मेवाड के महाराणा अपने एक नौकर को सदैव अपने साथ रखते थे। भले ही युद्ध के मैदान हो, चाहे भगवान का मंदिर। एक बार वे अपने इष्टदेव एकलिंगजी के दर्शन करने गए। उस नौकर को भी साथ ले लिया। दर्शन कर वे तालाब के किनारे घुमने गए। उन्हें एक पेड पर ढेद सारे फ आम लगे हुए दिखाई दिए। उन्होंने एक आम लिया और उसकी चार फांक बनाई। एक फांक नौकर को देते हुए कहा- ’बताओ, कैसा स्वाद है?‘ नौकर ने आम खाया और कहा बहुत मीठा है। पर महाराज एक और देने की कृपा करें।‘ महाराणा ने एक फांक और दे दी। नौकर ने कहा- ’पाह क्या स्वाद है! म्जा आ गया। मेहरबानी कर एक और दीजिए।‘
महाराणा ने तीसरी फांक भी दे दी। उसे खाते ही वह नौकर बोला- बिल्कुल अमृत फल है। यह भी दे दीजिए।‘ उसने अंतिम फांक भी मांग ली। महाराणा को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा- ’तुम्हें शर्म नही आती! तुम्हें नही दूंगा यह अंतिम फांक।‘ यह कहते हुए महाराणा ने वह फांक मुंह में रखते ही उस एकदम उगल दिया। वे बोले ’इतना खट्टा आप खाकर भी तुम यह कहते रहे कि यह मीठा है, अमृत तुल्य है। क्यों कहा ऐसे?‘ नौकर बोला- ’महाराज, जीवन भर आप मीठे आम देते रहे हैं। आज खट्टा आम आ गया तो कैसे कहूं कि यह खट्टा है। ऐसा कहना मेरी कृतध्नता नही होती!‘ महाराणा ने उसे अपने गले से लगा लिया और कृतज्ञता के लिए उसे पुरस्कृत किया।
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