रीय अभिलेखागार की विभिन्न योजनाओं से कैसे विभागीय उन्नति संभव हो सकती इस पर ही अधिक ध्यान दिया हैं।
परिणाम स्वरूप अपने अल्प कार्यकाल में समय के साथ कदम ताल मिलाते हुए उन्होंन सारे विभाग के कम्प्यूटरीकरण का जिम्मा लिया हैं।
गौरतलब है कि नब्बे दशक के बाद से लगभग सारे विभागों में कम्प्यूटरीकरण का कार्य आरम्भ होगा। दशक की समाप्ति तक पूरा भी हो चुका था। लेकिन पुराने अभिलेखों का विभाग अब भी इस सुविधा से वचिंत रहा ह इसकी टीस उनके मन इस विभाग सहायक निदेशक के रूप में कार्य करते समय थी। निदेशक का पदभार ग्रहण करने के बाद इन्होंने इस संबंध में प्रयास किए। कहते है कोशिश मायने रखती है परिणाम नहीं। पर कोशिश अगर सच्ची हो तो परिणाम को तो आना ही होगा। उनके प्रयासों की सराहना हुई और राष्ट्रीय अभिलेखागार ने इस बाबत् विभाग को दस लाख रूपये की आर्थिक मदद मुहैया कराई।
इस बाबत बातचीत में खडगावत बताते है कि सात-आठ कम्प्यूटर के आ जाने से पुराने अति महत्वपूर्ण अभिलेखों की ’स्केनिंग‘ हो सकेगी, जिससे वे लम्बे समय तक सुरक्षित रहेंगे।
सारे आंकडे व पट्टे सहित महत्वपूर्ण अभिलेख जैसे कम्प्यूटर्स में ’फीड‘ हो जाएंगे तैसे ही आम नागरिक को कुछ मिनट में अपने मकान, दुकान या कृषि भूमि आदि संबंधी कागजात आवेदन केवल कुछ एक मिनट में सुलभ हो जाएंगें।
निदेशक महेन्द्र का उत्साह यहां आकर ही विराम नहीं ले लेता वरन् यहां से तो एक लम्बी यात्रा की शुरूआत होती है जिस पर चलकर उन्हें इस ’पुराने विभाग‘ को एक आधुनिक तकनीक सम्पन्न ’हाईटैक विभाग‘ बनाने की कल्पना को साकार रूप देना हैं। इसके लिए उन्होंने विभाग की एक अपनी वेबसाइट तैयार करवानी आरम्भ कर दी हैं। जिससे विश्वभर में कहीं से भी आप अभिलेखागार के बारें में जानकारी ले और देख सकतें हैं।
कम्प्यूटीकरण की यह प्रक्रिया केवल मुख्यालय तक सीमित नहीं हैं वरन् विभाग की समस्त शाखाओं एवं वहां उपलब्ध महत्वपूर्ण व अब तक के अप्राप्य अभिलेखों को भी उनकी इस योजना के चलते आसानी से कम्प्यूटर के जरिये प्राप्त किया जा सकेगा। जिसमें जागीर संबंधी अभिलेख सर्वोपरि हैं। जागीर संबंधी अभिलेख अब तक केवल जयपुर में ही उपलब्ध थे जो अब राजस्थान ही नहीं वरन् सम्पूर्ण भारत में जहां कही सें भी जो भी इसकी चाहना रखेगा उसे तत्क्षण उपलब्ध हो जाया करेंगे।
इतिहास से प्रथम श्रेणी में उर्त्तीण श्री खडगावत ने नगर बीकानेर की न्याय विधि व्यवस्था पर अपना शोध सम्पन्न किया हैं। शोध के दौरान जिन व्यावहारिक परेशानियों को सामना उन्हें करना पडा था। उसी को केन्द्र में रखते हुए उन्होंने उन्हें दूर करने की कई नई योजनाएँ बनाई। वे चाहते तो पुस्तकों की खरीद व अन्य मामलों में बजट नहीं है की सरकारी उक्ति से काम चला सकते थें। लेकिन उन्हें तो समस्या का हल निकालने की पडी है उसे उलझाने या यथावत रखने की सुध-बुध नहीं हैं।
इसमें उन्होंने विभिन्न विभागों से पुस्तक विनिमय योजना के माध्यम से अभिलेखागार के पुस्तकालय को समृद्ध बनाने की एक अनूठी पहल चलाई हैं। जिसमें अभिलेखागार अपने प्रकाशन अन्य विभागों को देता हैं, उनसे इसके बदले अपने पुस्तकालय से संबंधित पुस्तकें प्राप्त करता हैं। जिसमें सरकार को राजस्व का फायदा होता हैं, ही साथ विविध विषयों की पुस्तकें अभिलेखागार के पुस्तकालय को अनके विभागों से समय-समय पर प्राप्त होती रहती हैं। इसे ही तो कहते है कि हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा आय।
इस विभाग के साथ पेश आते समय आमजन को एक बडी मुश्किल यह होती है कि पुराने सभी अभिलेख महाजनी में हैं। अतः निदेशक महेन्द्र ने उन्हें हिन्दी अनुवाद करवाने का भी कार्यक्रम चला रखा है ताकि आम आवाम् अपने अभिलेखों में लिखे लेख को आसानी से समझ सकें।
इतना ही नहीं इन्होंने अभिलेखागार में संग्रहित ३० से ३५ उन दुर्लभ पुस्तकों को भी स्केन फोरमेट मे ले लिया जो अन्य कहीं भी उपलब्ध नहीं हैं। इस क्रम में उन्होंने समस्त भारत की प्रशासनिक रिपोर्टो को भी स्केनिंग के जरियें हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित व संरक्षित कर लिया हैं। जो अन्य कहीं भी उपलब्ध नहीं हैं।
कर्मचारी किसी भी विभाग की रीढ की हड्डी होते हैं। समय-समय पर उनकी आवश्यकता, स्थिति ओर गति के साथ दशा व दिशा का ध्यान रखा जाये तो वे अप्रत्याशित परिणाम देने मे समर्थ हो जाते हैं।
श्री खडगावत ने अपने अल्प कार्यकाल में चतुर्थ श्रेणी से लेकर अधिकारी स्तर के १५ से २० कर्मचारियों को उनका वांछित पदोन्नति व पदस्थापन करवाया हैं। जो निश्चय ही कर्मचारी की भावनाओं का सम्मान तो है ही साथ ही उनका उचित समय उन पर उनको सही प्रोत्साहन भी।
शोध व अनुसंधान में गहन रूचि रखने वाले खडगावत ने बताया जब रिसर्च स्कॉलर्स के बारें में और उन्हें दी जा रही हैं। सुविधाओं के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि प्रतिवर्ष १५० शोध विद्धान अभिलेखागार से शोध सामग्री प्राप्त करने के लिए आते हैं। शोधकक्ष की समस्त १६ सीटे प्रायः भरी रहती हैं और स्थानीय शोधर्थियों को बाहरी शोधार्थियों के हक में कई बार मना भी करना पड जाता हैं। उन्होंने बताया कि अन्तराष्ट्रीय शोधार्थियों की संख्या का औसत प्रतिवर्ष १५ से २० का रहता हैं।
अभिलेखागार की आय बढाने के मामलें पर पूछने पर वे बताते है कि हम अन्य विभागों की तुलना में नकल जारी करने की प्रक्रिया व दर में बदलाव लाएंगे। हमारी दरें अन्य विभागों के समकक्ष होगी। वेबसाइट के जरिये नकल, पाय आदि प्राप्त करने की सुविधा का विस्तार करने से भी राजस्व में वृद्धि होगी। सभी २४६ अधिकृत स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित अभिलेख स्वयं स्वतंत्रता सेनानी को तो मुफ्त में उपलब्ध करावाऐंगे। लेकिन अन्य किसी व्यक्ति संस्थाओं को उनके बदले शुल्क देय होगा।
किसी शायर नें ठीक ही कहा है कि ’’कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर  तबियत से उछालों तो सही!

चीफ एडीटरः ब्रज रतन जोशी
 




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