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आओ, हम भारतीय बने

13 Aug 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

भुवनेश व्यास

संपूर्ण भारतवर्ष आज एक बार फिर से ‘कथित’ स्वतंत्रता की वर्षगांठ मना रहा है। देश को आतंकवाद, साम्प्रदायिकता व आर्थिक गुलामी के कैदखानों तथा वर्ग संघर्ष में धकेलने वाले खद्दरधारी तिरंगा फहराएंगे, अर्थहीन भाषण देंगे जिसमें धार्मिक तुष्टीकरण के लफ्जों को प्रमुखता दी जाएगी। खद्दरधारियों की मिजाजपुर्सी करने वाले उनकी वाहवाही करेंगे लेकिन दीन-हीन बनी भारत की जनता एक बार फिर से ठगी जाएगी। वह आज फिर यह सोचने पर मजबूर है कि क्या हम स्वतंत्र है ?

आज देश के कर्णधार नेताओं से जनता सवाल करना चाह रही है लेकिन खामोश जुबान से कि यह नेता क्यों आतंकवाद, साम्प्रदायिकता, आर्थिक व सामाजिक विषमता व तुष्टीकरण की राह पर हमें धकेल रहे हैं ? आजादी के मायने तलाश करते हैं तो बदले- में हमें यही समस्याएं मिल रही है। देश की नीरीह जनता इस्लामिक आतंकवाद के पंजों में फंस गई है। साठ वर्ष पूर्व अंग्रेजों की दासतां से मुक्ति के साथ ही जम्मू-कश्मीर में कबिलाई आतंकी हमले प्रारंभ हुए जिन्होंने आज संपूर्ण राष्ट्र को चपेट में ले लिया। एक दशक पूर्व तक इस्लामिक आतंकवाद के पंजों में केवल कश्मीर घाटी ही थी जिसके चलते घाटी से गैर-इस्लामिक लोगों को अपना घर बार छोडना पड गया। घाटी को इस्लामिक बनाने के बाद इस्लामिक आतंकवाद अपनी विस्तारवादी योजना को आगे बढाने के लिए अब सोची समझी साजिशों के तहत संपूर्ण भारत को अपना पहला निशाना बना रहा है। इस योजना का परिणाम यह है कि अब देश के लगभग आधे जिला मुख्यालयों पर इस्लामिक आतंकवाद ने अपना स्थानीय नेटवर्क बना लिया है। नतीजा यह है कि आज देशभर में कई स्थानों पर बम विस्फोट होना आम बात हो गई है।
आतंकवाद के पैर आधे देश में कैसे फैल गये इसके पीछे जुडे तथ्यों को खंगाले तो हम पाएंगे कि इस विस्तारवादी योजना को साम्प्रदायिक तुष्टीकरण (अंग्रेजों की छोडी हुई) की सरकारी नीतियों का सहारा मिला है। मात्र बीस लाख अल्पसंख्यक (इस्लामिक) मतों को लेने के लालच में हमारी सरकारों ने आतंकवाद के विद्यालय कहे जाने वाले मदरसों को भरपूर सहायता दी, आतंकवाद से निपटने के लिए ‘टाडा’ व ‘पोटा’ जैसे कानूनों को समाप्त किया तो अफजल जैसे आतंकी सरगनाओं की फांसी को लगातार टाला गया। हाल ही अमरनाथ श्राईन बोर्ड भूमि विवाद को कश्मीर घाटी में सक्रिय पाकिस्तान परस्त भारतीय राजनीतिक दलों के दबाव में हवा दी गई जिसकी आग की चपेट में आज संपूर्ण भारत है। हाल का यह विवाद पाकिस्तान के इशारे पर चलने की जानकारी होने के बावजूद अल्पसंख्यक मतों को अपने पक्ष में करने के लालच में हमारी सरकार ने पाकिस्तान के इस साम्प्रदायिक जाल को तोडने की कोई कोशिश ही नहीं की अपितु वोटों के लालच ने इस जाल को संपूर्ण राष्ट्र में फैला दिया है। ठीक इसी तरह का काम हमारी सरकारों ने आतंकवादियों के अग्रिम संगठन ‘सिमी’ के मामले में किया। ‘सिमी’ परस्त दो राजनीतिक दलों को खुश करने की नीति के चलते ट्रिब्यूनल के समक्ष केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने इस प्रतिबंध जारी रखने के लिए पर्याप्त साक्ष्य होते हुए भी ट्रिब्यूनल को गुमराह गई। यह तो सर्वोच्च न्यायालय की देश के प्रति सजगता की जो इस अग्रिम आतंकी संगठन पर दूसरे ही दिन पुनः प्रतिबंध लग गया। सवाल उठता है कि जब संपूर्ण देश, सुरक्षा एजेन्सियां तथा अदालतें भी यह जानती है कि ‘सिमी’ जैसा संगठन बडे आतंकी संगठनों की गतिविधियां इस देश में संचालित करने में उनका महत्वपूर्ण सहयोगी है तो इन खद्दरधारी नेताओं को यह क्यों मालूम नहीं है ?
आतंकवादियों की ही एक योजना जिससे देश को आर्थिक रूप से खोखला किया जा सकता है वह नकली भारतीय मुद्दा का चलन है। यह योजना भी पाकिस्तान के इशारे पर देश में चलाई जा रही है। ऐसा नहीं है कि यह नोट कहां से आते हैं व देश में कौन चला रहा है इसकी जानकारी सभी खद्दरधारियों को पता है लेकिन अपनी तिजोरी असली मुद्रा से भरने के लिए वह इसे लगातार नजरअन्दाज कर रहे है। य सभी जानते है कि थार व समझौता एक्सप्रेस ट्रेनों से नकली नोटों की यह खेपें यहां लाई जा रही है और हमारे खद्दरधारियों के संरक्षण में इन्हें यहां चलाया जा रहा है। आठ वर्ष पूर्व राजस्थान के एक छोटे जिले में पुलिस ने बडी मात्रा में पाकिस्तान निर्मित नकली भारतीय करेंसी पकडी। पुलिस इस मामले की छानबीन करते हुए केरल सरकार के एक विधायक तक भी जा पहुंची लेकिन आज तक उसे सबूत होने के बावजूद भी पकडा नहीं जा सका। बहाना यह बनाया गया कि उसको गिरफ्तार करने की सरकार से इजाजत नहीं मिली। इस तरह से जाली मुद्रा आज भी चलाई जाकर देश की अर्थव्यवस्था को जर्जर करने की योजना बिना किसी रूकावट के जारी है।
सामाजिक विषमता के चलते भारतीयों के जाति समुदाय में बंटने व वर्ग संघर्ष की बात करें तो इसके साथ भी हमारे राजनेताओं की वोट राजनीति जुडी हुई है। आजादी के बाद जब हमारा संविधान बना तो उसमें समानता की बात कही गई, लेकिन वोटों के लालच ने धीरे-धीरे इतने संशोधन कर सामाजिक असमानता फैलाई कि आज संपूर्ण भारतीय समाज जाति समुदाय में बंट ज्यादा से ज्यादा सरकारी लाभ प्राप्त करने के लिए दूसरे वर्ग को समाप्त करने में अपनी पूरी ताकत झोंक रहा है। यहां गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की बात प्रासंगिक व महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने गुजरात दंगों के दौरान कहा- था कि ‘मैं अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक या जातीय वर्गो को नहीं मानता हूं, मेरे लिए गुजरात में रहने वाले सभी गुजराती है और सबके साथ मेरी नीतियां समान है’ यही कारण था जो तमाम विरोधाभास के बावजूद वे पुनः सत्ता में लौटे। जब मोदी यह बात कह सकते हैं तो क्या इस देश का प्रधानमंत्री हम सब भारतीय है, नहीं कह सकता है यदि इस देश का प्रधानमंत्री हम भारतीय है, की नीति का अनुसरण करें तो बहुत संभव है कि उपरोक्त वर्णित समस्याओं से हम मुक्त हो सकते हैं और भारत को कोई भी ना आंख दिखा सकेगा और ना विद्वेष फैला सकेगा। आईए हम सभी संकल्प ले कि हम भारतीय बनें।
 


bvyasvyas@rediff.com



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