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27
May
कर्नाटक जनादेशः अवसरवादी राजनीति को झटका
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Writer - Nirmal Rani

भारत के दक्षिणी राज्य कर्नाटक में हुए असामयिक विधानसभा चुनाव के साथ-साथ देश के अन्य कई क्षेत्रों में गत् दिनों लोकसभा व विधानसभाओं के उपचुनाव भी सम्पन्न हुए। हालांकि इस प्रकार के चुनावों का सिलसिला देश में कहीं न कहीं चलता ही रहता है परन्तु इन चुनावों में कई महत्वपूर्ण नतीजे भी देखने को मिले। हिमाचल प्रदेश में हमीरपुर लोकसभा का उपचुनाव प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के पुत्र अनुराग ठाकुर ने भारतीय जनता के प्रत्याशी के रूप में जीता जबकि पूर्वोत्तर की एक अन्य लोकसभा सीट पर राष्ट्रवादी कांग्रेस नेता पी ए सांगमा की 27 वर्षीय पुत्री अगाथा कांगकल सांगमा विजयी हुई। गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस दोनों ही नेहरु गांधी परिवार के सदस्यों का विरोध करने हेतु इस परिवार पर परिवारवाद अपनाने का आरोप लगाने में अग्रणी रहते हैं। परन्तु जब अपनी सन्तानों को अपनी राजनैतिक विरासत सौंपने की इच्छा इन नेताओं के मन में उत्पन्न होती है फिर इन्हें परिवारवाद का विरोध करने के बजाए इसे अपनाने के लिए मजबूर होना पडता है।
  परन्तु कर्नाटक के विधानसभा चुनाव परिणाम सम्भवतः ऐसे अवसरवादी नेताओं के कान खडे करने वाले साबित हो सकते हैं। यही पुत्रमोह कर्नाटक की राजनीति में एक बडे तथा अहम सबक के रूप में भी परिलक्षित हुआ है। पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौडा ने पूरी तिकडमबाजी के साथ कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। पिछली विधानसभा में देवगौडा के नेतृत्व वाली जे डी एस के 58 सदस्य थे जबकि भाजपा के विधायकों की संख्या 79 थी। सिद्घान्त रूप से उस समय भी भाजपा का ही मुख्यमंत्री बनाया जाना न्यायसंगत होता। परन्तु देवगौडा ने अपने पुत्र कुमारास्वामी के मोहपाश में बंधकर संभवतः अपने प्रधानमंत्री बनने के समय की गई तिकडमबाजी से भी अधिक चालाकी, चतुराई तथा राजनैतिक हथकंडों का परिचय देते हुए उसके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता तैयार किया। एक समझौते के तहत निर्धारित समय पर भाजपा को सत्ता हस्तांतरित किए जाने का भी समझौता भाजपा तथा जे डी एस के बीच किया गया। परन्तु सत्ता हस्तांतरण का समय आने पर कुमारास्वामी ने भाजपा के उपमुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा को सत्ता सौंपने से इन्कार कर दिया।
  उक्त घटनाक्रम के पश्चात राज्य में काफी समय तक राजनैतिक अस्थिरता का वातावरण बना रहा। और अन्ततोगत्वा कोई राजनैतिक समाधान न निकल पाने के परिणामस्वरूप विधानसभा को भंग करना पडा। राजनैतिक अवसरवादिता की इससे बडी मिसाल दूसरी और क्या हो सकती है। इन दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में सम्पन्न हुए राज्य के विधानसभा चुनाव में जनता ने अपना फैसला सुना दिया है। 224 सदस्यों की कर्नाटक विधानसभा में सन् 2004 में 79 सीटें जीतने वाली भाजपा को 110 सीटों पर विजय दिलवाकर मतदाताओं ने भाजपा के प्रति अपनी सहानुभूति का परिचय दिया है। साथ ही साथ विगत विधानसभा में 58 सीटें प्राप्त करने वाली जे डी एस को मात्र 28 सीटों पर समेटकर मतदाताओं ने इस बात का सीधा संदेश देने की कोशिश की है कि भविष्य में धोखाधडी तथा अवसरवादी राजनीति करने वालों को मतदाता कभी माफ नहीं करेंगे। कर्नाटक की जनता ने राज्य में असामयिक हुए इन विधानसभा चुनावों के भारी खर्च का जिम्मा भी जे डी एस के गलत   राजनैतिक फैसलों पर डाला है। वहीं 2004 में 65 सीटें जीतने वाली कांग्रेस पार्टी को 80 सीटें जितवाकर मतदाताओं ने पार्टी को पहले की अपेक्षा अधिक स्वीकार्यता प्रदान की है।
  भारतीय जनता पार्टी द्वारा कर्नाटक के चुनाव परिणामों को राष्ट्रीय राजनीति के रंग में रंगने की कोशिश की जा रही है। भाजपा जोकि मीडिया प्रबंधन, प्रचार, दुष्प्रचार व कुप्रचार में अपना कोई मेल नहीं रखती निश्चित रूप से कर्नाटक चुनाव को भी राष्ट्रीय राजनैतिक परिपेक्ष्य के रूप में प्रचारित करने की कोशिश कर रही है। हल्के व घटिया किस्म के तर्क देकर पार्टी यह साबित करना चाहती है कि दिल्ली अब उसकी पहुंच से दूर नहीं है। इंडिया शाईनिंग जैसी भाषा अभी से भाजपा नेताओं ने बोलनी शुरु कर दी है। यहां तक कि पार्टी ने लाल कृष्ण अडवाणी जैसे विवादित नेता को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में भी प्रोजेक्ट कर दिया है।
  कर्नाटक चुनाव के बाद भाजपा नेताओं के बयान तथा उनके तर्कों पर यदि गौर करें तो हम देखेंगे कि कर्नाटक चुनाव परिणाम से अत्याधिक उत्साहित भाजपा जे डी एस को निशाना बनाने के बजाए सीधे तौर पर कांग्रेस पर ही निशाना साध रही है। इन चुनाव परिणामों के आधार पर भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर मतदाताओं को यह गुमराह करने की कोशिश कर रही है कि भाजपा का जनाधार राष्ट्रीय स्तर पर बढ रहा है जबकि कांग्रेस पार्टी का जनाधार तेजी से सिमटता जा रहा है। बेशक कर्नाटक के मतदाताओं ने जे डी एस को धोखेबाजी किए जाने का सबक सिखाया है तथा बी एस येदियुरप्पा जैसे ईमानदार एवं जुझारु नेता के प्रति हमदर्दी का इजहार करते हुए भाजपा को राज्य में पहली बार सबसे बडे दल के रूप में स्थापित किया है। परन्तु राज्य के मतदाताओं ने कांग्रेस को नकारा है अथवा भाजपा ने कांग्रेस से सत्ता छीनी है, ऐसा कोई संदेश कर्नाटक की जनता द्वारा कतई नहीं दिया गया। राज्य में कांग्रेस को 15 सीटों पर मिली बढत तथा वोट प्रतिशत में हुआ इजाफा इस बात का प्रमाण है। हां जे डी एस से 30 सीटें छीनकर मतदाताओं ने जे डी एस के प्रति गुस्से का इजहार जरूर किया है।
  कर्नाटक के इस राजनैतिक घटनाक्रम में न तो कहीं लाल कृष्ण अडवाणी के प्रधानमंत्री बनने के लक्षण अथवा समीकरण दिखाई पड रहे हैं न ही कांग्रेस का सफाया जाहिर हो रहा है। परन्तु राज्य में परिस्थितियोंवश पहली बार 110 सीटें जीतने वाली भाजपा इन परिणामों को ठीक उसी रणनीति से पेश कर रही है जैसे कि ‘इंडिया शाईनिंग’ को प्रचारित किया गया था। नरेन्द्र मोदी की सफलता व उनके राजनैतिक तेवर, अंदाज व उनकी हकीकत को कौन नहीं जानता। गुजरात में साम्प्रदायिकता का जहर घोलने वाले नरेन्द्र मोदी बेशक गुजरात की सत्ता में वापस जरूर आ गए हैं परन्तु गुजरात में भी जनता ने उन्हें पहले की तुलना में कम सीटें दी हैं तथा कांग्रेस की सीटों की संख्या में वहां भी बढोत्तरी ही हुई है। असंसदीय भाषा का प्रयोग करने में महारत रखने वाले मोदी साहब सोनिया गांधी व राहुल गांधी को कोसते-कोसते अब स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी रहने वाली कांग्रेस को ‘बुढिया’ पार्टी की संज्ञा दे रहे हैं।
  निश्चित रूप से कर्नाटक के मतदाताओं का फैसला स्वागत योग्य है। पूरे देश में मतदाताओं को इसी प्रकार से जागरूक रहना चाहिए। अवसरवादी, स्वार्थी तथा बहकावे वाली राजनीति का बहिष्कार किया जाना चाहिए अथवा इसका कर्नाटक के ही अन्दाज में मुंहतोड जवाब दिया जाना चाहिए। आशा है कि कर्नाटक के मतदाताओं के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब यदि देश में कहीं त्रिशंकु विधानसभा संगठित होती है तथा निर्धारित समय सीमा पर सत्ता हस्तांतरित किए जाने जैसे समझौते के तहत सरकार का गठन होता है तो पूरी उम्मीद है कि संबंधित पक्ष ऐसे समझौतों पर अवश्य अमल करेंगे अन्यथा कर्नाटक के मतदाताओं जैसे निर्णय का सामना करने के लिए उन्हें तैयार रहना पडेगा।



Nirmal Rani  nirmalrani@gmail.com


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