संतुलन जीवन का अनिवार्य पहलू होने के साथ जीवन के उद्भव और विकास का सबसे सुन्दर स्वरूप है। जीवन में संतुलन का होना जीवन की समग्रता और सांझा प्रवृति का प्रमाण है। जीवन के लिए आवश्यक पॉच घटकों का संतुलन जीवन चक्र का नियामक है। ऐसे में सभ्यता के प्रत्येक प्राणी के अधिकार, सुख, दुःख और अस्तित्व की सुरक्षा के लिए संतुलन अनिवार्य है। आधुनिक सभ्यता ने प्रौधोगिकी के नाम पर अपनी विकास आकांक्षा को पूरा करने के क्रम में तकनीकी के माध्यम से जीवन और प्रकृति के मध्य कायम संतुलन को सर्वाधिक नुकसान पहुँचाया है। दुर्भाग्य से समाज का नेतृत्व करने वाली राजसत्ता इस तथ्य को भूलती जा रही है। फलस्वरूप बाजार का प्रभाव जीवन के अस्तित्व पर एक खतरे का एहसास घना करता जा रहा है। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने पूर्व की सोच के विपरीत अपनी पाश्चात्य दृष्टि सम्मपन्न वैचारिको को अधिक महत्व दिया है। परिणाम स्वरूप आर्थिक सुधारों के नाम पर निजीकरण के माध्यम से मानवता का जो चीरहरण होना आरम्भ हुआ वह रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है। बाजार बैचेन है, उदग्र है व्यग्र है। उसके इस आक्रमक रूप के सामने, मानवता दीन-हीन, लुंज-पुंज होकर अपने बेवसी के माखौल से हतप्रभ है। सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली के बाद अब पेयजल की आपूर्ति का काम भी निजी कम्पनियों को देने पर उतारू है। इसके पीछे सरकार की सोच है कि पेयजल के क्षेत्र में निजी निवेश होगा। अपने विचार के खरेपन को जॉचते हुए राज्य सरकार ने धौलपुर में सागरवाडा परियोजना के माध्यम से परीक्षण भी कर रही है। भीलवाडा को पेयजल परियोजना का भी काम एक मल्टीनेशनल को दिया जा चुका है। प्रश्न उठता है कि सरकार जनहित के नाम पर ऐसे मानवता विरोधी निर्णय क्यों ले रही है? क्या बाजार की बैचेनी को सरकार अपनी बैचेनी मान रही है? जनतंत्र में सरकार जन की प्रतिनिधि है। बाजार की नहीं । क्या बाजार की आक्रमक रणनीति के आगे हमारे राजनेताओं दृढ इच्छा शक्ति का लोप हो गया है ? या छीजत कम करने अन्याय तरीके अप्रभावी हो गए है? अगर ये सब सच है तो फिर क्यों बेखबर है सरकार। हमें समय रहते संतुलन के सिद्धान्त को समझते हुए इन प्रक्रियाओं पर विराम लगाना होगा। क्योंकि पानी का पानी उतारने को उतारू समाज अपने होशो -हवास में नहीं है वरन् प्रकृति घटकों के साथ ही पशुवत व्यवहार कर रहा है। पानी का निजीकरण और उस पर अधिकार की कवायद उसी पर छुपी हुई रणनीति हिस्सा है। मध्यकाल में बिहारी ने अपने एक दोहे में लिखा था - ’’रहिमन पानी राखिए बिनपानी सब सून‘‘ हमें सजग, सतर्क और सचेत होकर अपनी सभ्यता और संस्कृति की इस सुन्दर बगिया में मानवता के पुष्प को खिलने का श्रेष्ठ अवसर देना होगा ताकि व्यापक समाज में पानी की संस्कृति, पानी के प्रति चेतना का सौम्य रूप व्यवहार में आ सके नहीं तो बीती सदी के श्रेष्टतम महाकाव्य में महाकवि जय शंकर प्रसाद जो कह गये है वह साकार हो जाएगा।“ प्रकृति रही दुर्जेय पराजित,हम सब थे भूले मद में, भोले थे हॉ तिरते थे,केवल विलासिता के मद, में वे सब डूबे डूबा उनका विभव बन गया पारावार, देव सुखों पर उमड रहा था दुख जलधि का नाद अपार इसलिए जीवन चक्र की निरन्तरता व प्रकृति के सनतान स्वभाव के प्रति हमें सकिरय होकर संतुलन सिद्धान्त को गति देनी होगी अन्यथा हमारी गति मुक्ति का विधान मरने वाला समाज स्वयं अपनी गति मुक्ति को तरसेगा। डॉ. ब्रजरतन जोशी लेखक चर्चित पुस्तक ’’जल और समाज‘‘ के लेखक है। पानी से जुडे मुद्दों पर समय समय पर लिखते रहे है।
डॉ ब्रजरतन जोशी
|