डॉ. मनमोहन सिंह देश के ही नहीं वरन् विश्व के जाने माने अर्थशास्त्री हैं। ज्ञान के प्रति सम्मान और शिक्षा के प्रति उनकी सजगता उनकी निजी पहचान भी है।
सैम पित्रोदा की अगुआई में ज्ञान आयोग का गठन उनकी ज्ञान निष्ठा और शिक्षा के प्रति संवेदनशीलता का प्रमाण है। ज्ञान आयोग ने कुल ही प्रधानमंत्री को अपनी अंतिम रिर्पोट सौंपी है। आयोग ने जो सिफारिशें की हैं वे राष्ट्र के शिक्षा और ज्ञान क्षेत्र के सुधार की कमियों को तो उजागर करती ही हैं साथ ही उसमें परिवर्तन की संभावनाओं के नए द्वार भी विद्यमान है।
आयोग ने शिक्षा और ज्ञान क्षेत्र में ’ब्लयू प्रिंट‘ तैयार करने की भी अनुशंषा ही है। आयोग की मुख्य शिफारिशे इस प्रकार है -
- अगले दसवर्ष में ५० केन्द्रीय वि. विद्यालय और खोले जाए।
- १५०० विश्वविद्यालय और हो।
- अंग्रेजी भाषा शिक्षण पहली कक्षा से अनिवार्य किया जाय।
- यादाशत की परिक्षा प्रणाली के बजाय व्यक्तित्व के आंतरिक मूलयांकन के प्रयास अधिक हो।
- उच्च शिक्षा नियामक प्राधिकार बने जो संसद द्वारा कानून पारित स्वतंत्र नियामक हो।
- राष्ट्रीय पुस्तकालय आयोग बने जो सूचना, सेवाओं, प्रशिक्षण और शोध के काम भी देखे।
- व्यावसायिक शिक्षा और स्कूली शिक्षा के बीच संबंध हो
इसमें कोई ओ राय नहीं कि ये सिफारिशें शिक्षा और ज्ञान क्षेत्र में परिवर्तन बल्कि कहना चाहिए क्रांतिकारी परिवर्तन की प्रतिनिधि हो सकती है। पर सोचने वाली बात यह है कि क्या केवल सिफारिशों आयोगों और परिवर्तन की संभावनाओं के लिए ही हम नई जमीन तलाश रहे है? क्या बिना इनके हमारी शिक्षा प्रणाली में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन संभव नहीं है? क्या कोई आयोग अथवा समिति इस बात कि सिफारिश नहीं कर सकती कि समूचे तंत्र की शिक्षा प्राप्त करने के बाद हर शिक्षित व्यक्ति एक सजग, सतर्क और संवेदनशील इंसान के साथ स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में समाज में अपना अस्तित्व बनाए रखों।
क्या शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में असहमति के उन बिन्दुओं की जमीन को तलाशा गया है जहाँ ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं या विरोधी है।
अगर सैम पित्रोदा जैसे विद्वान भी परम्परागत समिति और आयोगों में परम्परागत विचार प्रणाली और कार्यप्रणाली के संवाहक बनेंगे तो नई राहों के नये उन्वेषियों को तो बडी निराशा ही हाथ लगेगी।
क्या स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयओं के खुलने भर से हमारा समाज शिक्षा के क्षेत्र में नए कीर्तिमान गढ सकेगा? इन दिनों शिक्षा के व्यवसायीकरण पर भी हर आयोग जोर दे रहा है। लेकिन व्यवसायीकरण के हिमायती यह ध्यान नहीं रखते कि शिक्षा केवल तकनीक नहीं है वरन् मूल्यबोध और मूल्यनिष्ठा के साथ इसका गहरा संबंध है। केवल साधनों केा प्रयोग कर जीवन जीना जीवन की पूर्णता नहीं है वरन् यह भी गौर किया जाना चाहिए कि वह जीवन जीने के कितना योग्य है।
शिक्षा मानवीय प्रक्रिया के साथ संस्कृतियों प्रवेश का द्वारा भी है। मूल्यदृष्टि ही शिक्षा के समाज हित या अहित का निर्धारण करती है। अतः हमें शिक्षा के मूल प्रयोजनों से जुडे सरोकारों को ध्यान में रखते हुए ही सिफारिशें या उनका क्रियान्वयन करना चाहिए ।
गौर करने वाली बात तो यह भी है कि इस आयोग में चरित्र, आचरण और व्यवहार को पुष्ट करने की ओर कदम बढाने वाली एक भी सिफारिश नहीं है जरूरत है शिक्षा प्रक्रिया के साथ शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन की।
हमें शिक्षार्थी की सीखने की चाह का सम्मान करते हुए किसी भी सत्ता (धर्म, अर्थ, समाज आदि) इसे शिक्षा व्यवस्था को मुक्त करने के अधिकाधिक प्रयास करने होंगे। हलांकि राह कठिन है पर वास्तविक उश्यों की पूर्ति के लिए चलना तो इसी राह पर ही होगा।