उस समय भारत पर अंग्रेजी हुकूमत थी। अंग्रेज गवर्नर ने सुप्रसिद्व साहित्यकार मुंशी प्रेंमचंद को उपाधि देने का ऐलान किया।
जब प्रेमचंदजी ने सुना तो वह दुखी हो गए। उन्हें दुखी देखकर उनकी पत्नी बोली, जब उपाधि मिल रही है तो ले लो। इसमे दुखी होने जैसी कौन सी बात है?
मुंशी जी बोले, यदि मैं उपाधि ग्रहण करता हूं तो फिर सरकार का जरखरीद हो जाऊंगा। अब तक मै स्वछंद रूप से जनसामान्य के लिए ही लिखता रहा हूं।
उन्होने गर्वनर को एक पत्र लिखा, मुझे आपकी नही बल्कि जनसामान्य की ही रायसाहबी कुबूल है।
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