Sunday, 01 November 2020

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आपे से बाहर होते यह नेता पुत्र


Writer - Nirmal Raniभारतीय राजनीति ने हमें सैकडों ऐसे नेता दिए हैं जिन पर आज भी समूचा देश गर्व करता है। उन गुजरे नेताओं की तो बात ही छोडिए, यदि वर्तमान अनेकों बडे नेताओं की ही बात की जाए तो मनमोहन सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, सोनिया गांधी, प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, वी पी सिंह आदि ऐसे तमाम वरिष्ठ नेताओं के चेहरे हमें देखने को मिल सकते हैं जो सज्जनता व विनम्रता की एक मिसाल प्रतीत होते हैं। गोया शराफत इनके चेहरों से टपकती है। सौम्यता, विनम्रता मधुर वाणी बोलना आदि इन या इन जैसे कई वरिष्ठ नेताओं का आभूषण प्रतीत होता है। और इनकी सौम्यता व सज्जनता का यही आभूषण इन्हें समाज में एक सफल राजनेता के रूप में स्थापित करता है। इन नेताओं व इन जैसे और अनेकों नेताओं का यही आकर्षक एवं मधुर अन्दाज व इनकी विनम्रता जनता को यह एहसास दिलाती है कि यह देश के शासक नहीं बल्कि देश के सेवक हैं। परन्तु लगता है कि समय परिवर्तन के साथ-साथ अब नेताओं के संस्कारों में भी परिवर्तन आता जा रहा है। आज का नेता स्वयं को देश के सेवक के रूप में स्थापित करने के बजाए स्वयं को दहशत फैलाने वाले एक नेता के रूप में स्थापित करने में अधिक दिलचस्पी रखता हुआ जान पडता है। चुनाव के दौरान प्रयोग होने वाले पोस्टरों में अथवा चुनावी जनसभाओं में तो शायद आज के इन आधुनिक नेताओं को उनकी तस्वीरों में अथवा स्वयं उन्हें हाथ जोडे हुए देखा जा सकता है परन्तु चुनाव के पश्चात के पांच वर्ष उनके यह हाथ जनता के समक्ष जुडे हुए नजर नहीं आते बल्कि उल्टे जनता ही इनके समक्ष पांच वर्षों हाथ जोडे हुए इनके आगे-पीछे घूमती, गिडगिडाती तथा अपनी मांगों के लिए इधर-उधर की ठोकरें खाती देखी जा सकती है। जाहिर है ऐसे दम्भी नेताओं की यही सामन्ती सोच उनकी संतानों को भी विरासत में मिलती है फिर आखिर इन नेताओं की उन संतानों को दहशत फैलाने वाला बेलगाम नेता पुत्र बनने से कौन रोक सकता है।
  देश में कई नेताओं की संतानें ऐसी देखी जा सकती हैं जिनपर हत्या, मारपीट व अन्य जघन्य अपराधों के सिलसिले में मुकद्दमे विचाराधीन हैं। इनमें अधिकांश मामलों में यही देखने को मिलेगा कि इन नेता पुत्रों को गुण्डगर्दी व अपराधिक पृष्ठभूमि अपने नेता पिता से विरासत में ही मिली है। अतः नेता पुत्रों के बिगडैलपन का कारण केवल यही नजर आता है कि उन्हें या तो यह संस्कार उनके अपने मां-बाप से विरासत में मिले हैं या फिर इन नेताओं को इतनी फुर्सत ही नहीं मिल पाती कि वे अपने बिगडैल होते जा रहे लाडलों की ओर नजरें उठाकर भी देख सकें कि आखिर उनका चश्मेचिराग कौन सी दिशा धारण कर रहा है।
  गत् दिनों ऐसे ही एक बिगडैल नेता पुत्र का घृणत कारनामा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की सडकों पर देखने को मिला। नेता पुत्र की इस हरकत ने तो अमानवीयता की सभी हदें पार कर डालीं। समाजवादी पार्टी की पूर्वांचल क्षेत्र की एक विधायिका शादाब फातिमा का बिगडा हुआ 19 वर्षीय पुत्र काशिफ अब्बास, देर रात नशे में धुत होकर लखनऊ के सर्वोच्च श्रेणी के समझे जाने वाले क्षेत्र हजरतगंज में बेतहाशा अनियंत्रित गति से टाटा सफारी कार चला रहा था। विधायिका पुत्र काशिफ अब्बास नशे की हालत में तेज रफ्तार कार से अपना नियंत्रण खो बैठा। परिणामस्वरूप कार पूरी गति से फुटपाथ पर चढती चली गई। इसी फुटपाथ पर सो रहे 9-1॰ व्यक्ति इस अनयंत्रित सफारी गाडी के नीचे आ गए। जिनमें 4 व्यक्तियों की तो दुर्घटनास्थल पर ही मौत हो गई जबकि 5 व्यक्तियों को गम्भीर रूप से घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस घटना में गौरतलब    यह भी है कि चालक विधायक पुत्र के पास गाडी चलाने हेतु वैध लाईसेन्स भी नहीं था। जबकि सडक पर दहशत फैलाने की गरज से अनाधिकृत रूप से उसने सफारी कार पर लाल बत्ती जरूर लगा रखी थी। और तो और नशे में धुत इस नेता पुत्र की इसी गाडी से बीयर की बोतलें भी बरामद की गई हैं।
  यह घटना इस बिगडैल नेता पुत्र को मिलने वाले संस्कारों पर कई कोण से रौशनी डालने के लिए पर्याप्त है। गाडी पर अतिरिक्त रूप से लाल बत्ती लगी हुई है। उसके पास ड्राईविंग लाइसेन्स भी नहीं है। वह नशे में भी चूर है और शराब की बोतलें इसकी गाडी में भी मौजूद पाई गईं। इन सब बातों का क्या सीधा सा अर्थ यह नहीं है कि उक्त नेता पुत्र को कानून ही कोई परवाह नहीं है। क्या यह दुर्घटना यह साबित नहीं करती कि वह नियमों व कानूनों की धज्जियां उडाता हुआ, उत्तर प्रदेश की राजधानी के संवेदनशील इलाके में अपनी मनमानी करने से बाज नहीं आ रहा था?
  इस घटना का एक पहलू और भी है। यदि समाजवादी पार्टी से अभी पूछा जाए तो वह शादाब फातिमा नामक एक विधायिका को अपने मुस्लिम विधायकों के खाते में ही जोडेगी। ऐसे में जबकि इस्लाम में शराब पीने को बहुत सख्ती से हराम ठहराया गया है, प्रश्ा* यह है कि इस घटना के बाद क्या इस मुस्लिम विधायिका का यह शराबी बिगडैल लाडला, मुस्लिम समाज में गर्वपूर्वक यह कहने के योग्य रह गया है कि वह मुस्लिम समाज से संबंध रखने वाले एक प्रतिनिष्ठि परिवार का पुत्र है जिसका पिता पी डब्ल्यू डी में अभियन्ता तथा मां एक सम्मानित विधायिका है। जहां इस शर्मनाक हादसे ने मृतक व्यक्तियों के परिवारों के समक्ष एक बडा संकट खडा कर दिया है, वहीं इस बिगडैल विधायक पुत्र ने समाजवादी पार्टी तथा अपने माता पिता के सामने भी एक बडी समस्या खडी कर दी है।
  प्राप्त ताजा समाचारों के अनुसार विधायक द्वारा अपने पुत्र को बचाने के सभी उपाय किए जा रहे हैं। यहां तक कि कानूनी तौर पर यह साबित करने का भी प्रयास किया जा रहा है कि दुर्घटना के समय काशिफ अब्बास गाडी चला ही नह रहा था। उसके स्थान पर किसी अन्य ड्राईवर का नाम डाले जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। जबकि पुलिस अधिकारी स्पष्ट रूप से कह चुके हैं कि इस बात के पुख्ता सुबूत व चश्मदीद गवाह मिल चुके हैं, जिनके अनुसार काशिफ अब्बास स्वयं नशे में धुत होकर बेकाबू टाटा सफारी चला रहा था तथा उसी के हाथों से यह बडा हादसा घटित हुआ।
  बहरहाल, इस समय देश में एक अकेला काशिफ अब्बास ही नहीं है बल्कि और न जाने कितनी ऐसी संतानें हैं जिनको उनके नेता अथवा उच्च पदों पर बैठे माता-पिता की शह मिली होती है। वे अपने नेता मां-बाप के ऊंचे ओहदे तथा उनके ऊंचे रुसूक का लाभ उठाकर गलत राह पर चल बैठते हैं। इस घटनाक्रम में सबसे दुःखद पहलू यह भी होता है कि पुत्रमोह में फंसे मां-बाप अपनी इन जैसी बिगडैल संतानों पर नकेल कसने के बजाए उल्टे उन्हें संरक्षण देने तथा उनका बचाव करने में लग जाते हैं। परिणामस्वरूप काशिफ अब्बास जैसे बच्चे इसी प्रकार के अथवा इससे भी अधिक घृणित कारनामों में संलिप्त होते देखे जाते हैं। अतः इस विषय पर अत्यन्त गंभीरता से चिंतन किए जाने की जरूरत है। बजाए इसके कि उच्च परिवारों के लाडले अपने माता-पिता व अपने खानदान का नाम रौशन करें, उल्टे यही बच्चे एक अपराधी के रूप में अपने जीवन की शुरुआत करते हैं। इसमें बच्चों से अधिक दोष उनके ऐसे माता-पिता का भी है जोकि अपनी व्यस्तताओं के बीच में से अपने बच्चों की निगरानी के लिए तथा उस पर नजर रखने के लिए समय नहीं निकाल पाते। जाहिर है उपेक्षा की यही इन्तेहा किसी भी बच्चे को जुर्म अथवा चरित्र हनन की ओर ढकेल सकती है। लिहाजा प्रत्येक माता-पिता का विशेषकर तथाकथित सम्भ्रान्त माता-पिता का तो अवश्य यह दायित्व है कि वे अपनी व अपने परिवार की इज्जत आबरू को अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य में तलाशने की कोशिश करें। और यह तभी संभव हो सकेगा जबकि बच्चों की पूरी निगरानी हो तथा अच्छे, खुशगवार व सम्मानपूर्ण वातावरण में उसकी परवरिश हो।


Nirmal Rani  [email protected]