कितने दीप जले फिर भी
कुछ आँगन में अँधियारा है,
इतना वैभव! इतनी खुशियाँ!
फिर भी मन बनजारा है।
जगमग करती इस बस्ती में
कोई तो ऐसा है, जिसने
अपनी खुशियाँ गिरवी रख कर
फैलाया उजियारा है।
बन्दनवार बना आतुर मन
दीपक नयनों में जलते
आंगन के तुलसी चौरे में
झिलमिल रूप तुम्हारा है।
कितनी मावस, कितनी पूनो
यों तो आती जाती हैं
किरण रज्जु से उतर
किसी अप्सरि ने दृश्य सँवारा है।
भीड भरे इस कोलाहल में
एक दीप ऐसा भी है
तेज हवाएँ, कँपती लौ
पर जल उठता दोबारा है।
दीपों के इस महा पर्व पर, दें क्या हम उपहार तुम्हें?
छोटे से जीवन के स्वर्णिम, सपने क्या स्वीकार तुम्हें?
दर्द बाँटना भूल गए हम, अपना सत्व प्रधान हुआ
आजादी के बाद देश हित, कोई नहीं कुरबान हुआ।
देख रहा उत्सुक नयनों से, है सारा संसार तुम्हें
अब तक जो ..........
अन्तरिक्ष में उडता मानव, गगन चूमते भवन यहाँ
धरती से ही उपजाने की है सबको लगन यहाँ
कभी सुनाई देती है क्या, अन्तर्मन-झंकार तुम्हें
अब तक जो ..........
उस अतीत की संस्कृति को, कब तक यूँ ही दुहराना है?
कब तक युग पुरुषों के कन्धों, पर चढ गर्व मनाना है?
वर्तमान को देना है इसका उत्तर सौ बार तुम्हें
अब तक जो .......
रट कर नाम महापुरुषों के, कब तक पर्व मनाएंगे?
क्या न कभी नवयुग का हम अपना इतिहास बनाएंगे?
सिंह पुरुष के अन्तस्तल की अर्पित हो रसधार तुम्हें
आने वाले वर्षों में दें ऐसा कुछ उपहार तुम्हें।
वह दीप
वही दीप
जिसे तुम दीर्घ हथेलिय की ओट दिए
झंझा और तूफान से बचाते हुए
इस पडाव तक ले आए थे ।
वह दीप
तेज हवाओं से विचलित हो
जिसने कई बार तुम्हारी रक्त किसलय सी
हथेलियों को झुलसा कर
निर्बन्ध होना चाहा था ।
वह दीप
जिसके प्रकाश में तुमने अपनी भाग्य रेखाएँ पढी थीं
और नेह की ऊर्जा दे
उकसाते रहे थे जिसकी बाती
प्रदीप्त रहने के लिए ।
वह दीप
जिसने बूँद से सागर तक की इस यात्रा में
तुम्हारे हृदय के स्पन्दन का इतिहास ही बाँचा है
अधरों पर छलकी एक आलोक किरण में
जिसने सूर्य की भास्वरता का अनुभव किया है
वह दीप ,
जो रात्रि में जला
धूप में खिला
प्रभाती से सन्ध्या तक
जिसने वसन्त के हर रंग को निरखा
वह दीप
जिसकी निष्कंप शिखा
लहरीले मरू के विस्तार में
राह भूले पथिक को
पाथेय का संकेत करती रही
वही दीप,
आज तुम्हारे द्वारा सागर को दे दिया गया है
फेर्नोमिया उछालते,गरजते इस महाम्बुधि के रौरव नाद
और उत्ताल तरंगों की
चुनौती स्वीकारते हुए
तुम्हारा मृदु संकेत समझ
वह काल को बाँचने चल पडा है.......
आँखें बन्द मत करना ।
तुम्हारे नेह से संवलित
दीप वह
विचलित हो तेज हवाओं से
जिसने कई बार .....
तुम्हारी रक्त किसलय सी
हथेलियों को झुलसा कर
निर्बन्ध होना चाहा
वह दीप
जिसके प्रकाश में कभी
भाग्य रेखाएँ पढी थीं
तुमने अपनी
वह दीप
जिसे सिखाया तुमने
रात्रि में जलना
और धूप में फूलों सा खिलना
प्रभाती से संध्या
हर रंग में घुलना
वह दीप
जिसकी निष्कंप शिखा
बाँचती लहरीले मरु का विस्तार
राह भूले पथिक को
रही करती संकेत पाथेय का
तुम्हारे द्वारा जलाया गया
एक वही दीप
आज
मालिका सजाता है
अमा सुन्दरी की
घनी काली अलकों में
जूही के पुष्प सा
लो आज मुस्कुराता है ।
डॉ. निर्मला शर्मा - गंधमादन, ९-ए, माही सरोवर नगर, बाँसवाडा - ३२७००१(राज.)