Home > Article >> Short Stories | कंजूस का न्यौता
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20 May 2008 Add comment Mail
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पंडिताइन सौदागर के घर आई और बोली जरूर तुमने इन्हें खाने में कुछ दिया है। बचा हुआ खाना दो, मैं उसे देखूंगी। खाना बचा नहीं था, तो सौदागर देता क्या? पंडिताइन बोली मैं इन्हें नहीं ले जाउंगी। मैं भी यहीं अपने प्राण दे दूंगी और तुम्हें ब्रह्रा हत्या और नारी हत्या करने का पाप लगेगा। सौदागर ने अपनी पत्नी से सलाह की। दोनों पंडिताइन को समझाने लगे-पंडितजी तो चल बसे अब वह लौटकर नहीं आएंगे। तुम अपने प्राण क्यों दे रहीं हो? जो भी मांगोगी, हम देने को तैयार है। पंडिताइन बोली- सौ लोगों का ब्रह्रा भोज करा, नहीं तो पांच हजार रूपए दो। सौदागर बोला-एक पंडित को खिलाने में जब यह गति हुई है, तो सौ को खिलाने में क्या दुर्गति होगी? साहूकार बोला- तुम पांच हजार रूपए ले लो।
सौदागर को पांच हजार रूपए निकाल कर देना अपना कलेजा निकाल कर देने जैंसा लग रहा था। पर मरता क्या करता? उसने रूपए पंडिताइन को दे दिए। पंडिताइन रूपए और पंडितजी को उठाकर अपने घर ले आई। पंडितजी घर में आते ही उठकर बैठ गए। दूसरे दिन सौदागर उनके घर के सामने से निकला, तो उसने देखा कि पंडितजी बैठे है। साहूकार को देखकर पंडितजी बोले- बद्ये, तुम जुग-जुग जियो। पंडितजी और पंडिताइन की चाल सौदागर समझ गया और बोला जुग-जुग तो तुम जियोगे । हम तो बिना मारें ही मर गए है।
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