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Oct
खबरम् खबरें खबरामि
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Dr. Braj Ratan Joshiयह खबर युग हैं। खबर युग में 'खबर' की खबर रखना हमारे लिए जरुरी होता जा रहा हैं। 'अपनी खबर' इस खबर युग में खोती जा रही हैं। सब जन खबरी हो गए है होते जा रहे हैं। हर घटना या दुर्घटना नहीं रही वरन् एक खबर हो गई हैं। अगर किसी को कुछ मालूम नहीं है तो वह है 'अपनी खबर' क्योंकि खबरशास्त्र का पहला सिद्धान्त है कि खुद को खुदी से हटा और दूसरों पै ध्यान बंटा। अब समस्या यहीं से खडी होती है कि हमें जमाने भर की खबर होती है कि आज संयुक्त राष्ट्र में क्या हुआ, अमेरिकी राष्ट्रपति कहाँ की यात्रा पर है, किस चैनल पर कौनसी कवर स्टोरी आज हिट जा रही हैं। सूचकांक की उठा-पटक आज क्या रही, आगे क्या संभावना है क्रीकेट सहित खेलजगत में क्या हुआ, कौन बाहर कौन अन्दर कैसे-कैसे घोटाले हुए आगे उजागर बस नहीं है तो अपनी अपने घर अपने समाज और व्यापक स्तर पर मानवता की ही खबर नहीं हैं। हो भी क्यों? भला मानवता भी कोई खबर जैसी चीज है जिसे स्मृति में जगह दी जाए।
खबर चुलबुली, चटपटी और मसालेदार होने के साथ-साथ अपने कलेवर में आक्रषक, भडकाऊ और उतेजक होती। अत: वे सभी मुल्य व घटक जिनमें ऊपर गिनाए गुण नहीं आते उनसे भला हमारा निर्वाह कैसे संभव है और हो खबरिया चैनल खबरों को बेचते है खबर को 'रबड छंद' के प्रयोग फैलते है उठाते हैं। पटकते है; खबर से खबर निकालते, गढते, जडते है और खबर की हत्या एक नई खबर को जन्म भी देते हैं।
खबरशास्त्र के विशेषज्ञ किसी मशीन की से भी तीव्र हबरें  गढने, रचने और उन्हें बिकाऊ, टिकाऊ बनाने में अपना श्रम समुल्य चैनलों के 'आवारा हाथों' में बेचते हैं जहां वे अपने प्रभाव में व्यापक समाज को अपनी छुपी हुई रणनीति का हिस्सा बनाकर बाजार के लिए उसके हितानुसार बरतते हैं।
इस सबमें जो चीज अन्याय, असहाय, लाचार, दीन-हीन और उन्हें करुण अवस्था में होती है वह है मानवता जिसके सबसे पुजारी होने का दावा समाज के विभिन्न वर्ग समय-समय पर करते रहते हैं।
असल में तेजी से खबरी होते समय में हमें 'अपनी खबर' की खबर का विरोध ध्यान रखना होगा नहीं तो हमारी खबर लेना भी कोई नहीं बचेगा। क्योंकि जब हम अपनी खबर लेने में विचार को मन प्रवेश देते है तो सबसे पहले कर्त्तव्यनिष्ठा, उत्तरदायित्व एवं सही मापने में स्वतंत्रता जैसे मूल्यों को अपने चरित्र, आचरण और व्यवहार में जगह देते हैं।
अत: जरुरी है कि हम सबकी खबर तो रखते ही पर 'अपनी खबर' मानी अपने घर, परिवार, समाज व मानव समुदाय व उससे जुडे कल्याणकारी मुद्दों की खबर भी रखे रभी हम 'खबरात्मा', 'मानवत्मा' में परिवर्तित हो पाएंगें। जब 'अपनी खबर' होगी तो हमारी अनेक मुसीबते स्वयं ही अपने बोरिया बिस्तर समेटकर हमारे कल्याणकारी विचार व व्यवहार को अपनी क्रीयान्विती के लिए 'स्पेश दे देंगी'। जिस दिन हम 'अपनी खबर'ले लेंगे उस दिन हम सही मायने में अपने होने की सार्थकता को सिद्ध कर सकेंगे।

 

सम्पादक
डा बृजरतन जोशी




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Comments to this Article

wonderful article written by you.it shows that somewhere we are losing our credibility as a media organisation but at the same time nothing can be constant. seriously we have to change this image.this article is inspiring and motivating , ramesh bhatt (09/07/2007 22:38:17)


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