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आज भी कायम है चिट्ठियों का जादू

30 Jun 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

Arvind Kumar Singh , Editor - Haribhoomiनयी दिल्ली, संचार क्रांति के इस दौर में खास तौर पर महानगरों में ऐसी आम धारणा बनती जा रही है कि अब चिट्ठियों का कोई महत्व नहीं रहा। उनको मोबाइल और स्थिर फोनों, यातायात के तेज साधनो, इंटरनेट और तमाम अन्य माध्यमो ने बुरी तरह प्रभावित किया है। पर इतने सारे बदलाव के बाद भी चिट्ठियों का जादू खास तौर पर देहाती इलाकों में कायम है और डाकखानो के द्वारा रोज भारत में साढे चार करोड चिट्ठियां भेजी जा रही हैं। भारतीय सैनिकों के बीच रोज सात लाख से अधिक चिट्ठियां बांटी जा रही हैं और आज भी देश के तमाम दुर्गम गावों में डाकिए का उसी बेसब्री से इंतजार किया जाता है जैसा दशको पहले किया जाता था। कूरियर कंपनियों का भी इधर तेजी से शहरों में विस्तार हुआ है, पर उनकी ओर से भेजे जानेवाले पत्रों का कोई विश्वसनीय आंकडा नहीं है। यह सही है कि चिट्ठियों पर फोनो ने सबसे ज्यादा असर डाला है पर  उनका जादू आज भी बरकरार है।
Postmanवरिष्ठ पत्रकार और दैनिक हरिभूमि के स्थानीय संपादक अरविंद कुमार सिंह की पुस्तक भारतीय डाक  के एक खंड चिट्ठियों की अनूठी दुनिया को राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने आठवीं कक्षा की हिंदी विषय की नयी पाठ्यपुस्तक वसंत भाग 3 में शामिल किया है।  भारतीय डाक तंत्र पर काफी लंबे अनुसंधान के बाद लिखी गयी श्री सिंह की पुस्तक का प्रकाशन नेशनल बुक ट्स्ट द्वारा हिंदी के अलावा अंग्रेजी तथा कई अन्य भारतीय भाषाओं में किया जा रहा है। पुस्तक में संचार क्रांति की चुनौतियों समेत सभी महत्वपूर्ण पक्षों को उठाया गया है और खास तौर पर ग्रामीण डाकघरों की उपादेयता को काफी महत्वपूर्ण माना गया है।
उनके मुताबिक संचार क्रांति के क्षेत्र में भी शहर और देहात के बीच म भारी विषमता गहरा रही है।  देश में हर माह 70 लाख से एक करोड के बीच में फोन लग रहे हैं फिर भी  देहाती इलाकों की तस्वीर बहुत धुंधली है। देहाती फोनो का जिम्मा आज भी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीएसएनएल ने ही संभाला है और निजी कंपनियां इन इलाकों में जाने से कतरा रही हैं। भले ही 28  करोड से अधिक फोनो के साथ भारत का दूरसंचार नेटवर्क दुनिया का तीसरा और एशिया का दूसरा सबसे बडा नेटवर्क बन गया है।  पर दहातीं दूरसंचार  घनत्व अभी 9 फीसदी भी नहीं हो पायाहै। अगर ग्यारहवीं योजना के अंत तक की गयी परिकल्पना के अनुसार ग्रामीण दूरसंचार घनत्व बीस करोड फोनो के साथ 25 फीसदी हो जाता है तो भी भारत में देहात के 100 में 75 लोगों के पास फोन नहीं होंगे।
लेखक श्री सिंह मानते हैं कि पत्रों की धरोहर को बचाना बहुत जरूरी है ।  पत्र जैसा संतोष फोन, ईमेल या एसएमएस  संदेश नहीं दे सकते हैं। पत्र रिश्तों का एक नया सिलसिला शुरू करते हैं और राजनीति,साहित्य तथा कला क्षेत्र में तमाम विवाद और नयी घटनाओं की जड भी पत्र ही होते हैं. दुनिया का तमाम साहित्य पत्रों पर केंद्रित है और मानव सभ्यता के विकास में इन पत्रों ने अनूठी भूमिका निभायी है। संचार क्रांति के बाद भी पत्रों की विश्वसनीयता को ध्यान में रखते हुए ही तमाम कंपनियों ने व्यापारिक डाक को ही सर्वाधिक महत्व देना शुरू किया है। इसी नाते व्यापारिक डाक की मात्रा  लगातार बढ रही है।
दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात पत्र 2009 ईसा पूर्व के कालखंड का सुमेर का माना जाता है।  मिट्टी की पटरी पर यह पत्र लिखा गया था। मनुष्य की विकास यात्रा के साथ पत्रों का सिलसिला भी शुरू हुआ और आदिवासी कबीलों ने संकेतो से संदेश की परंपरा शुरू की। लिपि  के आविष्कार के बाद पत्थरों से लेकर पत्ते पत्रों को भेजने का साधन बने। लेखन साधनो तथा डाक प्रणाली के व्यवस्थित विकास के बाद पत्रों  को पंख लगे । अगर तलाश करें तो  आपको ऐसा कोई नहीं मिलेगा जिसने कभी किसी को पत्र न लिखा या न लिखाया हो या पत्रों का बेसब्री से जिसने इंतजार  न किया हो। भारत में सीमाओं और दुर्गम इलाकों में तैनात हमारे सैनिक तो पत्रों का बहुत आतुरता से इंतजार करते हैं। संचार के और साधन उनको पत्रों सा संतोष नहीं दे पाते हैं। एक दौर वह भी था जब लोग पत्रों का महीनो इंतजार करते थे.पर अब वह बात नहीं।
लेखक श्री सिंह के मुताबिक राष्ट्रपिता महात्मा गधी तथा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू सभी तरह के पत्रों का हमेशा महत्व देते रहे हैं और पत्रों का जवाब देने में उनका कोई जोड नहीं था।  गांधीजी के पास दुनिया भर से तमाम पत्र केवल महात्मा गांधी-इंडिया लिख कर पहुंच जाया करते थे। वे देश के जिस कोने में होते थे, पत्र वहां  पहुंच जाते थे।  गांधीजी के पास बडी संख्या में पत्र पहुंचते थे पर हाथ के हाथ वे इसका जवाब भी लिख देते थे।  अपने हाथों से ही ज्यादातर पत्रों का जवाब देना उनकी आदत थी। कई बार जब लिखते- लिखते उनका दाहिना हाथ दर्द करने लगता था तो वे बाऐं हाथ से लिखने में जुट जाते थे। महात्मा गांधी ही नहीं आंदोलन के तमाम नायकों के पत्र आपको गांव-गांव में लोग सहेजे मिल जाते हैं। पश्चिमी उ.प्र.में आपको कई इलाको में लोग चौ.चरण सिंह तथा बाबू बनारसी दास जैसे नेताओं के पत्र दिखा कर गर्व महसूस करते हैं. उन पत्रों को वे किसी प्रशस्तिपत्र से कम नही मानते हैं और तमाम लोगों ने तो उन पत्रों को फ्रेम करा कर रख लिए हैं।
पत्रों के आधार पर ही तमाम भाषाओं में जाने कितनी किताबें लिखी जा चुकी हैं और राजनेताओं के पत्रों ने विवादों की नयी विरासत भी लिखी। पत्र व्यवहार की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। माध्यम डाकिया रहा हो या हंस ,हरकारा रहा हो या फिर कबूतर पर पत्र लगातार पंख लगाकर उडते रहे हैं।  नल -दमयती  के बीच पत्राचार हंस के माध्यम से होता था तो रूक्मिणी का पत्र श्रीकृष्ण को विपृ के माध्यम से मिलता था। माक्र्स और एंजिल्स के बीच ऐतिहासिक मित्रता का सूत्र पत्र ही थे।  इसी तरह रवींद्र नाथ टैगोर ने दीन बंधु एंड्रूज को जो पत्र लिखा था वह लेटर टू ए  फ्रेंड नाम से एक किताब का आकार लेने में सफल रही, जबकि  लियो टालस्टाय द्वारा रोमां रोला को लिखे गए पत्रों ने उनकी जीवनधारा ही बदल दी।   पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आजादी के आंदोलन के दौरान जेल में रहते अपनी पुत्री श्रीमती इंदिरा गांधी या अन्य  को जो पत्र लिखे वे  वे स्वयं में महान रचना का रूप ले चुके हैं। इसी तरह उर्दू के  मशहूर शायर गालिब अपने मित्रों को खूब पत्र लिखते थे और उन पत्रों के विषय भी कई बार पत्र ही होते थे। भारत में तमाम लेखकों और कवियों ने पत्रों की महिमा पर सहित्य लिखा है।
पत्रों के संदर्भ के साथ यह देखना भी जरूरी है कि दुनिया भर में डाकघरों की भूमिका में बदलाव आ रहे हैं।  आजादी के बाद भारतीय डाक  नेटवर्क का विस्तार सात गुना से ज्यादा हुआ है। भारतीय डाक प्रणाली आज दुनिया की सबसे विश्वसनीय और अमेरिका, चीन, बेल्जियम और ब्रिटेन से भी बेहतर प्रणाली साबित हो चुकी है। भारतीय डाक तंत्र ने नीति निर्माताओं की तमाम उपेक्षा के बाद भी  खास तौर पर देहाती और दुर्गम इलाकों में पत्र भेजने के साथ साक्षरता अभियान तथा समाचारपत्रों को ऐतिहासिक  मदद की पहुंचायी है।  रेडियो के विकास में भी डाक विभाग का अहम योगदान रहा है। मनीआर्डर, डाक जीवन बीमा तथा डाकघर बचत बैंक खुद में बडी संस्था का रूप ले चुके हैं। यही नहीं कम ही लोग जानते हैं कि नोबुल पुरस्कार विजेता सीवी रमण, मुंशी प्रेमचंद, अक्कीलन, राजिंदर सिंह बेदी, देवानंद, नीरद सी चौधरी, महाश्वेता देवी  से लेकर कृष्णविहारी नूर डाक विभाग में कर्मचारी या अधिकारी रहे हैं



Comments to this Article
good one, sunny (2008-10-18 14:57:45)
शांति संभव पुस्तकों के रूप में तुम पर हो) (किताबें जादू करने के लिए मुझे एक प्रतिलिपि क्या है भेजने के लिए, या महान (प्यार की एक ताबीज अजीब, azher (2010-04-04 12:26:15)

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