Saturday, 07 December 2019
khabarexpress:Local to Global NEWS

कितने रावण मार दिए कितने अभी बाकी है


Shyam Narayan Ranga

कल विजयादशमी का त्यौंहार पूरे भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक, अमर्यादित शक्तियों पर मर्यादित शक्ति के प्रतीक इस त्यौंहार को हर साल बडे उत्साह व उमंग के साथ मनाया जाता है। इस दिन रावण, मेघनाथ, कुंभकर्ण के पुतलों का दहन कर तालियाँ बजाई जाती है और अगले दिन भारत भर के समाचार पत्र रावण के मरने, रावण का दंभ खत्म होने जैसी खबरों को प्रमुखता से छापते हैं। 

मेरे मन में यह ख्याल आता है कि जनसंख्या में सबसे ज्यादा योगदान रखने वाला यह मध्यम वर्ग बहुत खुश होता है कि आज उसने सत्य की जीत का त्यौंहार मनाया है। हमेशा सत्य के आगे झुककर प्रणाम करने की चाह रखने वाला यह मध्यम वर्ग प्रतिदिन न जाने कितने रावणों के सामने असत्य को जीताता है और अपनी मर्यादा का उल्लंघन होते देखता है। सही है ऐसे दबे और कुचले हुए वर्ग के सामने साल में एक दिन रावण का दहन बहुत खुशी का पल होता है कि चलो सच में न सही प्रतीक में सही, असत्य की हार तो हुई। बुझे मन से वह यह मानता है कि असत्य की ही जीत हमेशा होती है, मर्यादाऍं हमेशा से टूटती आई है।

कभी राशन की दुकान की लाईन में घंटों लगने के बाद जब केरोसिन कम मिलता है चीनी का तोल सही नहीं होता तो मध्यम वर्ग का यह इंसान सोचता है कि आज भी कितने रावण जिंदा है जो सीता का हरण कर जनता को द्रोपदी बनाने का प्रयास करते हैं। सरकारी कार्यालयों में, रोडवेज की बसों में, आयकर - बिक्रीकर विभागों में, आदि आदि व्यवस्थाओं में आज ज हालात है, उससे तो यही लगता है कि आज भी रावण जिंदा है। एक ही पल में रावण व दुःशासन के प्रतीक ये लोग आज हमारे समाज को खोखला कर रहे ह। जो मंदोदरी का पति रावण था उसकी नजर तो सिर्फ राम की सीता पर ही खराब रही और कहीं न कहीं अपनी बहन के साथ हुए अन्याय का बदला लेने का प्रयास भी उस रावण का रहा। पर आज की इस जनता ने न तो किसी राम की सीता का हरण किया है और न ही किसी रावण की बहन का तिरस्कार किया है, फिर भी उसका सामना प्रतिदिन कईं रावणों से होता है। एक रावण पाँच साल के लिए छलने आता है और सने की सुनहरी लंका का सपना दिखाता है और जनता को यह बताने का प्रयास करता है कि यह सोने की लंका मेरी नहीं है आपकी है और मैं आफ लिए भी ऐसी ही सोने की लंका बना दगा बस एक बार आप मुझे फिर राजसिंहासन पर बैठा दो। पिछले साठ सालों से यह रावण अपना प्रतिदिन रूप और काया बढा रहा है। अस्पतालों में राम बनने की कवायद करते डॉक्टरों के सामने जब मरीज आता है तो भगवान रूपी इस इंसान से जिंदगी की उम्मीद लगाता है पर अपनी हडतालों मं व्यस्त, अपनी मांगों को मनवाने में व्यस्त इस भगवान को भक्त की फरियाद सुनाई नहीं देती और एक और रावण जनता के सामने अपना मह लेकर खडा हो जाता है। कहीं तस्करी करते रावण है तो कहीं बम विस्फोट करते रावण है, कहीं संसद में प्रश्न उठाने के बदले पैसा लेने वाले रावण है तो कहीं माँ बहनों की अस्मत लूटने वाले रावण है, कहीं बेकरी कांड के रूप में रावण नजर आते हैं तो कहीं तंदर कांड के रूप में, कहीं कसाब बन कर रावण घूम रहे हैं तो कहीं सफेद चोलों में मह पर मुस्कान लिए जनता में घूमते रावण है, कहीं लाल बत्तियों में अफसरशाही करते रावण है तो कहीं अनाज के गोदामों की पहरेदारी करते रावण है। रावण जगह जगह है पर आज के इस हालात में राम नहीं है। सीता है जिसका हरण हुआ है, जिसके साथ हमेशा अन्याय हो रहा है, पर एक ऐसी सीता जिसका कोई राम नहीं, एक ऐसी सीता का हरण हुआ जिसने लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन नहीं किया। आज गली गली में रावण घूम रहे हैं किसी शायर की कही ये पंक्तियाँ याद आ रही है कि गली गली में रावण खडे हैं, इतने राम कहॉ से लाऊॅं। जनता रूपी इस सीता को आज भी अपने राम का इंतजार है जो किसी अहिंसा का अस्त्र लेकर आएगा और इन रावणों से छुटकारा दिलाएगा। भारत का आम नागरिक खुश है कि उसने रावण को मार गिराया, पटाखे फूटे, विजय उल्लास हुआ लेकिन इस शोर गुल में रावण अभी भी जिंदा रह गया। उसका अट्टाहस ये कहता है कि मुझे मारने के लिए राम लाओ मैं किसी रावण के हाथों नहीं मारा जा सकता। 
 


 

श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘
पु
ष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर