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26
Feb
इतिहास लेखन तथ्यों के आधार पर हो: प्रो. सुनीता जैदी
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Prop.Sunita-Ali

प्रो. सुनीता जमिया मिलया विश्वविद्यालय में इतिहास एवं भाषा विभाग की प्रमुख हैं।

कुछ इन्सान पद और कद दोनों में बडे होने के बावझूद अपने होने को प्रभावित नहीं करते । वरन् उनकी कोशिशे हमेशा एक आम इंसान की तरह स्वयं को साबित करने की होती है। होना और बनना में फर्क होता है। वे आम इंसान बनती नहीं, कहना चाहिए उसी की भांति जीति है। वे सरल, विनम्र, मृदुभाषी है। वे एशिया से प्रति दो वर्ष में एक चुनी जाने वाली RHODES FELLOW है। पर उनसे बात करते समय ऐसा बिल्कुल नहीं लगता के जमिया मिलया इस्लामिया विश्वविद्यालय के इतिहास एवं संस्कृति विभाग की प्रमुख है। ज्ञान पर इतराने के बजाय वे अपने सीमित ज्ञान को शिष्ट एवं विनम्र लहजें में स्वीकारता है। उनका नाम प्रो. सुनीता जैदी है।

छप्पन वर्षीय प्रो. सुनीता जैदी के वाक्यों में उनके अपने विषय का गहन अध्ययन गंभीरता और विद्वता झलकती है। अपने अज्ञान को वे स्वीकार कर ज्ञान में बदलने की चाहना से वे भरपूर हैं।

खबरएक्सप्रेस ने जब उनसे मुसलमानों के पिछडेपन के बारे में जानना चाहा तो वे कहने लगी कि तकनीकी नवाचार इसका मुख्य कारण है। साथ ही शिक्षा का प्रचार प्रसार का ग्राफ भी काफी कम है।

नृतत्वशास्त्रीय अनुसंधानों ने इतिहास अध्ययन को किस प्रकार प्रभावित किया है। इस बारे में उनके विचार थे। कि कुछ समुदायो का इतिहास नहीं होता। नृतत्वशास्त्र एक उपकरण है। हम उपकरणों के जरिये ही अपने निष्कर्षो तक पंहुँचते है। अतः ये जरूरी होने के साथ फायदेमंद है।

इतिहास के पुनःलेखन के बारे में पूछने पर उनका कहना था कि पाठ्यपुस्तकों का लेखन आम आदमी की समझ में आ सकने वाला हो। फोटोग्राफ के जरिये व कक्षा अध्ययन के साथ भ्पेजवतपबंस जवनत म्युजियम आदि के द्वारा व्यवहारिक अध्ययन पद्धतियों का इस्तेमाल होना चाहिए।

वे कहती है कि पहले इतिहास ऊपर से नीचे की दृष्टि को ध्यान में रखकर लिखा गया अब नीचे से ऊपर की और की दृष्टि का विकास होना जरूरी है। साथ ही  इतिहास के अध्ययन अध्यापन में वैज्ञानिक दृष्टि का समावेश, दृश्य-चाक्षुष साधनों का इस्तेमाल भी अनिवार्य होता जा रहा है। ये सम्प्रेषण को प्रभावी बनाते है।

सरकारों के साये में पलते इतिहास के बारे में उनसे जब पछा गया तो उन्होने कहा कि सरकारें अपने ’विजन या विचारधारा से इतिहास को बनाने का काम करती है। जबकि इतिहास तथ्यों का संकलन भर नहीं वरन् वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न आस्था से परे अस्तित्व की प्रामाणिकता के सबूत है। सरकारो का काम है। इसे उन्हीं पर छोड देना लाजमी है।




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